कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवराहद्वीप से आज जिस वायुद्वीप का वर्णन है वह इन्दोनेशिया का वाराह द्वीप होना चाहिए और संभव
है वह वराह नामक असुर की जन्मभूमि आजकल का वराह माना जाता हो जिसे मध्ययुग में
वारुश द्वीप कहते थे। कथासरित्सागर में दीपान्तर व मलयपुर का भी उल्लेख है, जहाँ के
राजा की पुत्री मलयवती के साथ विक्रमादित्य ने विवाह किया था।१
गुणाढ्य से लेकर सोमदेव के समय तक भारतीय कहानियों के विस्तृत भौगोलिक क्षितिज
का उल्लेख बहुत दिया गया है। उसमें समुद्रिक परिभ्रमण के लिए प्राकृतभाषा में हिण्डी इस छोटे
सार्थक शब्द का निर्माण किया गया। उसी के अनुसार संघदास ने गुणाढ्य-कृत बृहत्कथा की
शैली को तो अपनाया किन्तु अपने ग्रन्थ का नाम बदलकर वसुदेव हिण्डी कर दिया। प्रद्युम्न
ने कुछ दावानल में बूढ़े वसुदेव को जिस प्रकार छोड़ दिया था उससे वसुदेव के मन में आप-बीती
सुनाने के लिए एक फरहरी-सी उत्पन्न हो गई और २९ लम्भकों के रूप में उन्होंने अपने २९ विवाहों
की कहानियाँ सुना डालीं। इन्हीं से वसुदेव हिण्डी ग्रन्थ का 'शरीर' बना है। ग्रन्थ के अन्त में
उपसंहार नाम का अन्तिम भाग भी था जो इस समय प्राप्त नहीं है।
बृहत्कथा के प्राचीनतम रूपान्तर वसुदेव हिण्डी के विषय में प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् आल्म-
डोर्फ ने बहुत अनुसन्धान के बाद जो इस प्रकार लिखा है वह ध्यान देने योग्य है— गुणाढ्य की
बृहत्कथा निस्सन्देह प्राचीन भारतीय साहित्य का एक रसमय और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इस लुप्त
ग्रन्थ के ठीक प्रकार पुनर्गठन का कार्य अत्यन्त रोचक है। सोमदेव कृत कथासरित्सागर और
क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी के रूप में काश्मीरी रूपकों की दो कृतियाँ जबतक विदित थीं तबतक
बृहत्कथा के स्वरूप का अनुमान करना सरल था। किन्तु जब उससे आश्चर्यजनक रीति से भिन्न
बृहत्कथा का नेपाली रूपान्तर बुधस्वामी के बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के रूप में प्राप्त हुआ तब यह
समस्या कुछ कठिन हो गई। फ्रेंच विद्वान् लाकोत ने 'गुणाढ्य एवं बृहत्कथा' नामक १९०८ में
प्रकाशित अपनी पुस्तक में इस क्लिष्ट प्रश्न को विलक्षण निपुणता से सुलझाने का प्रयास किया और
वे इस निर्णय पर पहुँचे—'आज तो काश्मीरी रूपान्तरों (कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी)
में गुणाढ्य की मूल बृहत्कथा अत्यन्त भ्रष्ट एवं अव्यवस्थित रूप में उपलब्ध है। इन ग्रन्थों में अनेक
स्थलों पर मूल ग्रन्थ का संक्षिप्त सारोद्धार कर दिया गया है और इनमें मूल के कई अंश छोड़ भी दिए
गए हैं एवं कितने ही नये अंश प्रक्षेप रूप में जोड़ दिये गये हैं। इस तरह मूल ग्रन्थ की वस्तु और
आयोजना में बेडौल फेरफार हो गये। फलस्वरूप इन काश्मीरी कृतियों में कई प्रकार की असंगतियों
का गर्व और छोड़े हुए अंशों के कारण मूलग्रन्थ का स्वरूप पर्याप्त भ्रष्ट हो गया। इस स्थिति
में बुधस्वामी के ग्रन्थ से वस्तु की आयोजना द्वारा मूल प्राचीन बृहत्कथा का सच्चा चित्र प्राप्त होता
है। किन्तु खेद है कि यह चित्र पूरा नहीं है क्योंकि बुधस्वामी के ग्रन्थ का केवल चतुर्थांश ही
उपलब्ध है। इसलिए केवल उसी अंश का काश्मीरी कृतियों के साथ तुलनात्मक मिलान शक्य है।
१ दृष्टं मया तन्मलयपुरं नाम महापुरम्।
श्रीमत्ताम्रपुरीयं वारिनिधेर्द्विपमध्यगम्॥ (१२।१।७९)