क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० क्षेमकुतूहलम्
है। बर्कर का मांस गुरुतर, हृद्य, अधिक कोमल, उत्तम स्वादु तथा अति बल्य होता
है॥८२-८३॥
अथ बर्कररी
सिद्धार्थसंभवे तैले घृते चोपस्करान्विते।
साधितं त्वप्रसूतायाः पलमाजं गुणोत्तमम्॥८४॥
अप्रसूताजसंभूतं मांसं पीनसनाशनम्।
शुष्ककासेऽरुचौ शोषे हितमग्नेश्च दीपनम्॥८५॥
बर्कररी
बर्कररी (अप्रसूता बकरी जिसके बधान हुआ हो) का मांस, सर्षप तैल एवं घृत
में उपस्कार मिलाकर पकाते हैं, जो उत्तम गुणवान है। यह मांस पीनस, (दुर्गन्धयुक्त
नासास्स्राव) नाशक है, यह शुष्क मांस अरुचि, शोष (क्षय) रोग में पथ्य हितकर है,
तथा अग्निदीपन होता है॥८४-८५॥
अजासुतस्य पीनस्य यौवनस्थस्य साधितम्।
घृतरामठसिन्धूत्थोपस्करै रसवत्पलम्॥८६॥
वातपित्तहरं बल्यं सुस्वादु रुचिकारकम्।
हृद्यं पीनसकासार्शोदोषघ्नं पुष्टिकृद्वरम्॥८७॥
अजासुत
क. तरुण बर्कर के सुत (बच्चे) का मांस- यौवनस्थ, युवा बर्कर का घृत, हिंगु,
सैन्धव, उपस्कर (मसाले) के साथ पकाया रसवत् पल (रस-तरीदार) मांस
तैयार करते हैं।
ख. गुण- वातपित्तहर, बल्य, सुस्वादु, रुचिकार, हृद्य, पीनस-कास-अर्श नाशक
एवं श्रेष्ठ पुष्टिकरा८६-८७।।
अथ छिलोधिया
शूलनिष्काशिताण्ड्य मांसं कृत्तमजस्य च।
रन्धितं बहुधा सूदैराखुरादा च मस्त कम्॥८८॥
तन्मां मांसदं बल्य रुच्यं पित्तानिलापहम्।
सुस्वादु मधुरं पाके किञ्चित्कफकरं सरम्॥८९॥
षष्ठोत्सवः ८१
छिलोधिया (छैलेधिया)
क. स्थूल (मोटे) ताजे बर्कर (बकरे) का मांस जिसका अण्डकोश निष्कासित कर-
खुर से मस्तक तक का मांस स्विन्न (उबालकर)- रन्धित करते हैं- घृत, हिंगु
सैन्धव, वेसवार (मसाला) मिलाकर, सिद्ध (पकाकर) करते हैं।
ख. गुण- मांसजनन, बल्य, रुचिवर्धक पित्त-वातनाशक, स्वादु, मधुर पाकी,
किंचित कफकारक तथा सारक॥८८-८९॥
अथ मेषामांसम्
मेषस्य मांसं बहुधा निकृत्तं सुपाचितं रामठयुक्ततैले।
सुयोजितं बल्लिजसैन्धवाभ्यां रुचिं विधत्ते भुवि सर्वकाले॥९०॥
मेषमांसं गुरु स्निग्धं बल्यं पित्तकफप्रदम्।
मेदःपुच्छामिषं वृष्यं कफपित्तकरं गुरु॥९१॥
मेष
क. मेष (भेड़) का मांस- खण्ड करके, हींग से तैल में भ्रष्ट (छोंककर), घृत में
सिद्ध (पाक) करते हैं, फिर मरिच चूर्ण तथा सैन्धव मिश्रित करते हैं।
ख. गुण- प्रत्येक समय रुचिवर्धक, स्वादु, गरिष्ठ (विष्टम्भी), स्निग्ध, बल्य,
पित्तकफप्रदम् । मेष तथा पुच्छ मांस वृष्य, कफपित्त कारक एवं गुरु।।९०-९१।।
अथ गाडरमांसम्
कृत्तं संपाचितं तैले घृते चोपस्करान्विते।
मधुरं पाचनं बल्य कटूष्णं गाडरं पलम्॥९२॥
गाडर
गाडर का मांस के सूक्ष्म खण्डों को तैल तथा घृत में वेसवार (मसाला)
मिलाकर, सुपक्व करते हैं। मांस मधुर, पाचक बलकारक, कटु रस तथा उष्ण।।९२।।
अथ मृगीमांसम्
मृगमातृपलं सुकोमलं शतखण्डीकृतमाज्यभृष्टकम्।
दधिसैन्धवहिङ्गुकोषणैरुचिं शीघ्रमपोहेति शृतम्॥९३॥
मृगस्य जननी शीता असृक्पित्तविनाशिनी।
सन्निपातज्वरश्वासहरा मधुरपाकिनी॥९४॥