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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

अथसप्तमोत्सवः

(सप्तम् प्रकरण)

अथ मत्स्यमांसप्रकार

मत्स्यखण्डानि संधृष्य क्षालयेत्प्रथमं जले।
ततो वेसनतक्राभ्यां बहुशः क्षालयेत्पुनः ॥ १ ॥

मत्स्य मांस निर्माण

मत्स्य (मछली) का साम्यक सघर्षण तथा खण्डित कर, जल से प्रक्षालन करते हैं, फिर वेसन (चणक्य सूक्ष्म चूर्ण) तथा तक्र (मट्ठा) क साथ बहुशः प्रक्षालन (धोते) करते हैं॥१॥

अथ गन्धनाशनम्

हरिद्राशुण्ठिधान्याककटुतैलैर्विमर्दयेत् ।
पक्षाल्य हिङ्गुना लिम्पेद् गन्धस्तेनोपशाम्यति ॥ २ ॥

मात्स्य गंध निवारण

प्रक्षालित मत्स्य मांस खण्डों को हरिद्रा- शुण्ठी-धान्यक-सर्षप तैल साथ विमर्दन करके, प्रक्षालन तथा हिंगु लेप का आवरण करें- इस क्रिया से मत्स्यगत गंध का शमन (निवारण/दमन) हो जाता है॥२॥

अथ मत्स्योत्तमरन्धनम्

तप्ततैले क्षिपेद्धान्यं कासमर्दं सहिङ्गकम्।
भृष्टं मत्स्यं सलवणं तक्रं क्षिप्त्वा पुनः पचेत् ॥ ३ ॥
अर्धपक्के क्षिपेदाप्रसिद्धचूर्णं सनागरम्।
दग्धं हिङ्गु विनिक्षिप्य साधयेन्मत्स्यमुत्तमम् ॥ ४॥

मत्स्योत्तमरन्थन (मत्स्य पाक विधि)

सुप्रक्षालित, गंधविहीन, खण्डशः (सुसंघर्षित) मत्स्य मांस की, संतप्त तैल में, धान्यक-कासमर्द (मसाला या छोंक), हिंगु भृष्ट के साथ करते (भूनते) हैं। इस मत्स्य को लवण सहित तक्र में पुनः पाक करते हैं, अर्धपक्ववान में, आम्र चूर्ण (अमचूर) शुण्टी चूर्ण मिला कर घृत संतप्त हिंगु डालकर, मत्स्य का पाक (सिद्ध) करते हैं॥३-४॥


सप्तमोत्सवः [पृष्ठ १०७]

अथ मत्स्यप्रलेहः

मांसप्रलेहवत्कार्यः प्रलेहो मत्स्यसंभवः ।
आदौ तैले खरे पक्वं सर्वमन्यद्धि पूर्ववत् ॥ ५॥
वर्णस्य करणे देयं पूर्वोक्तं द्रव्यकं हि यत् ।
उद्धूलनं सुगन्धाय दातव्यं पूर्वमीरितम् ॥ ६॥

मत्स्य प्रलेह

मांस प्रलेह के समान मत्स्य प्रलेह निर्माण विधि है, परन्तु मत्स्य खण्डों को खरपाक तैल में पाक कर लेते हैं (अन्य विधि मांस प्रलेह वत्) मत्स्य प्रलेह के वर्णीकरणार्थ, पूर्वोक्त द्रव्यों (वंकुम तथा रक्तचन्दन) का मिश्रण करते हैं, तथा सुगन्धित बनाने हेतु सुगन्धिद्रव्यों का उद् धूलन (चूर्ण) का संयोग कर देते हैं॥५-६॥

अथ मत्स्यखण्डप्रलेहः

सम्यक्पक्षालितं मत्स्यं वेसवारेण वेष्टितम्।
तत्तैले क्षिपेत्खण्डं हिङ्गुसैन्धवमिश्रितम् ॥ ७ ॥
प्रलेहविधिवत्साध्यो मत्स्यखण्डप्रलेहकः ।

मत्स्य खण्ड प्रलेह

सुपक्षालित मत्स्य मांस खण्ड के वेसकर से आवेष्टित कर, संतप्त तैल मे छोड़ते हैं, हिंगु तथा सैन्धव मिलाकर प्रलेह विधि से पाक करते हैं॥७ १/२॥

अथ मत्स्यपिष्टिका

गतत्वक्कण्टको मत्स्यो वेसवारेण संयुतः ॥ ८ ॥
शिलायां पेषितो भूयः प्रोच्यते मत्स्यपिष्टिका।
तैले विपाचयेत्पश्चाच्चतुर्थांशाम्लसंयुतम् ॥ ९ ॥
वेसवारेण च युतं शिलायां पेषयेत्पुनः ।
अनया पूर्ववत्कार्या मासस्येव प्रकारकाः ॥ १०॥
वटिका वटकाद्याश्च सूपकारधियोचिताः।