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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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  • १ -
    ग्रम्भिक की कथाओं की रचना हुई हो। वस्तुतः धम्मिल्ल हिण्डी में धनवती सार्थवाह के पुत्र
    धनदत्त के विषय में उल्लेख है कि उसने जहाज लेकर यवन विषय या यवन देश की व्यापारिक
    यात्रा की थी और अपने साथ बहुत से सांप्रायिक व्यापारियों को ले गया था। शिलप्पधिकारम्
    के अनुसार मलय-देश के व्यापारियों का घनिष्ठ सम्बन्ध पुहार या कावेरीपतन के व्यापारियों के
    साथ था। बृहत्कथा की किसी दूसरी वाचना में धम्मिल्ल हिण्डी जैसा कोई वंश नहीं पाया जाता।
    कम-से-कम बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह, क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी और सोमदेव-कृत
    बृहत्कथासरित्सागर में इस तरह का क्रमभिक पेंचस्व नहीं है।
    वसुदेव हिण्डी में धम्मिल्लक हिण्डी के अलावा छः विभाग थे—अर्थात कथा की उत्पत्ति
    पीठिका, मुख, प्रतिमुख, शरीर और उपसंहार। कथोत्पत्ति पीठिका और मुख इनमें कथा
    का प्रस्ताव हुआ है। प्रतिमुख में वसुदेव आत्मकथा का आरम्भ करते हैं। सत्यभामा के पुत्र
    भानु के लिए १८ कन्याएँ इकट्ठी की गई थीं। किन्तु उनका विवाह रुक्मिणी के पुत्र शाम्ब से
    कर दिया गया। इस पर प्रद्युम्न ने वसुदेव से कहा—'देखिए, साम्ब ने अन्त पुर में बैठे-बैठे १८
    बहुएँ पा लीं जब कि आप १ वर्ष तक उनके लिए घूमते फिरे। इसके उत्तर में वसुदेव ने
    कहा—'साम्ब तो कुएँ का मेढक है, जो सरलता से प्राप्त भोग से सन्तुष्ट हो गया। मैंने तो पर्यटन
    करते हुए अनेक सुख और दुःखों का अनुभव किया। मैं मानता हूँ कि दूसरे किसी पुरुष के भाग्य में
    इस तरह का उतार-चढ़ाव न आया होगा। वस्तुतः वसुदेव के इस छोटे-से सटीक वाक्य में उस
    महान् युग की हलचल का बीज समाया हुआ है। उस समय के चैतन्य हृदय पश्चिम के यवन-देश से
    पूर्व के यवद्वीप और सुवर्णभूमि तक के विशाल क्षेत्र को रात दिन ढूंढ़ते रहते थे। बाण के शब्दों में
    कहा जाय तो उनके पैरों में मानों कोई द्वीपान्तरसंचारी पादलेप लगा हुआ था। वे यह मानते थे
    कि द्वीपान्तरों की यात्रा किए बिना लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती (अलभ्यमटनं श्रीसमाकर्षणं
    भवति)। मत्स्यपुराण के लेखक ने समुद्र को ललकारते हुए कहा है—हे उत्ताल तरंगोंवाले
    महार्णव, आजतक शंखा आदिद्वीपों में निवास करनेवाले राक्षस ही तुम्हारे जल में आते-जाते रहे
    हैं जिसके कारण उसमें कीच उठ खड़ी हुई है। अब अपने उस कलुष को शिखाओं से जुड़े हुए प्रांगण
    से दूरक डालो, क्योंकि देवाधिदेव शिव अपने परिवार के साथ तुम्हारा संतरण करना चाहते हैं—
    भूर्जालम्बाः कुरुत शिखिलोपमं पयः सुरद्विषाममल महातिकर्वमम्।
    (मत्स्यपुराण, १५४—४५५)
    जैसा सभापर्व में आया है, पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व की समुद्र-यात्राओं का ताँता
    उस समय लगा रहता था (सभा ४९।१६)। दिव्यावदान में तो यहाँतक कहा है कि महासमुद्र
    की यात्रा किए बिना अर्थोपार्जन की आशा ऐसी है, जैसे ओस की बूंदों से घड़ा भरने का प्रयत्न।
    वसुदेव ने प्रद्युम्न को जो उत्तर दिया, वह मानव-हृदय के इन भावों के सर्वथा अनुकूल
    था। निरन्तर पर्यटन और दूर-दूर के देशों में परिभ्रमण यही गुप्तों के स्वर्णयुग में जीवन की टेक
    बन गई थी। एक बार नहीं कई-कई बार लोग जोखिम उठाकर भी समुद्रों की यात्रा करते थे।