क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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कफ-वातनाशक के रूप में श्रेष्ठ, तथा सर्वपाकों में उत्तमतम श्रेणी का
है।। १८४-१८७१/२।।
अथानूपजम्
स्वेद्यमानूपजं मांसं लुञ्चितं भजितं मनाक् ॥ १८८ ॥
क्षालितं वारिणाऽत्यर्थं वेसवारेण संयुतम्।
रन्धितं बहुधा भुक्तौ स्वेदितं वारिणा भृशम् ॥ १८९ ॥
सुस्विन्नं खण्डितं सर्वमङ्गाद्वेऽस्थिविवर्जितम्।
तप्तमाज्ये सबालीके बेसवारसमन्विते ॥ १९० ॥
भर्जितं पाचितं तोयैः पूर्ववत्स्वेदसंभवैः ।
प्रलेहतलने वाथ शूले वा बहुधा पचेत् ॥ १९१ ॥
आनूपं बलकृन्मांसं स्निग्धं गुरुतरं स्मृतम्।
धान्याङ्कुरचरा येऽत्र तेषां मांसं लघुत्तमम् ॥ १९२ ॥
विपाचितास्तिन्तिरित्तिरिवर्त्तिकाद्याः कपिञ्जला लावकपोतकाश्च।
एकैकशो द्रव्यचयानुयोगान्मण्डूकाकरूपा कथिता सुधानाम् ॥ १९३ ॥
उदकस्थलजातानां विधिरुक्तस्तु रन्धने।
पक्षिणो यस्य यन्मांसं तन्मांसं तद्गुणावहम् ॥ १९४॥
आनूपदेशजपक्षी मांस
क. विधि- आनूप (निम्न) देशज पक्षी के चर्म-पक्ष निष्कासित मांस की अल्प भृष्ट
कर, जलप्रक्षालन-स्वेदन करते हैं, फिर उपस्कार (वेसवार-लवण सहित)
मिश्रित कर, शुष्क पाक करते हैं, पुनः जल में स्वेदन करके, समस्त अंगों से
अस्थियाँ निकालकर, संतप्त घृत में (हिंगु सहित) उपस्कार के साथ) भूनते हैं,
तथा स्वेदन जल (पूर्व में अवशिष्ट) में पाक करते हैं। इसको प्रलेह के समान,
तलकर शूल पर कई प्रकार से पाक करके, निर्माण किया जा सकता है।
ख. गुण- आनूप देशज पक्षी का मांस बल्य, स्निग्ध एवं गुरुतर। धान्यांकुर चर
पक्षी का मधुर, सुपाकी तथा उत्तम। तित्तिर, वर्तिक, वर्तिक, कपिञ्जल, लावक,
कपोतक आदि पक्षियों के मांस से- अनेक द्रव्यों के संयोग से- अमृत के
मण्डूक के समान। माना गया है (अर्थात् अमृत के समान गुणकारी)।
जल तथा थल के निवासी पक्षियों के मांस की विधि उपरोक्त है, जिस पक्षी के
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जो मांस के गुण होते हैं, उसीप्रकार के उसके कल्पों (पाको) के गुण उसी के
समान होंगे।।१८४-१९४।।
अथ तित्तिरिः
तित्तिरिर्वर्णदो ग्राही हिक्कादोषत्रयापहः।
श्वासकासहरः कृष्णस्तस्माद्गौरोऽधिको गुणैः ॥ १९५॥
तित्तर-तिक्किरि
तित्तिर का मांस वर्णदायक, ग्राही, हिक्का-श्वास-त्रिदोष-कास नाशके। कृष्णतित्तिर
की अपेक्षा श्वेत तित्तिर का मांस अधिक गुणवान् ॥१९५॥
अथ वर्तीरः
वर्तीरोऽग्निकरः शीतो ज्वरदोषत्रयापहः।
सुरुच्यः शुक्रदो बल्यस्ततोऽल्पा वर्तिका स्मृता ॥ १९६ ॥
वर्तीर
वर्तिर (वर्तीर-बटेर) के मांस के गुण- यह हृद्य, शीतल, स्निग्ध, अग्निदीपन,
शीतल; ज्वर-त्रिदोषनाशक, रुचिकारक, वृष्य तथा बल्य होता है। वर्तिका (स्त्री बटेर)
के मांस के गुण अल्प होते हैं।।१९६।।
अथ लावकः
लावो हृद्यो हिमः स्निग्धो ग्राही वह्निप्रदीपनः।
पांसुलः श्लेष्मलस्तेषा मुष्णीवीर्योऽनिलापहः ॥ १९७॥
गौरकः कफवातघ्नो रूक्षो वह्निप्रदः परम्।
पौण्ड्रकः पित्तकृत्किञ्चिल्लघु श्लेष्मश्रमापहः ॥ १९८ ॥
दर्भरो रक्तपित्तघ्नो हृदामयहरो हि सः।
शीतलो रुचिकृद्वृष्यः पथ्यदः शीघ्रपाचनः ॥ १९९ ॥
लावक
लावक (लावा) के मांस के गुण- यह हृद्य, शीतल, स्निग्ध, ग्राही, दीपन,
पांसुल तथा कफकारक होता है। इन पक्षियों का मांस उष्णवीर्य होने से वातनाशक होता
है। गौरवर्णीय लावा का मांस कफवातनाशक, रूक्ष, उत्तम अग्निवर्धन है। पौण्ड्र देशज
लावा का मांस पित्तवर्धक, किंचित् लघु, कफघ्न, श्रमहर होता है। दर्भर लावा (मांस)