क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमांसरन्धन क्रिया
मांस को पकाने की विधि यह है कि मांस (ग्राम्यज), आनूपज एवं जांगल
प्राणियों तथा अण्डज एवं विलेशय जन्तुओं के मांस का पाक किया जाता है॥६२॥
तलितं भृष्टकं स्विन्नं शुष्कं बहुरसं स्मृतम्।
तान्दूरं वण्टितं चैवं शूल्यं च पुटपाकजम्॥६३॥
तलित, भृष्टक, स्विन्न, शुष्क, बहुरस, तन्दूर (तान्दूर), वण्टित, शूल्य तथा
पुटपाकज आदि विभिन्न प्रकार मांस पाक के होते हैं॥६३॥
तलितं त्रिविधं प्रोक्तं भृष्टकं द्विविधं स्मृतम्।
सुस्विन्नमस्थिगलितं शुष्कं तद्रसव्रर्जितम्॥६४॥
सरसं रसवज्ज्ञेयं तान्दूरं वह्निपाचितम्।
वण्टितं तु शिलापिष्टं तत्पाको बहुधा स्मृताः॥६५॥
तलितं मांस के तीन प्रकार हैं- भृष्ट मांस दो प्रकार का होता है। अस्थि गलित
करने हेतु मांस स्विन्न, रसरहित को शुष्क तथा रसयुक्त को सुरस (सरस), अग्नि पर
पकाने मांस को तन्दूर शिला-पिष्ट मांस वण्टित पाक कहते हैं। यह मांसपाक विविध
प्रकार का होता है॥६४-६५॥
शूलेन पक्वं मांसं यत्तज्ज्ञेयं शूलपाचितम्।
गर्तयन्त्रेण यत्पक्वं तज्ज्ञेयं पुटपाकजम्॥६६॥
एवं बहुविधः पाकः सूपकारधिया कृतः।
यस्य जन्तोर्हि यन्मांसं तन्मासं तद्गुणावहम्॥६७॥
विशेषोऽत्र यदुद्दिष्टः स ज्ञेयः सुष्ठुपाकतः।
शूल (लौह के डंडी पर पकाये मांस का प्रकार) द्वारा पक्व मांस को शूल्य या
शूलपाचित मांस कहा जाता है। गर्ततन्त्र (भूधर तन्त्र) में पकाये मांस को पुटपाकज
मांस कहते हैं। उस प्रकार सूदक (पाचक) के मतानुसार अनेक प्रकार के पाठ होते हैं।
जिस प्राणी का मांस पका है, गुण इसी के अनुसार हो जाते हैं। परन्तु मांस में विशेष
गुण उसकी पाक विधि द्वारा आता है॥६६-६७॥
मांसप्रक्षालनस्य विधिः
एवं बहुविधं मांसं प्रत्यङ्गं च पृथक्कृतम्॥६८॥
स्थूलातिस्थूलविहितं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं च तत्।
खण्डशः कलितं मांसं धान्यहिङ्ग्वम्बुना क्रमात्॥६९॥
क्षालयित्वा पनुर्हिङ्गुतोयमिश्र पचेत्ततः।
मांस प्रक्षालन
मांस के अंग-प्रत्यंग पृथक कर, स्थूल से सूक्ष्म खण्ड बनाकर, हिंगु तथा
धान्यक जल से प्रक्षालन करते हैं, तदनन्तर हिंगु जल मिलाकर मांस का पाक
(अग्निपर) करते हैं॥६८-६९१/२॥
इति प्रक्षालनम्
अथ मांसवाचनविधिः
हिङ्ग्वार्द्रजीरमरिचैर्यैर्युक्तं वेसवारकम्॥७०॥
तच्च तैले पचेत्पूर्वमाज्ये वा सात्म्ययोगतः।
अर्धस्विन्ने क्षिपेत्तक्रमथवा दाडिमीरसम्॥७१॥
सिद्धे पाके च दातव्यं चूर्णमुद्धूलनस्य यत्।
मांस का तैल या घृत से युक्त (मतानुसार/ पाचन) पात्र (कढ़ाई आदि) में तप्त
कर, हिंगु, आर्द्रक, जीरक, मरिच आदि वेसवार सहित) पकाते हैं, तथा उसी में मांस
खण्ड को डाल देते हैं। अर्ध पका हो जाने पर, इसमें तक्र या दाडिम स्वरस मिश्रित
करते हैं, मांस सिद्ध (पक्व) हो जाने पर मसाले का चूर्ण भलीप्रकार मिला देते
हैं॥७०-७१॥
तैलपक्वमांसस्य गुणाः
मांसं तैलेन यत्सिद्धं तन्मांसं गुरु पित्तलम्॥७२॥
वीर्योष्णं रुचिदं वृष्यं वातघ्नं पुष्टिकारकम्।
तैल पक्व मांस
तैल के साथ पकाये मांस के गुण- गुरु (गरिष्ट), पित्तजनक, उष्णवीर्य, रुचि
कर, वृष्य, वातघ्न तथा पुष्टिकारक॥७२१/२॥
घृतपक्वमांसस्य गुणाः
मांसमाज्येन यत्सिद्धं लघु रुच्यमपित्तलम्॥७३॥
अनुष्णवीर्य बलदं हृद्यं दृष्टिप्रसादनम्।
क्षे. कु. 6