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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

८८ क्षेमकुतूहलम्
धनञ्जय प्रलेह
मांसकूष्माण्डकदलीशृङ्गवेराणि साधयेत्।
प्रलेहविधिना सम्यक् प्रलेहोऽयं धनञ्जयः ॥ १२५ ॥
धनञ्जय प्रलेह
मांस, कूष्माण्ड, कदली तथा शृंगवेर (आर्द्रक) - मिश्रित करके, प्रलेह विधि
(पूर्ववत्) के अनुसार सिद्ध (पाक) करते हैं- इसकी 'धनञ्जय प्रलेह' नामकरण होता
है।। १२५।।
अथ गौडदेशीयप्रलेहः
हिङ्ग्वार्द्रबीजपूरैर्लालवणैः संभृतेन च।
कुट्टितामिषपिष्टेन तक्रदाडिमबीजतः ॥ १२६ ॥
सोषणावेसवाराभ्यां प्रलेहोगौडदेशजः।
प्रलेहो रुचिरो हृद्यः कफानिलरुजापहः ॥ १२७ ॥
संग्राही पित्तकृत्किञ्चिच्छूलाध्मानगदाञ्जयेत्।
गौडदेशीय प्रलेह
क. विधि- मांस पिष्ट (पीठी) को हिंगु, आर्द्रक, बीजपूर, एला, लवण को दाडिम
एवं तक्र के साथ-कूटकर, उसमें मरिच तथा वेसवार तैयार करते हैं- यह
गौडीदेशीय प्रलेह होता है।
ख. गुण- रुचिकर, हृद्य, अतिपुष्टिकारक, वातपित्तनाशक, बल्य, मन्दाग्निहर
तथा कफनाशक।। १२६-१२७१/२।।
अथ पूरणम्
हिङ्गुधान्यजले मांसं सुन्वित्रं सूक्ष्मकुट्टितम् ॥ १२८ ॥
संयुक्तं हिङ्गुजीरार्द्रबीजपूरैलसैन्धवैः।
घृते तप्ते परिभ्रष्टं धूपितं मांसपूरणम् ॥ १२९ ॥
मांस्य पूरणं रुच्यं हृद्यं पुष्टिकारं परम्।
वातपित्तहरं बल्यं मन्दानिकफनाशनम् ॥ १३० ॥
मण्डकस्य कृतापट्टी पूरणेन प्रपूरिता।


षष्ठोत्सवः ८९
मांसपूरण (प्रपूरण प्रलेह)
क. विधि- हिंगु तथा धान्यक के जल में मांस को सुस्विन्न करके, सूक्ष्म कूटकर,
संतृप्त घृत में ठीक से भृष्ट करते हैं। जीरक, आर्द्रक, बीजपूर रस, एला, सैन्धव
का मिश्रण (भून) करें तथा सुगन्धित बना देते हैं इसका काम 'मांसपूरण' होता है।
ख. गुण- रोचक, हृद्य, अतिपुष्टिकारक, वातपित्तनाशक, बल्य, मन्दाग्निहर तथा
कफनाशक।। १२८-१३०१/२।।
अथ समोसा
वेष्ट्या शृङ्गाटकाकारं सन्धि लिम्पेत्कनिष्ठया ॥ १३१ ॥
घृते भृष्टा समोसेति नाम्ना चष्टे हि सूपकैः।
सुरुच्या वातजिद्बल्या वृष्या पित्तापहा गुरुः ॥ १३२॥
विशेषोऽत्र गुणे योहि मांसभेदाद्विविच्यते।
समोसा
क. विधि- मण्डक (गेहूँ की मैदा) की पट्टिका बनाकर, उसमें पूर्वोक्त पूरण
भरकर, शृंगाटक के आकार में (कनिष्ठिकी ऊँगली से संधि भलीभाँति बन्द कर
देते हैं), तथा घृत में पकाते हैं। इसको सूदक (पाचक) लोग समोसा कहते हैं।
ख. गुण- रुचिकारक-वातनाशक, बल्य, वीर्यवर्धन, पित्तनाशक तथा गरिष्ठ
(गुरु)। इसके विशेष गुणों का विवेचन प्रयुक्त मांस के गुणों के अनुसार होते
हैं।। १३१-१३२१/२।।
अथ पूरणप्रलेहः
मांसपूरणयोगेन लोष्ठाकारं विधाय च ॥ १३३॥
स्विन्नं कृत्तं घृते भृष्टं प्रलेहविधिना पचेत्।
पूरणस्य प्रलेहो यः स ज्ञेयो वातनाशनः ॥ १३४॥
श्लेष्मप्रकारकश्चैव मुखवैरस्यकृद्धरः।
पूरण प्रलेह
क. मांसपूरण के योग से, (मैदा की पट्टिका में मांसपूरण भरकर) लोष्ठाकार (ढेला)
के आकार का बनाकर, स्विन्न (उबाल) लेते हैं, फिर सूक्ष्म काटकर, घृत में
भृष्टकर, प्रलेह की विधि से पाक करते हैं।