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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 42

७८ क्षेमकुतूहलम् षष्ठोत्सवः ७९
घृत पक्व मांस
घृत के साथ पकाये मांस के गुण- लघु, रुचिकारक, पित्तशामक, शीत वीर्य,
बल्य, हृद्य एवं दृष्टि प्रसादन॥७३¹/२॥
अथ सुस्विन्नमांसरन्धनम्
सवेसवारपानीये हिङ्गुधान्यजलेऽथवा ॥ ७४ ॥
केवले वा जले स्वेदं मांसं सुस्विन्नको विधिः ।
पश्चाद्धाधारितं तप्ते स्नेहे सम्यक्करालिते ।। ७५ ।।
छमत्कारस्तथा कार्यो रुचिः स्यात्प्रतिवेशिनाम् ।
तत उद्धूलनं देयं शुद्धमांसमिति स्मृतम् ॥ ७६ ॥
सुस्विन्न मांसरन्धन विधि
वेसवार के जल में हिंगु एवं धान्यक के जल अथवा केवल जल में मांस पकाते
हैं। यह मॉस को सुस्विन्न करने की किया है।
सुस्विन्न मांस (पूर्वोक्त) को उष्ण तैल या घृत में तप्त (वघार) कर, मुतलित करे।
मांस को क्षमत्कार (छौंकने) की विशिष्ट रीति अपनायें, जिससे प्रतिविपीन (पड़ोस में/
निकट। या सह निवासियों) की रुचि में वृद्धि हो जाये। फिर मसाला का चूर्ण (उद्धूलन)
मिलाकर, शुद्ध मांस का निर्माण करते हैं॥७४-७६॥
सुस्विन्नमांस गुणाः
सुस्विन्नं कोमलं हृद्यं बल्यं वृष्यं रुचिप्रदम् ।
त्रिदोषशमनं चेति श्रेष्ठमग्निकरं परम् ॥ ७७ ॥
गुण (सुस्विन्न मांस)
कोमल, हृद्य, बल्य, वीर्यवर्धक (वृष्य), रुचिकर, त्रिदोषशामक, श्रेष्ठ अग्निकर
(दीपन)॥७७॥
अथ कोमलसुगन्धम्
कुठेर-पृथु-कर्चूर-गुञ्जापामार्गजस्तथा ।
कुठेरकादिजक्षारवारिणा चाशुकारिणा ॥ ७८ ॥
पाचितं धूपितं मांसं सुगन्धमतिकोमलम्।
कोमल सुगन्ध
कुठेरक, पृथु, गुंजा, अपामार्ग- इन सभी को शीघ्र प्रवेशीक्षार-जल के संयोग
मांस तथा सुगन्धित मांस, अति कोमल सुगन्धित होता है॥७८¹/२॥
सुगन्धं रुचिकृन्मांसं बल्यं वृष्यं रुजापहम् ।
अग्निसंजननं श्रेष्ठं ग्राम्यं वा जाङ्गलोद्भवम् ॥ ७९ ॥
सुगन्ध मांस गुण
ग्राम्य या जांगल प्राणि मांस रुचिकारक, बल्य, वीर्यवर्द्धक, रोगनाशक (रुजापहम्)
तथा श्रेष्ठ अग्नि संजनन (उत्तम दीपन)॥७९॥
अथाजमांसम्
तिलजतैलसुपाकपाचितं कासमर्दसुरसे विमर्दितम् ।
सूपधपभवधूमधूपितं मणिमन्थमथितं त्वजापलम् ॥ ८० ॥
यादृशा धातवो नृणां अजानामपि तादृशाः ।
अतो धातुविवृद्ध्यर्थमाजं मांसं प्रशस्यते ॥ ८१ ॥
अजा (बकरी) मांस
तिल तैल में सुपक्व कासमर्द (मसाले को छोंककर) भलीप्रकार सुमर्दित, सूप
(दाल) की सुगन्धित करने वाले सुगन्धित द्रव्यों के धूम से धूपित, सैंधव मिश्रण के
द्वारा अजा (बकरी) का मांस निर्माण करते हैं। जिसप्रकार मनुष्य की धातुएं हैं,
उसीप्रकार बकरी के शरीर में धातुओं की स्थिति होती है- इसप्रकार धातुवृद्धि हेतु
अजामांस को प्रशस्त (उत्तम-उत्तम) माना जाता है।८०-८१॥
अथ बर्करः
सहिङगुणाऽऽज्येन युतं सुपक्रमजासुतस्यामिषमल्पकस्य ।
एलालवङ्गोषणयोगयोगात् करोति पुष्टिं जठरानलस्य ॥ ८२ ॥
अजासुतस्य बालस्य मांसं गुरुतरं स्मृतम् ।
हृद्यं मृदुतरं श्रेष्ठं सुस्वादु बलदं भृशम् ॥ ८३ ॥
बर्कर (बाल बकरे) मांस
बर्कर (बकरी के बालक या छोटे बच्चे) का मांस में हिंगु भृष्ट कर, घृत में पक्व
मांस में एला, लवंग, मरिच का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करने से अग्निदीपन गुण कहता