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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 136 में से

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पृष्ठ 54

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रक्तपित्तनाशक, हृद्रोगनाशक, शीतल, रुचिकारक, उत्तम पथ्य (हितकर) तथा लघु
(शीघ्रपाकी) होता है॥१९७-१९९॥
अथ कपोतः
कपोतको गुरुः स्निग्धो रक्तपित्तानिलापहः।
संग्राही शुक्रलः शीतः सुस्वादूरुचिकारकः॥२००॥
कपोत
कपोत के मांस का गुण- गुरु, स्निग्ध, रक्तपित्त, वातनाशक, संग्राही, वृष्य,
शीतल, स्नायु एवं रुचिकारक होता है॥२००॥
अथ मयूरः
मायूरं पाचितं मांसं घृते स्वोपस्करान्विते।
ईषल्लवणसंयुक्तं मरिचैलासमान्वितम्॥२०१॥
मायूरं मुष्णं काषायं कफानिलहरं गुरुः।
वर्षाकाले न तत्सेव्यं दुष्टकीटाहिभक्षणात्॥२०२॥
मयूर
क. विधि- मयूर का मांस उपस्कार (मसाला) आदि के साथ घृत में पाक करते हैं;
इसमें अल्पलवण, मरिच, एला चूर्ण मिश्रित करते हैं।
ख. गुणः- उष्ण, कषाय, कफ, वातनाशक, तथा गुरु (दुष्पच) होता है। वर्षाकल
में मयूर का मांस निषिद्ध है, क्योंकि इस समय दुष्ट कीटों, सर्पों का भक्षण करने
के कारण मयूर- मांस दूषित हो जाया करता है॥२०१-२०२॥
अथ हिताहितम्
सद्योहतं भवेन्मांसं व्याधिहारि सदाऽमृतम्।
वयःस्थमकृशं सात्मयमन्यथा परिवर्जयेत्॥२०३॥
वृद्धानां दोषलं मांसं बालानां बलदं गुरु।
च्युतगर्भा गुरुर्योषिद्गर्भो गर्भवती तथा॥२०४॥
स्वयं मृतमबल्यं स्यादातीसारकरं गुरु।
विषामृतानां मांसं तु दोषत्रयरुगावहमू॥२०५॥
विहङ्गेषु पुमाञ्छेष्ठः श्रेष्ठा स्त्री पशुयोनिषु।


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पश्चिमाधों लघुः पुंसां स्त्रीणां पूर्वार्धमादिशेत्॥२०६॥
तुल्यजातिस्वल्पदेहा महादेहेषु पूजिताः।
अल्पदेहेषु शस्यन्ते ये स्युर्विपिनचारिणः॥२०७॥
हिताहित
हितकर तथा अहितकर मांस का विवेचन (वर्णन) किया जा रहा है।
क. सद्यभृत पशु-पक्षी का मांस रोगनाशक एवं अमृत के समान प्रभावकारी होता है,
आयुष्य तथा शारीरिक दौर्बल्यहर तथा सात्म्य होता है।
ख. इसके विपरीत (बिम्ब से मृत पशु-पक्षी का मांस) हानिकर होने से, परित्याग
होता है।
ग. सामान्यतः पशु-पक्षी मांस, दोषोत्पादक, अत्यन्त बलदायक एवं गुरु दुष्पाचक
होता है।
घ. च्युतगर्भा (गिरे हुए गर्भ) वाले/ वाली मादा, (स्त्री जाति) के। की पशु-पक्षी का
मांस गुरु (कठिनाई से पाचक होता है। इसी प्रकार (गर्भवती) मादा का मांस मृद
होता है।
ङ. स्वयं मृत पशु-पक्षी का मांस दुर्बल, अतिसारकारक एवं गुरु हुआ करता है।
च. विषाक्तप्रभाव से मृत पशु-पक्षी त्रिदोषजनक तथा रोग जनक होता है।
छ. पक्षी मांस श्रेष्ठ तथा पशु योनि में मादा का मांस उत्तम माना जाता है।
ज. स्त्रियों के अग्रभाग तथा पुरुषों में पृष्ठभाग (पशु-पक्षी) ग्रहणीय होता है तथा
लघु (पुरुषमांस) माना गया है।
झ. स्थूल शरीर के पशु-पक्षी की तुलना में, सूक्ष्म (छोटे) शरीर के पशु-पक्षी का
मांस गुणों में होता है। अल्पदेह वाले (पशु-पक्षी) की अपेक्षा विपिन (वनो मे)
विचरण करने वाले का मांस श्रेष्ठ हुआ करता है॥२०३-२०७॥
चेष्टावता परं मांसं हृद्यं रुच्यं लघु स्मृतम्।
देहमध्यं गुरु प्रायः सर्वेषां प्राणिनां मतम्॥२०८॥
पक्षक्षेपपाद्विहङ्गानां तदेव वरमुच्यते।
गुरूम्प्यण्डानि सर्वेषां गुर्वी ग्रीवा च पक्षिणाम्॥२०९॥