कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
रमैनी । ( ४९ )
साखी ॥ शून्यसहजमनस्मृतिते, प्रकटभई यकज्योति ॥
बलिहारी तापुरुषछवि, निरालंब जो होति ॥ ६ ॥
सहज शून्य जो ( प्रकाश देखिपरे ) ब्रह्मताके मनके स्मरणते एक ज्योति
प्रकटहोयहै सो सालंबहै, योगीजन ब्रह्माण्डमें देखै हैं । औ वह जो अनुभव
ब्रह्महै सोऊ सालंबहै काहेते कि वाहूको मन करिकै अनुभव होयहै सो कबीर-
जी कहै हैं कि ये दोऊ सालंबहै कि तिनकी बलिहारी मैं कहां जाऊं सबके
मालिक निरालंब परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनकी छबिकी मैं बलिहारी
जाऊँहौं साहब निरालंब काहेतेंहैं कि जीवकी जेती सामग्रीहैं मनादिक इंद्रियन-
करिकै ज्ञानकरिकै अनुभव करिकै साहब न देखेजायहैं न जाने जायहैं जब
आपही अपनो हंसरूप देय हैं तब वह रूप करिकै देखेजायहैं औ आपही ते
जानेजाय हैं तामें प्रमाण ॥ ( सो जानै जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहिं तुम्हैं
ह्वैजाई ॥ तुम्हरी कृपा तुम्हहिं रघुनन्दन । जानहिं भक्त भक्ति उरचंदन १) अर्थ हे
श्रीरामचन्द्र जाको तुमजनाइ देहुहै। सो जानै है । जो कहो हमारही जनाये
कैसे जानेगो वेदशास्त्रतो सबननौतैहैं तौ एकबड़ो अवरोधहै जबतुम्हारे जानवेके
लिये शमदमादिक कियो हृदय शुद्ध भयो तब आपहीको मानैहै कि, महीं
रामहौं सो तुमको कैसे जानिसकै । या हेतुते तुम्हारीकृपै ते तुमको जानैहै
अथवा तुमको जानैहै तब तुमही ह्वैकै जानैहै तुम्हारे लोककों जायहै । अर्थात् ।
जब तुमने वाको हंसरूप दियो तब वह पाँचौ शरीर ते भिन्नह्वैकै हंसरूपमें
स्थितभयो तुमको जान्यो वह हंसस्वरूप कैसोहै तुम्हारी अनिर्वचनीयासाभक्तिरूप
जो चन्दनहै सो वाके उरमें लग्योहै ताकी शीतलता ते वह धोखा ब्रह्मके
ज्ञानकी गरमीनहीं आयसकैहै । जिनको कृपाकरिकै तुम हंसरूप देहुहौ सो
जानैहै तुमको सो ऐसे जे साहब हैं परमपुरुष निरालंब तिनको कबीरजी
कहैहैं कि मैं बलिहारी जाऊँहौं परमपुरुष श्रीरामचन्द्रही हैं तामें प्रमाण ॥
( धर्मात्मासत्यसंधश्चरामोदाशरथिर्यदि । पौरुषेचाप्रतिद्वंद्वःशरैनंजहिरावणिम् )॥
इतिवाल्मीकीये ॥ लक्ष्मण जीने मेघनाद के मारत में शपथ कियो है कि
जोपौरुषमें अप्रतिद्वंद्वी श्रीरामहोयं कहेपुरुषत्वमें वैसो दूसरो न होय तो हमारो
( ४८ ) बीजक कबीरदास ।
बाण मेघनाद का शिरकाटि लेइ सो मेघनादको शिरकाटि लियोः औ भागवत
हूमैं हैं ॥ ( ध्येयंसदापरिभवघ्नमभीष्टदोहं तीर्थास्पदंशिवविरंचिनुतंशरण्यम् ॥
भृत्यार्तिहंप्रणतपालभवब्धिपोतंवंदेमहापुरुषतेचरणारविंदम् १ ) अर्थ हे महापुरुष
तिहारेचरणारबिंदकीहम बंदना करैहैं कैसे तिहारे चरणारबिंदहैं कि सब
कालमें ध्यानकरिबेके योग्यहैं औ परिभव जो तिरस्कार ताकेनाश करने-
वाले हैं अर्थात् जो कोई ध्यानकरै है ताको तिरस्कार लोकमें कोई नहीं
करैहै। औ मनोबांछित पूर्ण करनेवाले तीर्थ जे हैं तिनके आश्रय भूत औ
शिव विरंचि ते स्तुतिकेरगये शरण्यमकहे रक्षाकरनेमें समर्थ औ दासनके
पीडा हरणवाले दीननके पालनवाले औ संसार समुद्रके नौकारूप। तामें प्रमाण
कबीरजीको ॥ ( साहब कहियेएक को, दूजा कहा न जाय। दूजासाहब जो
कहै, बादबितंडै आय ) ॥ ६ ॥
इतिछठवीं रमैनी समाप्तम्।
अथ सातवींरमैनी ।
( जीवमुख )
जहियाहोतपवनहिंपानी । तहियासृष्टिकौनउतपानी ॥१॥
तहिया होत कली नहिं फूला।तहिया होत गर्भ नहिंमूला २
तहिया होत न बिद्या वेदा । तहिया होत शब्द नहिं खेदा ३
तहिया होत पिंड नहिं बासू।नाधर धरणि न गगन अकासू।४
तहिया होत गुरू नहिं चेला ।गम्य अगम्य न पंथ दुहेला ५
साखी ॥ अविगति की गति क्याकहौं, जाकेगाँउ न ठाँउ॥
गुण बिहीना पेखना, का कहि लीजै नाँउँ ॥६॥
रमैनी । (४९)
जहियाहोतपवननहिंपानी। तहियासृष्टिकौनउतपानी॥१॥
तहियाहोतकलीनाहिंफूला। तहियाहोतगर्भनाहिंमूला ॥२॥
जहिया कहे जेहि समय सृष्टि नहीं रही जेहि समय न पवन रह्यो न पानी
रह्यो तब सृष्टिको कौन उत्पन्नकियो १ न तब कली रही न फूल रह्यो अर्थात्
न बालरह्यो न वृद्धरह्यो न गर्भरह्यो न गर्भको मूलबीज रह्यो ॥ २ ॥
तहियाहोतनविद्यावेदा । तहियाहोतशब्दनाहिंखेदा ॥ ३॥
तहियाहोतपिंडनहिंवासू । नाघरधरणिनगगनअकासू॥४॥
तहियाहोतगुरुनहिंचेला । गम्यअगम्यनपंथदुहेला ॥ ५ ॥
न वेदरह्यो न चौदहौ विद्यारहीं न शब्द रह्यो न खेद कहे दुःखरह्यो ३
न पिंडरह्यो न पिंडमें जीवको बासरह्यो न अधरकहे पातालरह्यो ना धरणिरही
न आकाश रह्यो ४ न गुरुरह्यो न चेला रह्यो न गम्यकहे सगुणरह्यो न अगम्य
कहे निर्गुणरह्यो औ दुहेला कहे दोनोंपंथ नहींरहे ॥ ५ ॥
साखी ॥ अविगतकीगतिक्याकहौं, जाकेगाँउनठाँउ ॥
गुणविहीना पेखना, काकहिलिजै नाँउ ॥ ६ ॥
वह जो अविगतकहे अव्यक्त जो नहीं प्रकटहोय, धोखा ब्रह्म है निराकार
ताकेगाँव ठाँउ नहीं है वह गुणकरिकै विहीन जो निर्गुणहै ताको पेखना कहे
देखिबेको का कहिकै नामलीजै कि यहहै वातो कुछवस्तुही नहीं है ॥ ७ ॥
इति सातवीं रमैनीसमाप्तम् ।
अथ आठवीं रमैनी ।
( वेदांत विचार )
तत्त्वमसी इनके उपदेशा । ईउपनिषद कहै सन्देशा ॥ १ ॥
उनिश्चय उनकेबड़भारी। वाहिकिवर्णकरै अधिकारी ॥२॥
परमतत्त्वकानिजपरमाना।सनकादिकनारदसुखमाना ॥३॥
४
( ५० ) बीजक कबीरदास ।
याज्ञवल्क्यऔजनकसँबादा । दत्तात्रयी वहै रसस्वादा ॥४॥
वहै वसिष्ठ राममिलि गाई । वहै कृष्णऊधवसमुझाई ॥५॥
वहै बात जो जनक दृढाई । देहै धरे विदेह कहाई ॥ ६ ॥
साखी ॥ कुल अभिमाना खोयकै, जियत मुवा नहिं होय॥
देखत जो नहिं देखिया, अदृष्ट कहावै सोय ॥७॥
तत्त्वमसी इनके उपदेशा । ईउपनिषद कहै संदेशा ॥ १ ॥
तैने धोखा ब्रह्मको जौनी रीतिते गुरुवालोग उपनिषद्को प्रमाणदैकै प्रतिपादन
करै हैं सो, औ सांच जो अर्थहै सो कबीरजी दोऊ तात्पर्य करिकै देखावै हैं ।
तत्त्वमसी जो श्रुति उपनिषद्को उपदेश ताको गुरुवालोग संदेश ऐसो कहैं हैं
संदेश कौन कहावै है कि बातको पूर्वापर नहीं समुझै वाकी कहनूति वासों कहि
देइँ जो संदेशको हेतुपूछै कि कौनेहेतुते कह्यो है तो वह कहै हैं कि संदेश
कहि दियो यह नहीं जानै हैं कि कौन हेतु ते कह्यो है सो ऐसे गुरुवा लोग
श्रुति को तो पूर्वापर जानै नहीं हैं अक्षर मात्रको अर्थ करैं हैं कि तत्त्वं ब्रह्मत्व
असि तौन ब्रह्मतूही है सो जीवहीको अनुमान तौ ब्रह्महै जीव ब्रह्मकैसे होयगो
ब्रह्मतो ज्ञानस्वरूप है शुद्ध है माया कैसे धरिलावती अज्ञानी कैसेहोतो तौ गुरु-
वालोग कहैहैं कि वा अतर्क है तर्क न करो सो जीवहीको अनुमान तौ ब्रह्महै
जीव ब्रह्मकैसे होयगो । सो श्रुतिको अर्थ यहहै कि पूर्वषोडश कलात्मकजीवको
कहिआये हैं ताहीको कहै हैं कि त्वमसिं तौन षोड़श कलात्म जीव है षोड़श
कला तोहीमें हैं तू उनते भिन्न है शुद्ध है यह जीवको स्वरूप लखायो सो नहीं
समुझै हैं सो या बात मेरे तत्त्वमस्यार्थबादमें विस्तारतैहै ॥ १ ॥
ऊनिश्चयउनकेबड़भारी । वाहिकिवरणकरैअधिकारी॥२॥
ऊ कहै वह जो धोखा ब्रह्महै ताहीकी निश्चय उनकेबड़ीभारीहै बाहीकी
वरण कहे वही धोखा ब्रह्मको अधिकारी जे चेलाहैं तिनको वरणकरै है अर्थात्
, two on 'ह').
Second word of second half: "वैहै" (two slants on 'व', two on 'ह').
Wait, why does L11 have "वैहै" and L12 have "वहै"?
Because that's how it's printed!
Let's check the letters in L11:
"वैहैवशिष्ठराममिलिगाई । वैहैकृष्णऊधवसमुझाई ॥ ५ ॥"
Yes, both are "वैहै"!
Wait, let's look at L12 again:
"वहैवात जो जनकदृढाई । देहैं घरे विदेह कहाई ॥ ६ ॥"
Look at "देहैं":
'द' + 'े' = दे.
Then 'ह' + 'ै' + 'ं' = हैं.
Then 'घ' or 'ध'?
Look at 'घरे': it has a curved top? No, 'ध' in 'दृढाई' has an open top. But in 'घरे', the top bar is completely solid and covers both lobes!
Wait, in old typography, sometimes the compositor picked a 'घ' sort instead of 'ध'. So it literally is printed as 'घरे'!
Let's transcribe it as "घरे" (or is it 'धरे' with a filled-in bar? In letterpress printing, ink squash often fills the tiny gap in 'ध'. But either way, it looks like 'घरे'). Let's keep "घरे".
(५१) बीजक कबीरदास ।
रामचन्द्र हैं तिनको वेद, पुराण, कुरान, शास्त्र, महात्मा इनकेद्वारा देखतऊहै
औ जिनको वर्णन करिआये सनकादिक महात्मन को उद्धार द्वैगयो यहौ ज्ञान-
दृष्टि देखतऊ हैं परन्तु ये मूर्ख जीव गुरुवालोग ना जाने तेहिते अदृष्टि कहावैं
हैं कहै आँधरैं कहावै हैं । परमतत्त्व श्रीरामचन्द्रही हैं तामें प्रमाण । (रामएवप
रंतत्त्वं श्रीरामोब्रह्मतारकम् ॥ इतिहनुमदुपनिषद् ) जो यह कहैं शुकसनकादिक
येऊ न जान्यो तौ अब को जानैगो नास्तिकपना आवै बस्तु मिथ्या होय है
ताते साधु तौ जानतई हैं जिनको साहब जनाय दियो है कबीरौजी कहै हैं ॥
(ध्रुवप्रह्लादउबारिया सोहरिहमरेसाथ । हमको शंकाकछुनहीं, हमसेवैं रघुनाथ)
इति आठवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ नवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बांधे अष्ट कष्ट नौ सुता । यमबांधे अंजनिके पूता ॥ १ ॥
यमकेवाहनबांधिनिजनी । बांधेसृष्टिकहालौंगनी ॥ २ ॥
बांधे देव तेंतीस करोरी । सुमिरतवंदि लोहगैतोरी ॥ ३ ॥
राजासुमिरै तुरियाचढ़ी । पंथीसुमिरि नामलैबढ़ी ॥ ४ ॥
अर्थ विहीनासुमिरैनारी । परजासुमिरैपुहुमीझारी ॥ ५ ॥
साखी ॥ वँदि मनाय फल पावहीँ, बँदि दिया सो देव ॥
कह कबीर ते ऊबरे, निशि दिन नामहिं लेव ॥ ६ ॥
बांधे अष्ट कष्ट नौ सूता । यमबांधे अंजनीके पूता ॥ १ ॥
अष्ट जे अष्टाङ्ग योगहैं औ कष्ट जो बिज्ञानहै तेहिते बांधिगयो धोखा ब्रह्म-
को बिज्ञानरूपकष्टहै तामें प्रमाण ॥ (अव्यक्ताहिगतिर्दुःखंदेहवद्भिरवाप्यते ) ॥
इतिगीतायां ॥ श्रेयःश्रुतिंभक्तिमुदस्यते विभो क्लिformat: क्लिश्यन्तियेकेवलबोधलब्धये । तें-
रमैनी । (५३)
षामसौक्लेशलएवशिष्यते नान्यंयथास्थूलतुषावघातिनाम् ॥ इति भागवते ) औ नौ
सूतकहे सगुना जो नवधा भक्ति है तेहिकरिकै बांधिगयो औ यमकहे दुई
बिद्या औ अबिद्या तेहिकरिकै अंजनी जो माया ताके पूत जे जीव हैं ते सब
बांधि गये ॥ १ ॥
यमकेवाहनबाँधिनिजनी । बाँधेसृष्टिकहांलौंगनी ॥ २ ॥
बाँधे देवतेंतीस करोरी । सुमिरतबंदिलोहेगैतोरी ॥ ३ ॥
औ यम जे बिद्या अबिद्या दूनों मायाहैं तिनके सब जीव बाहन भये । काहेतें
कि उन्हींको ढोवन लगे उन्हींकी चाल चलन लगे औ वै जे दूनों मायाहैं ते
बांधिनिजनी कहे फेरिफेरि जीवनको उत्पन्न करिकै संसार दैकै बांधि लियो
औ शीशमें चढ़ी रहती हैं सो अनादि कालते बँधीजो सृष्टि ताको कहांलौं गनी
२ तेंतीसकोटि देवता बांधेगये तिनको सुमिरतमात्रहीमें बंदि कहे लोहेकी बेड़ी
में परिकै तोरी कहे मारेगये अथवा तेंतीसकोटि देवता बांधिगये तिनके सुमिर
तमात्रहीमें बन्दी कहे लोहेकी बेरी में परिके तोरि कहे मरि गये अथवा तेतीस
कोटि देवता बांधे गये तिनके सुमिरत मात्रहीबन्दीकहे लोहेकी बेरीमें परिकै
तोरिकहे मारेगये अथवा तेतीसकोटि देवता बांधेगये तिनके सुमिरतमात्रमें
का बन्दि लोहेकी बेरी जीव तोरिगये ? नहीं तोरिगये ॥ ३ ॥
राजासुमिरै तुरियाचढ़ी । पंथीसुमिरि नामलैवढ़ी ॥ ४ ॥
अर्थविहीना सुमिरैनारी । परजासुमिरैपुहुमीझारी ॥ ५ ॥
तुरीया अवस्था को नामहै तामें ज्ञानी लोग चढ़ी कहे आरूढ़ हैकै राजित
होयहैं ताहीते राजा कहै हैं ते अहंब्रह्मको सुमिरै हैं औ पंथी ने अनेकपंथ चला
वन वालेहैं ते नानामतके पंथमें आरूढ़हैं अपने अपने इष्टदेवनके नामलैके साधन
में बढ़ेहैं सोयहै। बिरही हैं ४ अर्थ बिहीना कहे अर्थ जो है द्रव्य ताको वैराग्य
ते त्यागि बनमें बसिकै अपने इष्टदेवनको सुमरै हैं ते औ पर जो ब्रह्म है
तामें जो जायोचाहै सारी पुहुमी सहित सुमिरैहै अर्थात् सर्वत्र ब्रह्मही देखैहै ते
ये दोऊ सगुण निर्गुण उपासक नारी जो माया है ताहीको सुमिरैहैं काहेते कि
जहांलौं मन जाय है तहां लौं सब माया है ॥ ५ ॥
( ५४ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ बँदिमनायफलपावहीं, बंदिदियासोदेव ॥
कहकबीरतेऊबरे, निशिदिननामहिंलेव ॥ ६ ॥
बंदि कहे विद्या अविद्यारूप जो बेरी ताको जे मनावैं हैं ते तौनै फल-
पावैं हैं अर्थात् जे स्वर्गादिक की चाह करैहैं ते लोहेकी बेरीमें परे । जे अहं-
ब्रह्मास्मि मानेते सोने की बेरीमें परे । सो जोने इष्टदेवत नको मनाये सोब-
न्दीही फल देतभये अथवा ते फल देवते दियोहै जिन उपासना कियोहै बन्दि-
में नाय कहे बन्दिमें डारिदिये हैं तेई फल पावै हैं । अर्थात् स्वर्गादिक जे
फलहैं तेसब बंदिमें डारनवारे हैं । सो बंदि डारनवारो जे फलदेय हैं तेकादेव
हैं ? नहीं हैं सो कबीरजी कहैं हैं कि जे श्रीरामचंद्र को नाम निशिदिन लेयहैं
तेई उबरे हैं ॥ ६ ॥
इति नवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथदशवीं रमैनी ।
चौपाई ।
राही लै पिपराही बही । करगी आवत काहु न कही ॥ १ ॥
आई करगी भो अजगूता।जन्म जन्म यम पहिरे बूता ॥ २ ॥
बुतापहिरयमकरै पयाना।तीनलोकमें कीन समाना ॥ ३ ॥
बांधे ब्रह्मा विष्णु महेशू । पार्वती सुत बांध गणेशू ॥ ४ ॥
बाँधेपवन पावक नभनीरू। चन्द्र सूर्य बांधे दोउ वीरू ॥ ५ ॥
सांचमन्त्र बांधेसबझारी । अमृत वस्तु न जानै नारी ॥ ६ ॥
साखी ॥ अमृत वस्तु जानै नहीं, मगन भये कित लोग ॥
कहहिं कविर कामोनहीं, जीवह मरण न योग॥७॥
राही लैपिपराहीबही । करगीआवतकाहुनकही ॥ १ ॥
राहीकहे सुराहके चलनवाले औ पिपराही कहेपीपरकी बनिका की नाई अनेक
मति में डोलनवाले जे जीव तें राही जे हैं तिनहूं को लैकै संसारसागर में
बहतभये । करगी बूड़ाकोजलजो छिटकैहै ताको कहैहैं। सो यह माया ब्रह्मको जो
धोखारूपबूड़ाहै ताकेआवतमें काहुनकही कियाधोखाब्रह्ममेंनपरोबूड़िजाउगे ॥१॥
आईकरगीभोअजगूता । जन्मजन्मयमपहिरेबूता ॥ २ ॥
जब करगी आई तब अयुक्ति होत भई कैसी भई कि, जन्म जन्म कहे जब
जब ब्रह्मांडनकी उत्पत्तिभई तब तब यम पहिरे बूता कहे यमको काल
निरंजन जैहैं तिनको बूता कहे पराक्रम काल पहिरत भयो अर्थात् काल
तो जड़है निरंजनै को पराक्रम लैके जीवनको मारैहै ॥ २ ॥
बुतापहिरियमकीनपयाना। तीनिलोकमोकीन समाना॥३॥
बांधे ब्रह्मा विष्णु महेशु । पार्वती सुत वांधगणेशू ॥ ४ ॥
वँधेपवनपावकनभनीरू । चंद्रसूर्य बाँधे दोउबीरू ॥ ५ ॥
वही निरंजन को बुताकहे पराक्रम काललैके पयान कियो सो लव दिन
पक्ष मास वर्ष युग कल्परूप करिकै तीनलोकमें समाइ जातभयो ॥ ३ ॥ जौन
काल तीनलोकमें समानो ताहिमें ब्रह्मा विष्णु महेश षण्मुख गजमुखादि आयुर्दा-
य प्रमाण रूपते सब बँधतभये ॥ ४ ॥ अरु ताहिमें पवन औ पावक औ
पानी औ चन्द्र सूर्य नभ सब बँधत भये ॥ ५ ॥
सांचमंत्र सबबांधे झारी । अमृत वस्तु न जानै नारी ॥६॥
झारादैके जे साहबके सांचमंत्रहैं तिनहूको काल बांधिलियो काहेते कि जो
साहबके मंत्रको अर्थप्रभाव सोई आवरण है औ साहबको ज्ञानरूप अमृत वस्तु
जानि परत भये नारी जो आवरणकैलियो माया तामेंपरे जे जीव ते न जानैं
जो जानैंगे तौ हमारेमारे न मरेंगे याही हेतुते बांध्योहै ॥ ६ ॥
साखी ॥ अमृत वस्तु जानै नहीं, मगन भये कित लोग॥
कहैकबिरकामोनहीं, जीवहमरन न योग ॥ ७ ॥
अमृत बस्तु जो साहब है ताको तो न जान्यो कौने कुत्सित संसारमें तू
मगन भयो कौन साहब जो कामोनहीं अर्थात् काममें नहीं है सबहीमें है सो
( ५६ ) बीजक कबीरदास ।
ऐसो अमृत बस्तु साहब समीपई है वा जीवका जननमरण योगहै अर्थात् नहीं
है व्यंग्यते या कहैहैं कि जीव महामूढ़है । काहेते जो साहब को जानि लेइ
तो जन्म मरन छूट जाइ काहे ते के रक्षक साहबही है । अथवा जिनको सांच
मंत्र माने रहे ते तो सब बांधिगये अमृत वस्तु जो रामनामको साहबमुखअर्थ
सो जानतही नहींहै याते जनन मरण न छूटतभयो ॥ ७ ॥
अरु जो प्रथम तुकमें लोइ और दूजे तुकमें जीवहिमरन नहोइ ऐसा पाठ
होवे तौ यह अर्थ कि, लोइ कही लपट जाईहै प्रकाश तौने ही मै सब लीन
भये, जो कहो लीन भये जीव न रहिगये तो जीव बनेहैं काहेते कि, जीवको
मरन नहीं होईहै । वह ब्रह्मका मैं नहीं ?
इति रमैनी दशवीं समाप्तम् ।
अथ ग्यारहवीं रमैनी ।
गुरुमुख । चौपाई ।
आँधरसृष्टिसृष्टिभै बौरी । तीनिलोकमहँलागिठगौरी ॥ १ ॥
ब्रह्महिं ठग्यो नागसंहारी । देवन सहित ठग्यो त्रिपुरारी ॥ २॥
राज ठगौरी विष्णुहिं परी । चौदह भुवन केर चौधरी ॥ ३ ॥
आदि अंतजेहि काहु न जानी।ताको डर तुम काहे मानी ॥४॥
ऊउतंग तुम जाति पतंगा । यमघर किहेहु जीव कै संगा ॥५॥
नीमकीट जस नीमपियारा । विषको अमृत कहै गँवारा ॥६॥
बिषके संग कवन गुण होई । किंचित लाभ मूल गो खोई ॥७॥
विष अमृतगों एकही सानी । जिन जाना तिनविष कै मानी ८
कहा भये नर सुध बेस्रूझा । बिनपरचै जग मूढ़ न बूझा ॥९॥
मतिके हीन कौन गुण कहई।लालच लागे आशा रहई॥१०॥
रमैनी । ( ५७ )
साखा ॥ मुवा अहै मरिजाहुगे, मुये कि वाजीढोल ॥
स्वप्नस्नेही जगभया, सहिदानी रहिगाबोल ॥ ११ ॥
आँधर सृष्टि सृष्टिमैं बौरी । तीनिलोकमहँलागिठगौरी ॥१॥
साहब कहैहैं कि जे मोको ज्ञानदृष्टि करिकै नहीं देखैहैं ते जे आँधरहैं ते
माया औ निराकार धोखा ब्रह्मयाहीकी गोष्टीजोवार्ता सो करतेभये । ताहीमें
सारीसृष्टिबौरीह्वै जातभई कोई तौ मैंही ब्रह्महौं यहमानि अपने को मुक्तमानत भये,
कोई जीवात्मैको मानै कोई शून्यहिको मानतभये कोई मायामें परि नानादेवत-
नकी उपासना करि अपनेको भक्तमानत भये । सो यही ठगौरी जो माया
है सो तीनोंलोकमें लागतभई सो आगे कहै हैं ॥ १ ॥
ब्रह्माहिंठग्योनागसंहारी । देवनसहितठग्योत्रिपुरारी ॥ २ ॥
राजठगौरी विष्णुहिंपरी । चौदहभुवन केर चौधरी ॥ ३ ॥
मायाब्रह्माकोठग्यो ते संसार की उत्पत्ति करनलगे शेषनागको संहारिकै
कहेबांधिकै नागकहजाई जो पाठहोय तौ मायाब्रह्मा को ठगिसि औ शेषनाग
कहँजाइकै ठगिसि सो शेषनाग पृथ्वीको भारशीशमें धरतभये । देवन सहित
महादेवको ठग्यो ते संसारके संहारमेंलगे । देवता अपने अपने काममें लगे २ औ
चौदह भुवन को चौधरी विष्णुको करिकै ठग्यो ते संसारको पालन करनलगे ।
याहीरीतिते मायाते जेगुणाभिमानी रहे तिनको सबकोठग्यो ॥ ३ ॥
आदिअंतज्यहिकाहुनजानी ।ताकोडरतुमकाहेनमानी॥४॥
फिरिकैसीहै माया जाको आदि अंतकोई जनबई न कियो काहूते न जा-
न्यो वा कुछवस्तुही नहीं है भ्रमहीमात्रहै । जेतोपदार्थ देखैहै सुनैहै कहैहै सो
सबत्रिगुणमय है । गुण न आत्मैंमें है न ब्रह्महीमें है । ताते ये सब मिथ्या-
हीहैं । औ धोखा ब्रह्ममिथ्याहै कैसे सो कहै हैं । सबको निराकरण करतकरत
जो वा रहिजाय है ताही को मानौंहौं कि " सो ब्रह्महमहैं " ताहूको मूलअ-
( ९८ ) बीजक कबीरदास ।
ज्ञान कहौं सो जब सोऊ न रह्यो तब वह दशामें बिचारिदेखो तुम्हीं रहिजा-
उहौ, तुम्हारोई अनुमान ब्रह्महै, तोते मिथ्याही है । जब तुम्हीं रहि गये तब
तुममें तो माया ब्रह्मते छूटनेकी सामर्थ्य है नहीं जो सामर्थ्यहोती तौ पहिलेही
ते तुमको काहे को बांधिलेती । याते तुम डेराउहौ कि, हमकैसेकै छूटेंगे ।
सो यामाया औ धोखाब्रह्मका डर तुम काहेको मानतेहौ । मैं जो अनिर्वचनी-
यहौं ताके तुम अंशहौ तुम्हूं अनिर्वचनीय हौ नाहक धोखा ब्रह्म औ माया कों
अनुमान कैकै नानादुःख पावतेहौ । तुममाया ब्रह्मको भ्रमत्यागि मेरे अनिर्वच-
नीय नाम में लगिकै मेरे पासआवो मैं रक्षाकरि लेउँगो । यह मालिक जे
श्रीरामचन्द्र हैं ते कहै हैं ॥ ४ ॥
ऊउतंगतुम जातिपतंगा । यमघर किहेहु जीवकै संगा॥५॥
नीमकीटजसनीमपियारा । बिषकोअमृतमानगँवारा ॥६॥
वहजोमाया औ धोखा ब्रह्मअग्निरूपताकी उत्तुंगकहे बड़ीऊंची लपटैंहैं तुम-
जातिकेपतंगहैकै वामेंकाहेजरिजरिमरौहै । सोहेजीव नानाबस्तुनकोसंगकरि
जाहीमेंमनलगायमरचो औ सोई भयो याहीभांतिजनमिकै मरिकै यमकेपासघर-
बनायेहौ अर्थात् या संग का प्रभावहै जो यमके यहां घरबनोयेहैं ५ जैसेनीमके
किरवा को नीमही प्यारलगैहै, जो मिष्टान्नौ पावै तौ न खाय, ऐसे बिषरूप
जो विषय ताको अमृतमानिगँवार जोजीवहैंसो खायहैं ॥ ६ ॥
विषकेसंगकौनगुण होई । किंचितलाभमूलगो खोई॥ ७ ॥
विषअमृतगोएकहिसानी । जिनजानातिनबिषकैमानी॥८॥
सोयाबिषरूपी विषयके संगकौनगुणहै क्षणभरेकोसुखहै औ सबकोमूल जो
मेरोज़्ञानसो नशायगो अनेकजन्म दुःखपावनलग्यो ७ साहब कहै हैं कि और
नाना देवतन को जो नामजपिबो औ तिन्हीं के लोक में जाय सुख पाइबो या
तोबिष है औ मेरे नामको जपिबो मेरे लोकमें जायसुख पाइबो यातो अमृतहै
सो ये दूनौं बिष अमृत एकैमें सानिगो कैसे जैसे साहबको नामलीन्हे मुक्त
हैजायहै साहबके लोकमें जाय सुखपावै है ऐसे औरहूदेवतनके नामलीन्हेसे
रमैनी । (५९)
मुक्त ह्वैजायहै औ तिनके लोकमें जाय सुख पावैहै । वास्तव एकही नाम भेद-
से और और कहैहै या भांतिते जे ज्ञान राखेहैं तिनके ज्ञानको मेरे अनिर्वचनीय
नामरूप धामके जे जनैया हैं तिनके ज्ञानको ते विषयी मानै हैं ॥ ८ ॥
कहाभयेनलसुधवेसूझा । बिनपरचै जगमूढ़ न बूझा ॥९॥
मतिकेहीनकौनगुणकहई । लालचलागेआशारहई॥१०॥
ऐसे बे सूझ जीवजिनको नहीं सूझपरैहै ते कहां शुद्धभये, नहीं भये।मैं जो अनिर्व-
चनीय ताकेपरचै बिना जगमें मूढ़जीवो तुम न बूझत भयो सो ऐसे मतिके हीन जे तुम
तिनके कौनगुण कहैं लालचईमें लागेरहैहैं काहूको द्रव्यकीआशा काहूको
ब्रह्मज्ञानकी आशा काहूको नाना देवतनकी आशा काहूको विषयकी आशा में
फिरैहै सांचजोवेद को अर्थ मैं ताको न जानतभये अर्थात् साहबकहैहै कि मोको
न जानोगे तो कबहीं बचोगे नहीं, तो वेद पुरान कहैहै कि,
सब मरिजाहुगे ॥ ९ ॥ १० ॥
साखी ॥ मुवा अहै मरिजाहुगे, मुयेकी बाजी ढोल ॥
स्वप्नस्नेही जगभया, सहिदानीरहिगाबोल ११॥
साहबकहैहै कि हेजीवौ मुवाजोधोखा ब्रह्म नानादेवतातिनमें जो लागौगे
तोमरिजाहुगे अथात् जनमतैमरत रहौगे यातुम्हारे मुयेकी ढोल जो वेदपुराणहै
सो बाजैहै कहे कहैहैं । तब तुम्हारा इष्टदेवन को स्नेह औ सबसुख जगत्को
स्वप्न ऐसा ह्वैजायगा ये सब मुयेहैं ये वेदपुराण तात्पर्यते डंका दैकेकहैहैं अथवा-
जोगुरुवालोग ब्रह्मको नाना देवतनमें लगावै है सो सबसंसारमें मुये की ढोल बा-
जैहै । मरिजाहुगे जो यामें लगौगे तो तुम्हारी सहिदानी बोलरहिजायगा । बोल
कहाहै जे तुम अपने इष्टदेवनके ग्रन्थबनाय जावगे तेई रहिजायँगे कि फलानेकेबना-
ये ग्रन्थहै कालपाय वोहूं न रहिजायँगे अथवा सहिदानी बोल रहिजायगा कौन
जौन मेरे रामनामको संसारमुख अर्थ करि संसारी भयोहै सोइजगत्की सहिदा-
नी मेरोनाम रहिजायगो ताहीको फेरि संसारमुख अर्थकरि संसारी होउगे जब
नाममें मोको जानोगे तबहीं मुक्त होउगे ॥ ११ ॥
इतिग्यारहवीं रमैनी समाप्तम् ।
( ६० ) बीजक कबीरदास ।
अथ बारहवीं रमैनी ।
चौपाई ।
माटिक कोट पषाणकताला । सोई बनसोई रखवाला १
सो बनदेखत जीवडेराना । ब्राह्मण विष्णुएक करिजाना २
जोरि किसान किसानी करई । उपजै खेत बीज नहिंपरई ३
त्यागि देहु नर झोलिक झेला । बूड़े दोऊ गुरु अरु चेला ४
तीसर बूड़े पारथ भाई । जिन बन दाह्यो दवा लगाई ॥५॥
भूँकि भूँकि कूकुर मरिगयऊ । काज न एकस्यारसौं भयऊ ६
साखी ॥ मूसबिलारी एकसँग, कहु कैसे रहिजाय ।
यक अचरज देखौ संतौ, हस्ती सिंहहिखाय॥७॥
माटिककोटपषाणकताला । सोईबनसोईरखवाला ॥ १ ॥
माटीका कोट यहशरीरहै मनरूप पाषाणका तालौहै कठिनभ्रमजौनेते माया
औ धोखा ब्रह्ममें लग्योहै सोई भ्रमके बनको नानाबाणीमाया ताको रक्षक सोई
भ्रमही है जबभ्रम मिटै तब माया धोखाब्रह्म तबहीमिटै संसारताला खुलै तबमैं
सर्वत्र देखपरों ॥ १ ॥
सोबनदेखतजीवडेराना । ब्राह्मणविष्णुएककरिजाना ॥२॥
तौन जो भ्रमको वनहै संसार नानाशास्त्र तिनके द्वारा देखिके डरानजाय नाना
मतनमें तुम सब नहिंपारपाये कि कौनमतलैकै संसार पारहोई ये शास्त्र एक म-
तनहीं कहैंहैं तब डेराय ब्राह्मण भये ॥ ब्रह्मजानातिब्राह्मणः ॥ सब ब्रह्मको
जानतभयेः वैष्णवजेहैं ते एक व्यापक तुमसब विष्णुही को मानतभये व्याप्य
पदार्थ न मानतभये सो हेजीवो! जो व्याप्य पदार्थ नै होयगो तो व्यापक कामें
होयगो ताते एक मानिबो धोखई है । अथवा ब्राह्मण जेहैं ब्रह्मज्ञानी ते एक
रमैनी । ( ६१ )
ब्रह्महीमाने औ वैष्णव जेहैं विष्णुके दास तौनेके एकै मानतभये कि दास भाव
करत करत जब अंतःकरण शुद्धहोइगो तब अभेदई भावहोइगो आपही विष्णु
मानेगो काहेते कि देव ह्वैकै देवताकी पूजा करिबेको होई है यह शास्त्रमें लिखा
है ताते हम विष्णुही ह्वैजाइँगे तौने दृष्टांत देइहैं कि वहै तौ बनैहै वहै रखवार
तौ कैसे पूरपरै माया ब्रह्म ईश्वर ई सब मनके कल्पित हैं मनै है औ यही म-
नको रक्षक मानै अथवा ब्रह्मज्ञान को रक्षक मानै है सो वही तौ भ्रम है औ
वही को रक्षक मानै है सो कैसे पूरपरैगो ॥ २ ॥
जोरिकिसानकिसानीकरई । उपजैखेतबीजनाहींपरई ॥३॥
जैसे सिगरी सामग्री जोरि किसान किसानी करै है जौनबीजखेतमें बोवैहै
सोई उपजैहै । तैसे हेजीवो तुमसब नानाबाणीको बिस्तार करि नानामतनमें
लाग्यो सोईफल भयो मेरो जो रामनाम बीजै सोतौखेतमें परबई नं कियोमेरो-
ज्ञानफल कहांतहोय तुम्हारे खेतमेंनानामतनको फल संसार उपज्यो ॥ ३ ॥
छांड़िदेहुनरझेलिकझेला । बूड़ेदोऊगुरू अरु चेला ॥ ४ ॥
तीसरबूड़े पार्थ भाई । जिनवन दाह्यो दवालगाई ॥ ५ ॥
सो हे नरौ! झेली का झेला तुमछांड़ि देहु। धोखा ब्रह्ममें लागिकै तुममाया
को झेला चाहौहौ, माया तुम्हींको झेलैहै या नहींजानौहौ कि, धोखा ब्रह्ममाया
सबलितहै ताही मायाकी धारमें गुरु जे तुमको उपदेश किये ते औ तुमदोऊ
बूड़े ४ पृथु बिस्तारे धातुहै अपने ज्ञान दवाग्निको बिस्तार कैकै अपने सेवकन
केजे बनरूप कर्म जारि अपनेलोकनको लैगये ऐसे जे इष्टदेवता जिनको गुरुवा
लोग उपदेश करैहैं सो हे भाई तीसर तेऊ मायाकी धारमें बूड़े काहेते महाप्रल-
यमें वोऊ नहीं रहिजायँगे ॥ ५ ॥
भूंकिभूंकिककूरमरिगयऊ । काजनएकस्यारसोंभयऊ॥६॥
हे नरौ ! जैसे कूकुर शीशाके महलमें अपनारूप देखि भूंकि भूंकि मरिजायहै
तैसे तुम्हारोई अनुभव जो धोखा ब्रह्म तामें लगि भूंकि भूंकिकहे शास्त्रार्थ करिकरि
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जन्मत मरतरहौहौ अथवा अहंब्रह्म अहंब्रह्म अहमीश्वरः अहंभोगी अहंसिद्धः
अहंबलवान् अहंसुखी इहै भूंकैहै तामें प्रमाण॥ (ईश्वरोऽहमहंभोगी सिद्धोऽहंबल-
वान्सुखी)॥ इत्यादिक स्यार जो बाणी ताते एकौकाज नहींभयो अर्थात् जौनी
बाणीकेदेखाये प्रतिबिम्बदेख्यो अनुभव ब्रह्ममान्यो तौनेकेकाज न भयो जनन
मरण न छूट्यो अथवा हे जीवो ! तुम जे कूकुरहौ ते स्यार शिवा भवानी रुद्राणी
अमरमें लिखैहैं सो हे जीवो ! सोई स्यार रूपजो बाणीहै ताको देखिदेखि भूंकतेहौ
कहे पढ़तेहौ वा स्यार रूपबाणीके धरिबेकोतौ भूंकिभूंकि तुमहीं मरिगये
स्यारते कार्य न भयो अर्थात् स्यारूप जोबाणी सोतुम्हारीधरी न धरिगई वाको
तात्पर्य्यार्थको न जानतभये वृत्तितौनहीं राखौहौ अपने जानपनीको घमण्डराखौ
हौ तातेमायाते न छूटे ॥ ६ ॥
रमैनी । ( ६३ )
आजुकाजाजियकालिहअकाजा।चलेलादिदिग्गंतरराजा॥४॥
सहज विचारत मूल गँवाई । लाभतेहानि होय रे भाई॥५॥
ओछी मती चन्द्रगो अथई । त्रिकुटीसंगमस्वामी वसई॥६॥
तबहींविष्णु कहासमुझाई । मैथुनाष्ट तुमजीतहु जाई ॥७॥
तवसनकादिकतत्वविचारा। ज्योंधनपावहिरंक अपारा ॥८॥
भोमर्याद बहुत सुखलागा । यहिलेखे सबसंशयभागा॥९॥
देखत उत्पति लागु न बारा । एकमरै यककरै विचारा॥१०॥
मुये गये की काहु न कही । झूटी आश लागि जबरही॥११॥
साखी ॥ जरत जरत से बाचहू, काहेन करहु गोहारि ॥
विषविषयौकैखायहु, रातदिवसमिलिझारि॥ १२ ॥
नहिंपरतीतिजोयहि संसारा।द्रव्यकचोटकठिनकोमारा॥१॥
साहब कहैहैं यह तो उपदेश हमकरते हैं तुमसबको परतीति
( ६४ ) बीजक कबीरदास ।
नहींतो शेषहोतहोत सब लुकाय जायहै एक एक में लीनह्वैजायहैं कहीं लोप
है जाय है कहीं अलोप है जायहै निषेध करत करत तुमहीं रहिजाउहै।
कि मैं रहिजाउँहौं तब मैं तुमको हंसरूपदै अपने धामको लैआवो हौं
सो या जगतमरेही शरीरहै या प्रतीतितुमको काहूको न आई द्रव्यही बुद्धि
मानते भये ॥ २ ॥
चलेलोगसब मूलगँवाई । यमकीबाढ़िकाटिनहिंजाई ॥३॥
सबको मूल जो मेरो रामनाम ताको गँवाय कहेभूलिकै हे जीवो! तुम सब ना-
नापन्थमें चलेहौ परन्तु यमकहे दोऊविद्या अविद्यारूप जो घोरनदी तिनकीबा-
ढ़िजोहै धारा सो न काटीजायगी अर्थात् न पैरी जायगी । वाही में बूडिजा-
वोगे । अथवा यम जो है काल रूप ब्रह्म ताकी बाढ़ि जो बाणी जो एकते
अनेक भई है सो हे जीवो तुम्हारी काटी न काटिजायगी जो काटि पाठहोय
तौयह अर्थ है विद्या अविद्याकी दुइ नदी बाढ़ी तुम्हारे हिय में सो तुम्हारी
काटि न काटिजायगी अर्थात् वाहीमें परेरहौगे अथवा चौदहौ जे यमवर्णन
करिआये है तिनकीबाढ़िबढ़ी है सो तुम बिना मेरी कृपा न छूटोगे । सो तुम्हारी
काटी न कटैगी बिनामोकोजाने ॥ ३ ॥
आजुकाजजियकालिहअकाजा । चलेलादिदिग्गंतरराजा४
हेजीवौ ! अनिर्वचनीय जो मेरो नाम ताको जोआजु समुझौ तौ कार्य्य होयगो
तिहारो औ जोकाल्हि कहे शरीर छूटेंमें समुझो चाहौतौ अकाजहै नाजानै कौनी
योनिमें परौ फिरि समुझौ धौं ना समुझौ । सो हे जीवो तुमतो राजा है मन
मायादिक ये तुम्हारे ही बनाये हैं सोतौ तुम भूलिगये । चले लादि कहेविद्या-
अविद्याके जे नानाकर्म तिनको अंगीकार करि अर्थात् वैहै बोझाअपनेमाथे में धरि
दिगंतरमें जाय नानाशरीर धारण करत है सो अबहूं मोको जानि तुम सब
यहदुःख त्यागो यह मायारूप धोखावाले नको उपदेश दियो अब सहजस-
माधिवाले नको कहै हैं ॥ ४ ॥
१ देखौ मंगल में १८ वीं साखीकी टीका ।
रमैनी । ( ६५ )
सहज विचारत मूलगँवाई । लाभतेहानिहोयरेभाई ॥ ५ ॥
सहजकहे सोहंसअहं यह प्रतिश्वास बिचारतबिचारत सबको मूल जोमेरो
नाम ताको गँवाय दियो अर्थात् भुलायदियो सो हे जीवौ ! तुमको तौ धोखा
ब्रह्मकी लाभभई परन्तु यह लाभते मेरे जाननेवाला जो ज्ञान ताकी हे भाइयो !
हानिह्वैगई अर्थात् नहा प्राप्तभई ॥ ५ ॥ अबयोगिनको कहै हैं।
ओछीमती चन्द्रगो अथई । त्रिकुटीसंगमस्वामीबसई॥६॥
तवहाँविष्णुकहासमझाई । मैथुनाष्टतुमजीतहुजाई ॥ ७ ॥
वीर्यकी उलटी गतिकरतकरत ओछीमतिकहे बुद्धयादिकसूक्ष्म है थिरह्वैगई
तब चन्द्ररूप जो वीर्य्य सो अथैगयो अर्थात् उलटी गतिह्वैगई तब दूनौनेत्रकों
उलटिकै ध्यानलगाय प्राणके साथ वीर्य्यको चढ़ाय त्रिकुटीमें जहां इड़ा पिंगला
गंगा यमुना सरस्वतीको सङ्गममें स्वामीबसैहै जहां पहुंचौहौ तब लक्ष्मीनारा-
( ६६ ) बीजक कबीरदास ।
देखत उतपतिलागु न वारा । एक मरैयककरैबिचारा ॥ १० ॥
हे जीवौ ! तुम या देखतहौ कि जो समाधि उतरी तो मनादिक उत्पन्न होत
बार नहीं लगैहै तौ संसार कबै छूट्यो औ येहूं देखतहौ कि एकै मरैं हैं तिनको
लाय आय गैवगुफा जरिगई औ फिर वही गैवगुफामें प्राण चढ़ाय मुक्तिको बिचा-
रौहौ अर्थात् मुक्ति चाहौहौ सो हे जीवौ तुम सब बिचारौ ! तौ जो समाधि सुख
नित्य हो तो तौ कैसे मिटिजातो ताते नित्य नहीं है ॥ १० ॥
मुयेगयेकी काहु न कही । झूठी आशलागिजगरही ॥ ११ ॥
तुम्हारे गुरुवा लोगमरे मरिकै कहां गये कौनी गतिको प्राप्त भये या निकासकी
बात तो काहू न कह्यो सो तौ तुम सब न बिचारयो धोखा ब्रह्महोवेकी जो झूटी
आशा ताहीमें तुमसब लागिरहेहौ मोको न जानतभये ॥ ११ ॥
साखी ॥ जरतजरतसेवाँचहु, काहे न करहुगोहारि ॥
बिष बिषयाकैखायहु, रातिदिवसमिलि झारि ॥ १२ ॥
प्रथम तो हेजीवौ ! नानायोनि नरकगर्भ बासके जठराग्निमें जरत जरतसे
बचेहु अर्थात् मोसों नानाप्रार्थना करि गर्भबास ते निकसे सो गर्भबास को दुःख
तौ तुमको भूलिगयो । औ जैन मोसों करार कियेरहौ सोऊ भूलिगयो बिषरू-
पा जो बिषयताही को रातिवदिन खायहु अर्थात् झारि बिषयही भोगकीन्हों मेरी
शरण को काहै न गोहरायो । जे मेरी शरणको गोहरावै हैं तेई बचै हैं सो हे
जीवौ ! जब मेरी शरणको गोहरावोगे तबहीं बचोगे मेरी या प्रतिज्ञा है जो कोई
मेरी शरणको गोहरावैहै ताको मैं बचायही लेउहौं । गोहारिको अर्थ यह है कि
कोई हमारी रक्षाकरै सो साहब शरणगयेरक्षा करतही हैं तामें प्रमाण ॥ ( सकृद्दे
वप्रपन्नाय तवास्मीतिच याचते । अभयंसर्वभूतेभ्योददाम्येतद्व्रतमम ) ॥ १ ॥
इतिबाल्मीकीये ॥ १२ ॥
इति तेरहवीं रमैनी समाप्तम् ।
१ नाना प्रकारके कर्म, उपासना और ज्ञान की जौ कल्पना सोई कल्पना विषय ।