क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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१०४ क्षेमकुतूहलम्
ये मृगा विहगास्तोयदूरावासप्रचारकाः।
तेऽनभिष्यन्दिनः सर्वे विपरीता अतोऽन्यथा॥२१०॥
जलानूपभवाः सर्वे जलानूपचराश्च ये।
गुरुभक्ष्या गुरुतरं तेषां मांसमुदीरितम्॥२११॥
क. चेष्टावान् पशु-पक्षी का मांस गुण- हृद्य, रुच्य, लघु
ख. देह मध्य मांस गुण- प्राय, गुरु
ग. पक्षी (पंख) हिलाने (पशु-पक्षी) के कारण पक्षी- मांस उत्तम
घ. सर्वप्राणि अण्ड तथा ग्रीवा- गुरु
ङ. अजलीय पशु-पक्षी (निवास-विचरणकर्त्ता)- अनभिष्यन्दी
च. जल के निकटस्थ पशु-पक्षी का मांस- अभिष्यन्दी (पूर्व के विपरीत)
छ. जलीय प्रदेश- अल्प (निम्न) प्रदेशज तथा विचरणकर्त्ता प्राणियों का मांस-
अधिक गुरु (दुष्पाच्य)।
धान्योत्पत्तिप्रचाराणां लघु स्याल्लघुपक्षिणाम्।
ऊरुस्कन्धोदरं मूर्धा पादौ पाणी कटी तथा।
दृष्टित्वग्यकृदन्त्राणि गुरूण्याहुर्यथोत्तरम्॥२१२॥
ग्राम्यं मांसं वनजमथवाऽऽनूपजं वा बिलौकं
श्वेतं पीतं हरितमरुणं पाचितं सूपकारैः।
तल्यं शूल्यं सरसमधुरं स्वेदितं वाटितं वा
यस्य प्रायो यदभिरुचितं स्तूयते तेन तद्धि॥२१३॥
क. धान्योत्पत्तिदेशजश्चापि (विचरक) लघु पक्षी मांस- लघु
ख. प्राणियों के उरु, स्कन्ध, उदर, मूर्धा, पाद, हस्त, कटि, नेत्र, त्वक् (चर्म)
तथा यकृत एवं आन्त्र (का मांस)- उत्तरोत्तर गुरु
ग्राम्यज, वनज वा आनूपज, बिलौक (विलेशय) निवासी, श्वेत-पीत-हरित-अरुणवर्णीय
पशु-पक्षी के मांस को पाक करें। सूपकारों द्वारा विभिन्न प्रकार से तलित, शूल्य पक्व,
सरस, मधुर, स्वेदित या वाटित (वेष्टित) पर सिद्ध मांस- इनमें जो मांस उसकी रुचि
के अनुसार सुग्राह्य अभिलषित है, वह प्रायः उसी (भोक्ता) मांस की प्रशंसा (स्तुति)
करना स्वाभाविक है।।२१२-२१३।।
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षष्ठोत्सवः १०५
भक्तादिमांसपर्यन्तं सर्वमुक्तं मया भृशम्।
अथ मत्स्यभवा भक्ष्या उच्यन्ते सप्तमोत्सवे॥२१४॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मांसप्रशंसनो नाम षष्ठोत्सवः॥६॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
इस उत्सव (प्रकरण) के अन्तर्गत भक्त (भात) से मांस तक पाक की विधि तथा
गुणों का विवेचन मैंने किया है। आगामी सप्तम उत्सव (प्रकरण) में मत्स्यज भक्ष्य
पदार्थों के पाक (निर्माण) तथा गुणावली प्रस्तुत की जायेगी।।२१४।।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का षष्ठ उत्सव समाप्त॥