कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
बृहत्कथासरित्सागर में इस तरह का क्रमभिक पेंचस्व नहीं है।
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ग्रम्भिक की कथाओं की रचना हुई हो। वस्तुतः धम्मिल्ल हिण्डी में धनवती सार्थवाह के पुत्र
धनदत्त के विषय में उल्लेख है कि उसने जहाज लेकर यवन विषय या यवन देश की व्यापारिक
यात्रा की थी और अपने साथ बहुत से सांप्रायिक व्यापारियों को ले गया था। शिलप्पधिकारम्
के अनुसार मलय-देश के व्यापारियों का घनिष्ठ सम्बन्ध पुहार या कावेरीपतन के व्यापारियों के
साथ था। बृहत्कथा की किसी दूसरी वाचना में धम्मिल्ल हिण्डी जैसा कोई वंश नहीं पाया जाता।
कम-से-कम बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह, क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी और सोमदेव-कृत
बृहत्कथासरित्सागर में इस तरह का क्रमभिक पेंचस्व नहीं है।
वसुदेव हिण्डी में धम्मिल्लक हिण्डी के अलावा छः विभाग थे—अर्थात कथा की उत्पत्ति
पीठिका, मुख, प्रतिमुख, शरीर और उपसंहार। कथोत्पत्ति पीठिका और मुख इनमें कथा
का प्रस्ताव हुआ है। प्रतिमुख में वसुदेव आत्मकथा का आरम्भ करते हैं। सत्यभामा के पुत्र
भानु के लिए १८ कन्याएँ इकट्ठी की गई थीं। किन्तु उनका विवाह रुक्मिणी के पुत्र शाम्ब से
कर दिया गया। इस पर प्रद्युम्न ने वसुदेव से कहा—'देखिए, साम्ब ने अन्त पुर में बैठे-बैठे १८
बहुएँ पा लीं जब कि आप १ वर्ष तक उनके लिए घूमते फिरे। इसके उत्तर में वसुदेव ने
कहा—'साम्ब तो कुएँ का मेढक है, जो सरलता से प्राप्त भोग से सन्तुष्ट हो गया। मैंने तो पर्यटन
करते हुए अनेक सुख और दुःखों का अनुभव किया। मैं मानता हूँ कि दूसरे किसी पुरुष के भाग्य में
इस तरह का उतार-चढ़ाव न आया होगा। वस्तुतः वसुदेव के इस छोटे-से सटीक वाक्य में उस
महान् युग की हलचल का बीज समाया हुआ है। उस समय के चैतन्य हृदय पश्चिम के यवन-देश से
पूर्व के यवद्वीप और सुवर्णभूमि तक के विशाल क्षेत्र को रात दिन ढूंढ़ते रहते थे। बाण के शब्दों में
कहा जाय तो उनके पैरों में मानों कोई द्वीपान्तरसंचारी पादलेप लगा हुआ था। वे यह मानते थे
कि द्वीपान्तरों की यात्रा किए बिना लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती (अलभ्यमटनं श्रीसमाकर्षणं
भवति)। मत्स्यपुराण के लेखक ने समुद्र को ललकारते हुए कहा है—हे उत्ताल तरंगोंवाले
महार्णव, आजतक शंखा आदिद्वीपों में निवास करनेवाले राक्षस ही तुम्हारे जल में आते-जाते रहे
हैं जिसके कारण उसमें कीच उठ खड़ी हुई है। अब अपने उस कलुष को शिखाओं से जुड़े हुए प्रांगण
से दूरक डालो, क्योंकि देवाधिदेव शिव अपने परिवार के साथ तुम्हारा संतरण करना चाहते हैं—
भूर्जालम्बाः कुरुत शिखिलोपमं पयः सुरद्विषाममल महातिकर्वमम्।
(मत्स्यपुराण, १५४—४५५)
जैसा सभापर्व में आया है, पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व की समुद्र-यात्राओं का ताँता
उस समय लगा रहता था (सभा ४९।१६)। दिव्यावदान में तो यहाँतक कहा है कि महासमुद्र
की यात्रा किए बिना अर्थोपार्जन की आशा ऐसी है, जैसे ओस की बूंदों से घड़ा भरने का प्रयत्न।
वसुदेव ने प्रद्युम्न को जो उत्तर दिया, वह मानव-हृदय के इन भावों के सर्वथा अनुकूल
था। निरन्तर पर्यटन और दूर-दूर के देशों में परिभ्रमण यही गुप्तों के स्वर्णयुग में जीवन की टेक
बन गई थी। एक बार नहीं कई-कई बार लोग जोखिम उठाकर भी समुद्रों की यात्रा करते थे।
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शूर्पारक-निवासी पूर्ण नाम के सार्थवाह के कथन से यह बात सूचित होती है— भाइयो महासमुद्र
की यात्रा में दुःख बहुत है, सुख थोड़ा है। बहुत-से जाते हैं, पर थोड़े ही लौट पाते हैं। क्या आपने
ऐसे किसी का नाम सुना है, जो छ' बार महासमुद्र की यात्रा से सफलता के साथ अपने जहाजों को
लेकर लौट आया हो ?' अवश्य ही सातवाहन-युग की सामुद्रिक यात्राओं के वातावरण में जिन
कहानियों का ठाट रचा गया और बृहत्कथा के रूप में गुणाढ्य ने जिनका संग्रह किया, उनकी मूल
भावना इसी प्रकार की जल-थल-सम्बन्धी हलचलों से पोषित थी। उसका भरपूर प्रभाव वसुदेव
हिण्डी और बृहत्कथा की दूसरी उत्तरकालीन वाचनाओं पर पड़ा। सोमदेव के कथासरित्सागर
में भी उत्तर-पश्चिम की ओर अपरगांधार की राजधानी पुष्यकलावती तक का उल्लेख है।
जहां उत्तरापथगामी वणिग्पुत्र म्लेच्छभूयसी भूमि को पार करते हुए पहुँचते थे और उनकी इस
यात्रा में महाप्रातिभ नामक शैव योगी भी उनके साथी के रूप में वितस्ता के उस पार के देशों में
चक्कर लगाते थे। दूसरी ओर समुद्रशूर वणिक की कथा है जो पूर्व दिशा में कटाहद्वीप, कर्पूर
द्वीप और स्वर्णद्वीप तक पहुँचकर लौटते हुए नारिकेलद्वीप में आया और फिर सिंहलद्वीप में
उतरा। इनमें से नारिकेलद्वीप वर्तमान निकोवार का पुराना नाम था जिसे राजेन्द्र चोल के लेखों
में नक्क्वरं कहा गया है। सुवर्णद्वीप सुमात्रा की संज्ञा थी जहाँ आठवीं शती में शैलेन्द्रवंशी
राजाओं ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जो लगभग तीन शती तक विजयशाली रहा।
सोमदेव के कानों में अवश्य ही शैलेन्द्रों के यश की भनक पड़ी होगी क्योंकि दो कहानियों में
उन्होंने स्वर्णद्वीप का उल्लेख किया है (तरंग ५४ श्लोक १ तरंग ५६ श्लोक ६२)। एक
कहानी में चन्द्रस्वामी नाम का सार्थवाह अपने खोए हुए पुत्रों को ढूंढ़ने के लिये पहले नारिकेलद्वीप
में जाता है (कथा ५६।५६) और फिर जहाज पर बैठकर समुद्रमार्ग से कटाहद्वीप पहुँचता है
(५६।६०) और वहाँ से आगे बढ़कर कर्पूरद्वीप तक चला जाता है। कर्पूरद्वीप से स्वर्णद्वीप और
स्वर्णद्वीप से सिंहलद्वीप लौटकर वहाँ से चित्रकूट या चित्तौड़ की यात्रा करता है (कथा ५६।
६१, ६२, ६३)। कटाहद्वीप मलय प्रायद्वीप का एक भाग था जिसे इस समय केडा कहते हैं और
राजेन्द्र चोल के लेखों में उसे कडारं कहा गया है। कुमारदास के जानकीहरण-काव्य में भी कटाह
द्वीप का उल्लेख आया है।२ कटाहद्वीप की यात्रा में नारिकेलद्वीप एक पड़ाव के समान था। उसके
वर्णन में सोमदेव ने लिखा है—
अस्ति मध्ये महम्भोधेः श्रीमद्द्दीपवरं महत्।
प्रभारिकेलदीपाख्यं स्यातं जगति सुन्दरम्॥ (५४।१४-१५)
१ भ्रात महासमुद्रो बह्वादीनवोऽल्पास्वाद बहवोऽवतरन्ति अल्पाव्युत्तिष्ठन्ति।
भवन्तोऽस्ति कश्चित् युष्माभिर्दृष्टः श्रुतो वा यःषट्कृत्वो महासमुद्रान् ससिद्धयानपात्रश्च प्रत्यागतः॥
—(दिव्यावदान, पूर्णावदान पृ० २४-३५)।
२ समुद्रमुत्सङ्घय पतत्तदीयरत्नोदकैरन्थिपातो गुफरन्ध्रिरिङः।
नितान्ततप्तानिपपूर्वशष्पडैः प्रोत्सवेयामास नृपं कटाहैः॥ (१।१०)
वराहद्वीप से आज जिस वायुद्वीप का वर्णन है वह इन्दोनेशिया का वाराह द्वीप होना चाहिए और संभव
है वह वराह नामक असुर की जन्मभूमि आजकल का वराह माना जाता हो जिसे मध्ययुग में
वारुश द्वीप कहते थे। कथासरित्सागर में दीपान्तर व मलयपुर का भी उल्लेख है, जहाँ के
राजा की पुत्री मलयवती के साथ विक्रमादित्य ने विवाह किया था।१
गुणाढ्य से लेकर सोमदेव के समय तक भारतीय कहानियों के विस्तृत भौगोलिक क्षितिज
का उल्लेख बहुत दिया गया है। उसमें समुद्रिक परिभ्रमण के लिए प्राकृतभाषा में हिण्डी इस छोटे
सार्थक शब्द का निर्माण किया गया। उसी के अनुसार संघदास ने गुणाढ्य-कृत बृहत्कथा की
शैली को तो अपनाया किन्तु अपने ग्रन्थ का नाम बदलकर वसुदेव हिण्डी कर दिया। प्रद्युम्न
ने कुछ दावानल में बूढ़े वसुदेव को जिस प्रकार छोड़ दिया था उससे वसुदेव के मन में आप-बीती
सुनाने के लिए एक फरहरी-सी उत्पन्न हो गई और २९ लम्भकों के रूप में उन्होंने अपने २९ विवाहों
की कहानियाँ सुना डालीं। इन्हीं से वसुदेव हिण्डी ग्रन्थ का 'शरीर' बना है। ग्रन्थ के अन्त में
उपसंहार नाम का अन्तिम भाग भी था जो इस समय प्राप्त नहीं है।
बृहत्कथा के प्राचीनतम रूपान्तर वसुदेव हिण्डी के विषय में प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् आल्म-
डोर्फ ने बहुत अनुसन्धान के बाद जो इस प्रकार लिखा है वह ध्यान देने योग्य है— गुणाढ्य की
बृहत्कथा निस्सन्देह प्राचीन भारतीय साहित्य का एक रसमय और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इस लुप्त
ग्रन्थ के ठीक प्रकार पुनर्गठन का कार्य अत्यन्त रोचक है। सोमदेव कृत कथासरित्सागर और
क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी के रूप में काश्मीरी रूपकों की दो कृतियाँ जबतक विदित थीं तबतक
बृहत्कथा के स्वरूप का अनुमान करना सरल था। किन्तु जब उससे आश्चर्यजनक रीति से भिन्न
बृहत्कथा का नेपाली रूपान्तर बुधस्वामी के बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के रूप में प्राप्त हुआ तब यह
समस्या कुछ कठिन हो गई। फ्रेंच विद्वान् लाकोत ने 'गुणाढ्य एवं बृहत्कथा' नामक १९०८ में
प्रकाशित अपनी पुस्तक में इस क्लिष्ट प्रश्न को विलक्षण निपुणता से सुलझाने का प्रयास किया और
वे इस निर्णय पर पहुँचे—'आज तो काश्मीरी रूपान्तरों (कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी)
में गुणाढ्य की मूल बृहत्कथा अत्यन्त भ्रष्ट एवं अव्यवस्थित रूप में उपलब्ध है। इन ग्रन्थों में अनेक
स्थलों पर मूल ग्रन्थ का संक्षिप्त सारोद्धार कर दिया गया है और इनमें मूल के कई अंश छोड़ भी दिए
गए हैं एवं कितने ही नये अंश प्रक्षेप रूप में जोड़ दिये गये हैं। इस तरह मूल ग्रन्थ की वस्तु और
आयोजना में बेडौल फेरफार हो गये। फलस्वरूप इन काश्मीरी कृतियों में कई प्रकार की असंगतियों
का गर्व और छोड़े हुए अंशों के कारण मूलग्रन्थ का स्वरूप पर्याप्त भ्रष्ट हो गया। इस स्थिति
में बुधस्वामी के ग्रन्थ से वस्तु की आयोजना द्वारा मूल प्राचीन बृहत्कथा का सच्चा चित्र प्राप्त होता
है। किन्तु खेद है कि यह चित्र पूरा नहीं है क्योंकि बुधस्वामी के ग्रन्थ का केवल चतुर्थांश ही
उपलब्ध है। इसलिए केवल उसी अंश का काश्मीरी कृतियों के साथ तुलनात्मक मिलान शक्य है।
१ दृष्टं मया तन्मलयपुरं नाम महापुरम्।
श्रीमत्ताम्रपुरीयं वारिनिधेर्द्विपमध्यगम्॥ (१२।१।७९)
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'लाकोत के उपर्युक्त मत के साथ श्रीविण्टरपित्स सहमत हैं (हिस्ट्री ऑफ इण्डियन
लिटरेचर, भाग १)। किन्तु आज तक मिले हुए रूपान्तरों के आधार से मूल ग्रन्थ की पुनः घटना
करने के प्रयत्न को वे व्यर्थ मानते हैं। उनके मतानुसार लाकोत का मत संदिग्ध है और अपर्याप्त
सामग्री की सहायता से प्रतिपादित किया गया है। विण्टरपित्स के इस कथन में इतना ही यथार्थ
है कि जबतक और अधिक सामग्री न मिले तबतक लाकोत के निर्णयों में बहुत सुधार की गुंजाइश
नहीं। जब १९०८ में लाकात ने अपना ग्रन्थ लिखा था उसके साथ बृहत्कथा की कठिन समस्या को
सुलझाने के लिये कोई उपयोगी सामग्री न मिली थी।
"अब जैनों के पास काश्मीरी और नैपाली इन दोनों रूपान्तरों से विस्तृत बृहत्कथा का एक
रूपान्तर प्राप्त हुआ है, जो ध्यान खींचता है और आश्चर्यजनक है। नरवाहनदत्त के पराक्रम को
जैनों ने कृष्ण के पिता वसुदेव पर आरोपित कर दिया है। वसुदेव हिण्डी (वसुदेव का परिभ्रमण)
यह जैनों की पुरानी कथाओं में एवं विश्व के प्राचीन कथा-साहित्य में एक महत्त्व का ग्रन्थ है। वर्षों
पहले प्रकाशित हेमचन्द्र के त्रिपष्टिशलाकापुरुषचरित्र में श्रीनेमिनाथ चरित्र के अन्तर्गत वसुदेव
का चरित्र भी आया है। उसमें जैन बृहत्कथा की रूपरेखा दिखाई पड़ती है। उसमें एवं श्रीकृष्ण
की प्राचीन कथाओं से सम्बन्धित जैन ग्रन्थों में इसका संक्षिप्त सार प्राप्त होता है। किन्तु कुछ
वर्ष हुए, भारतवर्ष में संघदासगणि कृत जो वसुदेव हिण्डी नामक ग्रन्थ ज्ञात हुआ है वह अपने
विस्तार और विषय के कारण जैन बृहत्कथा में हुए परिवर्तनों को जान लेना सुगम करता है।
आवश्यकचूर्णि में तीन बार वसुदेव हिण्डी का उल्लेख है जिससे ज्ञात होता है कि ६ ईसवी के
आसपास इसकी रचना की अन्तिम मर्यादा थी। ग्रन्थ की अत्यन्त प्राचीन भाषा से भी उसका
रचना-काल प्राचीन सूचित होता है। लगता है कि इस नए मिले हुए प्राकृत-ग्रन्थ में बृहत्कथा का
प्राचीनतम रूपान्तर प्राप्त हो गया है। किन्तु इस ग्रन्थ में बृहत्कथा की वस्तु को श्रीकृष्ण की प्राचीन
कथा के आधार पर गूंथ दिया गया है जो हर्मनया श्रीयाकोबी के मतानुसार जैनों में ईसवी
सन् से ३ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुकी थी। श्रीयाकाबी मानते हैं कि ईस्वी-सन् के प्रारम्भ
तक जैन पुराण-कथा सम्पूर्ण बन चुकी थी। जिस समय जैनों ने बृहत्कथा को अपनी पुराण-कथा
के डम्बर में शामिल किया उस समय वह एक सुप्रसिद्ध कवि की कृति होने के अतिरिक्त दैव
कथा की भव्यता से प्रकाशमान प्राचीनतर युग की रचना मानी जाने लगी थी जिसकी महत्ता
पुराण एवं महाकाव्यों की कथाओं के समान हो गई थी। इसका अर्थ यह हुआ कि बृहत्कथा के
जैन रूपान्तर से मूल बृहत्कथा का रचनाकाल कई शती प्राचीनतर मानना पड़ता है। श्रीबूलर ने
गुणाढ्य का समय ईस्वी-सन् की पहली या दूसरी शती में और लाकोत ने तीसरी शती में माना था।
उसके बदले यदि बहुत प्राचीन समय में नहीं तो उसे ईस्वी-सन् की पहली या दूसरी शती पूर्व में
मानना चाहिए।
'लाकोत के मत के अनुसार नष्ट हुई बृहत्कथा की आयोजना इस प्रकार थी—प्रस्तावित
भाग में उदयन और उसकी रानी वासवदत्ता एवं पद्मावती की सुविदित कथा थी। वासवदत्ता
का पुत्र नरवाहनदत्त जब युवा राजकुमार की अवस्था को प्राप्त हुआ तब उसका गन्धर्वपुत्री
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मदनमंचुका से प्रेम हो गया। उसने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध उससे विवाह कर लिया।
एक विद्याधर राजा मदनमंचुका को हर ले गया। मदनमंचुका की खोज करते हुए नरवाहनदत्त
ने विद्याधर-लोक और मनुष्य-लोक में नये-नये पराक्रम किए। शीर्ष पराक्रम के बाद मदनमंचुका
से उसका मिलन हुआ वह स्वयं विद्याधर चक्रवर्ती बना और मदनमंचुका उसकी पटरानी हुई।
इससे पूर्व उसके पराक्रमों की सूची में वह हर बार एक स्त्री से विवाह करता है। इस प्रकार के
प्रत्येक पराक्रम के अन्त में गुणाढ्य ने उसका लम्भ यह नाम रखा। इस रीति से नरवाहनदत्त की
कथा वेगवती लम्भ अजिनावती लम्भ प्रियदर्शना लम्भ इत्यादि प्रकरणों में विभक्त थी।
जैन परम्परा के अनुसार (वसुदेव हिण्डी में) श्रीकृष्ण की प्राचीन कथा की योजना
इस प्रकार हुई—वसुदेव अपने बड़े भाई के साथ अनबन होने के कारण घर छोड़कर चले गए और
पीछे लम्बे परिभ्रमण के दरम्यान नरवाहनदत्त की तरह पराक्रम करते रहे और अन्त में अपनी
अन्तिम पत्नी के रूप में उन्होंने रोहिणी को प्राप्त किया। इस समय अकस्मात् वसुदेव का अपने
बड़े भाई के साथ मेल हो गया और वे अपने कुटुम्ब के साथ मिलकर रहने लगे। मदनमंचुका
से मिलने और राज्याभिषेक के प्रसंग इस कथा में छोड़ दिए गए हैं क्योंकि कृष्ण की कथा के प्रसंग
में उनकी संगति न थी। पर मदनमंचुका के साथ प्रणय प्रसंग का जो विस्तृत वर्णन अन्तिम विवाह
में आता था उसे श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ जोड़ दिया गया यह कुछ समझ में नहीं आता।
मदनमंचुका के अपहरण का प्रसंग भी वसुदेव के पराक्रमों के वर्णन में छोड़ दिया गया है। कथा के
मूलभूत पात्र मदनमंचुका के स्थान में यहां दो पात्र हो गए हैं गणिकापुत्री सुहिरण्या और
राजकन्या सोमश्री।
"इस तरह मूल बृहत्कथा की वस्तु और उसकी आयोजना की कई एक अनावश्यक
घटनाएं इसमें होने से नष्ट हुए मूल ग्रन्थ के स्वरूप के विषय में जैन रूपान्तर की प्राप्ति से कई
महत्त्वपूर्ण तथ्य ज्ञात होते हैं।
"इससे आगे उल्लेखनीय बात यह है कि काश्मीरी रूपान्तर (कथासरित्सागर) में १८
लम्बकों में कथा विभक्त है। यहाँ भ्रष्ट रूप में प्राप्त लम्बक शब्द की बात हम नहीं कहते। 'म'
के बदले 'ब' यह शब्द प्राकृत के अनुसार स्वाभाविक रीति से मूल ग्रन्थ का नहीं है। लम्बक
(लम्भक) का अर्थ वह प्रकरण हो सकता है जिसमें नरवाहनदत्त एक पत्नी प्राप्त करता है। पर
उदयन की कथा में और ग्रन्थ के आरम्भिक भाग में भी यह शब्द आता है। तो मानना पड़ेगा कि
गुणाढ्य के कथा लिखने तक उसके अर्थ का विस्तार नहीं हुआ था। बुधस्वामी का बृहत्कथा-
श्लोकसंग्रह काव्यों के समान सर्गों में विभक्त है और उसके उपलब्ध अंश में २८ सर्ग हैं। सब नहीं
तो अनेक सर्गों के अन्त में लम्भ शब्द के बदले उसका पर्याय 'लाभ' शब्द मिलता है और जानबूझ
कर नियम के रूप में एक लाभ में कई संख्याबद्ध सर्गों का समावेश कर दिया जाता है। लाकोत
मानते हैं कि गुणाढ्य की कृति रामायण की तरह अलग-अलग काण्डों में विभक्त थी एवं मुख्य
कथा-भाग लम्भों के सहित काण्डों में रचा गया था। जैन रूपान्तर में लम्भ का प्रयोग अपने मूल
अर्थ में अर्थात् नरवाहनदत्त की (यहाँ वसुदेव की) विजय के वर्णनात्मक मुख्य कथा भाग के प्रकरणों
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के नामकरण के लिये हुआ है। इस मुख्य कथा-भाग को 'शरीर' कहा गया है और ग्रन्थ के
७ अधिकारों में यह पांचवाँ है। कथा की उत्पत्ति पीठिका मुख और प्रतिमुख ये चार अधिकार
उससे पहिले आते हैं। 'शरीर' के पीछे उपसंहार होना चाहिए था पर ग्रन्थ का अन्तिम भाग
त्रुटित होने से वह नहीं मिलता। मुख्य कथा भाग-रूप 'शरीर' की अपेक्षा से लम्भों का समूह ग्रंथ
बडा गौण था। मूल प्राचीन बृहत्कथा में आमूलचूल विभागीकरण नहीं था। प्रस्तावित कथा
प्रकरण के बाद दूसरे नामकरण के साथ संख्या बध्य लम्भ थे और उसके बाद उपसंहार था।
संस्कृत रूपान्तरों में केवल बृहत्कथामंजरी में उपसंहार का निवेश है, पर लाकोत उपसंहार को
मूलकथा का गौण अंग गिनते हैं। वसुदेव हिण्डी से सिद्ध होता है कि मूल बृहत्कथा में उपसंहार
था। सोमदेव ने अपने कथासरित्सागर में उपसंहार निकाल दिया है पर उसके अतिरिक्त
क्षेमेन्द्र में प्राप्त कुछ प्रकीर्ण बातों बत के बाद सोमदेव ने नरवाहनदत्त के तमाम लम्भकों की एक
सूची अपने ग्रन्थ के आरम्भ में दी है। उससे ज्ञात होता है कि बृहत्कथामंजरी के आरम्भ में
भी मूलग्रन्थ की विषय-सूची थी जो अब नष्ट हो गई है।
अपने ग्रन्थ में कथा-उत्पत्ति यह शुद्ध जैन कथामात्र है पर पीठिका और मुख की बाबत
ऐसा नहीं। बुधस्वामी की कृति में 'कथामुख' यह तीसरे सर्ग का नाम है पर पहले बेनाम के
दो सर्ग भी कथामुख के ही प्रारम्भिक भाग हैं। अर्थ-संपत्ति की दृष्टि से कथामुख में जो होना चाहिए
वह उसमें है, अर्थात् कथा कहनेवाले का परिचय। कथा कहने का प्रसंग किस रीति से उपस्थित
हुआ यह उसमें बताया गया है। नरवाहनदत्त अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त उत्तमपुरुष में कहते हैं।
काश्मीरी लेखकों ने दूसरे लम्बक का नाम कथामुख लम्बक रखा है। इसमें उदयन की कथा
आती है। बुधस्वामी ने कथामुख में जो भाग आता है वह (कथामृत के लेखकों ने) उस ग्रन्थ
के अन्त में रखा है और नरवाहनदत्त आत्म-वृत्तान्त कहते हैं ऐसा भी स्पष्ट उल्लेख स्वयं नहीं
किया। इतना ही नहीं कथा का बयान प्रथमपुरुष में तटस्थ रीति से किया है। नेपाली रूपान्तर
की सच्चाई और काश्मीरी रूपान्तर की भ्रष्टता सिद्ध करने में लाकोत का यही मुख्य प्रमाण है।
इस अनुमान को जैन रूपान्तर से भी समर्थन मिलता है। इसमें भी वसुदेव अपना सब वृत्तान्त
भागवत कथा के रूप में उत्तमपुरुष में ही कहते हैं। 'कथामुख' अथवा उसके तैयार किए हुए प्रति-
मुख द्वारा बताया गया है कि भागवतकथा किस प्रकार कही गई।
काश्मीरी लेखक सोमदेव और क्षेमेन्द्र ने कथारीठ का पहला लम्बक कहा है। गुणाढ्य
कवि-संबंधी कथानक उसका विषय है। उसके देखने से ज्ञान होता है कि गुणाढ्य कवि-संबंधी
कथानक का मूल कथा में होना संभव न था। बुधस्वामी के रूपान्तर में कथारीठ शायद देखने में
नहीं आता। किन्तु जैसा ऊपर कहा है बुधस्वामी का प्रारम्भिक भाग ही कथामुख है। इस आधार
में लाकोत निश्चित रूप से मानते हैं कि गुणाढ्य के मूल ग्रंथ में ही कथारीठ अंश नहीं था पर
वसुदेव हिण्डी में पीठिका (पेडिया) भाग के होने से मानना पडता है कि बृहत्कथा में भी कथारीठ
नामक भाग था। इस कथारीठ का विषय क्या था यह एक प्रश्न है। गुणाढ्य-संबंधी कथानक
तो इसमें न रहा होगा और वसुदेव हिण्डी की पीठिका में कृष्ण-संबंधी कथा का जो भाग है वह
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भी उसमें न होगा। नैपाली रूपान्तर में तो कथापीठ है ही नहीं पर काश्मीरी रूपान्तरों में
पीठ अर्थात् कथापीठ है। इससे यह सम्भावित है कि नैपाली रूपान्तर, अर्थात् बुधस्वामी-कृत
बृहत्कथाश्लोकसंग्रह में मूल कथापीठ के कुछ अंश मिल-जुल गए हैं। काश्मीरी रूपान्तरों में
उदयन वासवदत्ता और पद्मावती की सम्पूर्ण कथाएँ हैं, पर बुधस्वामी में वे नहीं हैं। कुछ विद्वानों
का मत है कि बुधस्वामी के ग्रन्थ का आरम्भिक भाग शायद खण्डित है। दूसरी ओर मूल प्राचीन
बृहत्कथा के एक भाग के रूप में उदयन की कथा के होने के विषय में कुछ विद्वानों ने शंका उठाई
है (दे विन्तरनित्स भारतीय साहित्य का इतिहास भाग ३)। इस प्रकार की मिली हुई कथा
घटनाओं का विवरण यहाँ संभव नहीं तो भी वसुदेव हिण्डी के आधार पर मैं निश्चयपूर्वक यह
मानता हूँ कि प्राचीन बृहत्कथा में उदयन-संबंधी कथाएं कथामुख से पूर्व कथापीठ नामक भाग
में सम्मिलित थीं। बुधस्वामी ने बिना कारण इन कथाओं का असमावेश किया है। मूल प्राचीन
बृहत्कथा की वस्तु आयोजना के परिणामस्वरूप उत्पन्न कुछ कालानुक्रमविषयक कठिनाइयों से
बचने के लिए काश्मीरी लेखकों ने कथापीठ में समाविष्ट वर्ण्य विषय का अलग रीति से प्रयोग
किया। मूल प्राचीन बृहत्कथा में वस्तु की आयोजना इस प्रकार होनी चाहिए थी—
(१) कथापीठ—उदयन और उसकी रानियों की कथाएँ
(२) कथामुख—कथा कहने वाले के रूप में नरवाहनदत्त का परिचय
(३) नरवाहनदत्त द्वारा घटित जन्मों की शृंखला और
(४) उपसंहार।
"बुधस्वामी के बृहत्कथाश्लोकसंग्रह द्वारा बृहत्कथा का जो नैपाली रूपान्तर प्राप्त हुआ
है उसके अनेक कथा-प्रसंगों का वसुदेव हिण्डी के साथ साम्य है। काश्मीरी रूपान्तरों के मुकाबले
नैपाली रूपान्तर, मूल बृहत्कथा का सच्चा चित्र प्रस्तुत करता है। लाकोते का यह मत पूरी तरह
मान्य है। उदाहरण के लिए वसुदेव हिण्डी की गणिकापुत्री सुहिरण्या की तरह ही बृहत्कथा-
श्लोक-संग्रह की मदनमंजुका भी एक वारांगना की पुत्री है, पर काश्मीरी रूपान्तरों में मदनमंचुका
एक बौद्ध राजा की दौहित्री है। वसुदेव की पत्नी गंधर्वदत्ता एक वणिक की दत्तक पुत्री है। बुध
स्वामी में भी यह प्रसंग इसी प्रकार है, पर काश्मीरी रूपान्तर में गान्धार देश का राजा दोनों
का स्वामी है। गन्धर्वदत्ता के पालन करनेवाले पिता की आत्मकथा समुद्री यात्रा में पराक्रम
करने की अत्यन्त रम्यपूर्ण कथा है, एवं इसका यह अंश अलिफ़ लैला की कहानियों जैसा है। यह
पूरी कथा काश्मीरी रूपान्तरों में छोड़ दी गई है। वसुदेव हिण्डी का कथानक इस अंश में बुध
स्वामी से मिलता है। उसमें भी इसम कुछ अंश अधिक रसपूर्ण हैं। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के
पाँच बड़े और आवश्यक अंश काश्मीरी रूपान्तरों में लुप्त हैं। वे वसुदेव हिण्डी में देखने को मिलते
हैं। दूसरी बात यह थी, स्मारक, इसके पोषक हैं कि काश्मीरी रूपान्तर के जिन अंशों को स्पीयर ने
मूल प्राचीन बृहत्कथा का साझा यथार्थ और प्रक्षिप्त माना था और ऐसे अंश काश्मीरी रूपान्तरों
में रहे जिन?—उनका मात्र विसतेवाद का अंश वसुदेव हिण्डी में भी नहीं है, अर्थात् अबतक
जो बिल्कुल सम्भावित मान परत थे, पर बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के अपूर्ण होने के कारण जो निज
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नहीं किए जा सकते थे वे भी अब साबित हो गये हैं। एक तरफ प्राचीन मूल बृहत्कथा का एक
बड़ा भाग काश्मीरी रूपान्तरों में लुप्त हो गया है दूसरी ओर काश्मीरी रूपान्तरों का एक बड़ा
अंश मूल बृहत्कथा से उत्पन्न नहीं हुआ। अंत में यह भी साबित होता है कि काश्मीरी लेखकों के
सामने बृहत्कथा का हाड़-पंजर मात्र था। किन्तु वसुदेव हिण्डी और बृहत्कथाश्लोकसंग्रह इन
दो रूपान्तरों के रचयिताओं के सामने मूल बृहत्कथा का एक अत्यन्त रस-पूर्ण जीवन्त और अतीत
की सामग्री से भरा हुआ स्वरूप था। काश्मीरी रूपान्तरों की ऊपर कही हुई त्रुटियों के कारण
अब इसकी छानबीन होना कठिन है कि बुधस्वामी में गुणाढ्य के मूल ग्रंथ की वस्तु-संरचना और
उसकी प्राणवत्ता का किस हद तक उत्तराधिकार सुरक्षित है। किन्तु यहाँ बुधस्वामी के विषय
म अपना विश्वास बहुत अंश में दृढ़ होता है। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह एवं वसुदेव हिण्डी के बीच में
संख्या-संबंधी भेदों के कारण यह कहना कठिन है कि इन दोनों ग्रंथों में कौन किसका आधार था।
पर, जिन अंशों के संबंध में विचार हो सकता है उनसे ज्ञात होता है कि बृहत्कथाश्लोकसंग्रह और
वसुदेव हिण्डी के बीच में छोटी-से-छोटी बातों में एवं वर्णन की सम्पूर्ण कला में इतना रोचक साम्य
है कि यह मानने में संदेह नहीं रहता कि दोनों के लेखकों के सम्मुख कवि गुणाढ्य का मूल रूप कम-
से-कम अन्तर के साथ विद्यमान था। अन्त के कथाभागों में तो वसुदेव हिण्डी प्राचीन बृहत्कथा
का विशिष्ट रसप्रद और लाक्षणिक नमूना है। एवं सर्वांश में अवलोकन करने से भी यह जान
पड़ता है कि मूल बृहत्कथा की लाक्षणिकता एवं गुणाढ्य की काव्य-शक्ति अपने अधिकांश
जीवन्त रूप में वसुदेव हिण्डी में विद्यमान है। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के आधार पर विण्टरनित्स
ने जो बुधस्वामी की भारी प्रशंसा की है उसका अधिकांश श्रेय गुणाढ्य को ही मिलना
चाहिए। १
गुणाढ्य की बृहत्कथा किसी समय व्यास-कृत महाभारत के समान अपने देश के काव्य
और कथा-साहित्य पर छाई हुई थी। आज वह काल के विशाल अंतराल में न जाने कहाँ विलीन
हो गई है। इसलिए उसके विषय में उसके उत्तरकालीन रूपान्तर एवं वाचनाओं से ही अनुमान
की कुछ कड़ियाँ जोड़नी पड़ती हैं। जिस महती कथा के विषय में कालिदास सुबन्धु बाण दण्डी
धनिक गोवर्धन आदि आचार्यों ने इस प्रकार प्रशंसा के ग्रन्थ लिखे हैं सचमुच वह भारतीय
वाङ्मय की कोई अमूल्य रचना थी। कोलार-क्षेत्र के गुम्मा रेड्डीपुर से प्राप्त एक ताम्रपत्र में
जो राजा दुर्विनीत के चालीसवें वर्ष (छठी शती के पूर्वारम्भ) में दिया गया कहा है कि राजा
दुर्विनीत ने एक व्याकरण किरातार्जुनीय के पंद्रह सर्गों की टीका और बृहत्कथा का संस्कृत में एक
१ दे श्री भोगीलाल जे सान्डेसरा-कृत वसुदेव हिण्डी का गुजराती भाषान्तर, पृष्ठ
११३। आल्टडोर्फ के Eine neve Version der Verlorenen Bṛhatkathā des
Guṇāḍhya (A new version of the lost Bṛhatkathā of Guṇāḍhya) नामक
जर्मन-निबन्ध का गुजराती अनुवाद श्री रसिकलाल पारिख ने किया था।
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रूपान्तर किया था।१ न केवल भारतवर्ष वरन् बृहत्तर भारत के द्वीपान्तरों में भी गुणाढ्य का
यश छा गया था। कम्बोज के महाराज यशोवर्मन् के लेखों में तीन बार गुणाढ्य का उल्लेख
आया है जहाँ उसे प्राकृतप्रिय विशेषण दिया गया है। बारहवीं शती तक यह ग्रन्थ विद्यमान था
और उसके बाद उसका कोई चिह्न शेष न रहा यह आश्चर्य की बात है। हो सकता है कि सोमदेव
की अद्भुत सफलता ने गुणाढ्य को नामशेष करा दिया। धन्वन् के अनुसार गुणाढ्य का जन्म
गोदावरी के किनारे प्रतिष्ठान नगर में हुआ था। सोमदेव से भी इसका समर्थन होता है। यह
शातवाहन वंश के सम्राट् हाल या शालिवाहन की राजधानी थी। विद्वाना के अनुसार शालिवाहन
या सातवाहन प्रथम शती ईसवी में हुए। साकल का अनुमान है कि गुणाढ्य का जन्म मथुरा में
हुआ था बाद में वे उज्जयिनी या कौशाम्बी में जाकर रहने लग गये ।
बुधस्वामिन् का बृहत्कथाश्लोकसंग्रह बृहत्कथा की नेपाली वाचना कहलाती है। इसमें
अट्ठाईस सर्गों में लगभग ४५३९ श्लोक हैं। या तो मूल में ही यह ग्रंथ अधूरा रह गया या इस
समय त्रुटित मिला है। इसमें नरवाहनदत्त अपने अट्ठाईस विवाहों में से केवल छः की कथा कह
पाया है। यदि इसी दर पर सारी कथा कही जाती तो लगभग १९ हजार श्लोकों में पूरी कहानी
का फैलाव होता और नरवाहनदत्त के राज्य-विस्तार और अभिषेक की कथा मिलाकर इसमें लग
भग २५ सहस्र श्लोकों का विस्तार बैठता और सर्गों की संख्या भी १ म कम न होती।
काव्य के आरम्भ में उज्जयिनी की प्रशंसा और वहाँ के शासक महासेन प्रद्योत की मृत्यु
का उल्लेख है। उसके बाद उसका पुत्र गोपाल गद्दी पर बैठा किन्तु पितृहन्ता होने के अपयश से
उसने राज्य छोड़ दिया और उसका भाई पालक राजा हुआ। उसने भी राज्य त्याग दिया और
गोपाल का पुत्र अवन्तिवर्धन सिंहासन पर बैठा। उसके उपरान्त सुरतमंजरी के साथ उसके प्रेम
की कथा आती है और चौथे सर्ग से नरवाहनदत्त की प्रेम-कहानियाँ ग्रंथ में स्थान घेरती हैं।
बुधस्वामिन् भी कोई कम प्रतिभाशाली लेखक न था। उसने लगभग पाँचवीं शताब्दी में अपने
ग्रंथ की रचना की और गुप्त वंश की स्वर्ण-संस्कृति की अनेक संस्थाओं के वातावरण में प्रवाहमयी
संस्कृत-शैली में ग्रंथ का निर्माण किया।
बुधस्वामिन् के बाद संस्कृत-वाचना की प्राप्ति न होकर संघदासगणि-कृत वसुदेव हिण्डी
की प्राकृत-वाचना ही अबतक प्राप्त हुई है जिसके संबंध में आवश्यक विवरण ऊपर दिया
जा चुका है और जिसने बृहत्कथा के ढके हुए पदों का उद्घाटन करने में पर्याप्त योग
दिया है।
इसके अनन्तर क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी का स्थान आता है। क्षेमेन्द्र काश्मीर के राजा
अनन्त (१०२९ १ ९०) की सभा के सभासद थे। उनका दूसरा नाम व्यासदास था। उन्होंने
१ शब्दानुशासनकारेण दैवभारतीनिबद्धकवेन किरातार्जुनीये पंचदशसर्गटीकाकारेण
दुर्विनीतनामधेयेन, [मैसूर पुरातत्त्व-विभाग की वार्षिक रिपोर्ट १९१२ पृष्ठ ३५ ३९
Indian Antiquary ४२।२ ४ JRAS १९१३ १८९।]