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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

७० क्षेमकुतूहलम्
अथ गव्यं घृतम्
गव्यमग्निकरं सर्पिः कफपित्तानिलापहम्।
चक्षुष्यं बृंहणं शीतं विपाके मधुरं स्मृतम्॥३१॥
गव्य (गौ) घृत
१. जाठराग्निवर्धक, २. कफपित्तनाशक, ३. वात शामक, ४. चक्षुष्य, ५. बल्य,
शीतल, ७. मधुर-विपाकी। ये गौघृत (गाय के घी) के सामान्य गुण होते हैं॥३१॥
अथ माहिषं घृतम्
माहिषं मधुरं पाके रक्तपित्तानिलापहम्।
सुशीतं बृंहणं वृष्यं चक्षुष्यं रुचिकारकम्॥३२॥
माहिष (भैंस) का घृत (घी)
१. घृत पाक में मधुर, २. रक्तपित्तहर, ३. वातनाशक, ४. शीतल, ५. बल्य,
६. चक्षुष्य, ७. रुचिकर॥३२॥
अथाजं घृतम्
आज्यमाजं हि चक्षुष्यं दीपनं बलवर्धनम्।
श्वासे कासे क्षये पथ्यं लघु गव्याद्गुणावहम्॥३३॥
आज (बकरा की) घृत (घी)
१. चक्षुष्य, २. अग्निदीपन, ३. बल्य, ४. श्वासवर्धक, ५. कासहर (पथ्य),
६. क्षयनाशक (पथ्य)।
ये गोघृत के समान गुणवान्, गौघृत से भी अधिक गुणयुक्त होता है॥३३॥
अथान्नदृग्दोषपरिहारकश्लोकाः
अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुर्भोक्ता चैव महेश्वरः।
ध्यात्वा नारायणं देवमन्नदोषैर्न बाध्यते॥३४॥
या दृष्टिः सर्वलोकेषु दृष्ट्या च स्वभावतः।
आत्मदृग्दोषनाशाय संस्मरेन्नारदं मुनिम्॥३५॥
अन्नगत दृष्टि-दोष दूरी करण
अन्न में दृष्टि-दोष निवारणार्थ मन्त्र (श्लोक) इस प्रकार है-
षष्ठोत्सवः ७१
अन्न ब्रह्मा है, विष्णु है तथा शंकर भोक्त है। नारायण देवता का ध्यान करने
से अन्न को दृष्टिदोष दूषित नही करते। जो दृष्टि सभी संसार में है, जो दृष्टि स्वाभाविक
है, आत्मदृष्टि दोष को नाश करते हैं- इसके लिए नारद मुनि का स्मरण करना
चाहिए॥३४-३५॥
अञ्जनीगर्भसंभूतं कुमारं ब्रह्मचारिणम्।
दुष्टदृष्टिविनाशाय हनुमन्तं स्मराम्यहम्॥३६॥
भोजन पर दुष्ट दृष्टि का निवारण (रक्षण) करने के लिए, अंजनी के गर्भ से
उत्पन्न कुमार, ब्रह्मचारी, हनुमान का स्मरण किया जा रहा है॥३६॥
पठतीत्यादिकं वाक्यं भोजनादौ भिषग्वरः।
सर्वदोषविनाशाय भुक्तं शीघ्रं यथा पचेत्॥३७॥
उत्तम महानसिक वैद्य भोजन के प्रारम्भ में, मुख्य वाक्यों (श्लोकों-पूर्व में
लिखित) से समस्त दोषों के नाशनार्थ पाठ करते हैं, इससे युक्त आहार का पाचन शीघ्र
हो जाता है॥३७॥
पञ्चग्रासं तु मौनेने प्राणापानादिकाश्रितम्।
अन्यद्वैद्यसहालापैः कर्तव्यं भोजनं नृपैः॥३८॥
राजा को चाहिए, पंच ग्रास मौन होकर पंच वायु/प्राणों-यथा प्राण, अपान,
व्यान, उदान तथा समान को स्मरण करते हुए, विशेष अन्न (आहार) राजाओं के साथ
वार्तालाप करते हुए, उनके साथ भोजन ग्रहण में सहभागिता करनी चाहिए॥३८॥
अथ पर्पटः
मुद्द्जीरकवाहीकस्वर्जिका मरिचान्विताः ।
अरोचकजिगीषूर्णां पर्पटाः पुरतो भटाः॥३९॥
अङ्गारभृष्टास्ते श्रेष्ठा न तु स्नेहविपाचिताः।
पर्पटा लघवो रुच्या मुद्रजा विधिपाचिताः॥४०॥
पर्पट (पापड़)
पर्पट (पापड़) का निर्माण जीरक केशर, स्वर्जिका क्षार तथा मरिच के साथ मुद्ग
के साथ करते हैं। इसका सेवन से अरोचकनाशक सभी आहार द्रव्यों मे उत्तम माना
जाता हैं, जब कि स्नेह विपाचित (तैल आदि में मुनि) पापड़ (उसके समान) गुणकारी