कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ४९ )
साखी ॥ शून्यसहजमनस्मृतिते, प्रकटभई यकज्योति ॥
बलिहारी तापुरुषछवि, निरालंब जो होति ॥ ६ ॥
सहज शून्य जो ( प्रकाश देखिपरे ) ब्रह्मताके मनके स्मरणते एक ज्योति
प्रकटहोयहै सो सालंबहै, योगीजन ब्रह्माण्डमें देखै हैं । औ वह जो अनुभव
ब्रह्महै सोऊ सालंबहै काहेते कि वाहूको मन करिकै अनुभव होयहै सो कबीर-
जी कहै हैं कि ये दोऊ सालंबहै कि तिनकी बलिहारी मैं कहां जाऊं सबके
मालिक निरालंब परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनकी छबिकी मैं बलिहारी
जाऊँहौं साहब निरालंब काहेतेंहैं कि जीवकी जेती सामग्रीहैं मनादिक इंद्रियन-
करिकै ज्ञानकरिकै अनुभव करिकै साहब न देखेजायहैं न जाने जायहैं जब
आपही अपनो हंसरूप देय हैं तब वह रूप करिकै देखेजायहैं औ आपही ते
जानेजाय हैं तामें प्रमाण ॥ ( सो जानै जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहिं तुम्हैं
ह्वैजाई ॥ तुम्हरी कृपा तुम्हहिं रघुनन्दन । जानहिं भक्त भक्ति उरचंदन १) अर्थ हे
श्रीरामचन्द्र जाको तुमजनाइ देहुहै। सो जानै है । जो कहो हमारही जनाये
कैसे जानेगो वेदशास्त्रतो सबननौतैहैं तौ एकबड़ो अवरोधहै जबतुम्हारे जानवेके
लिये शमदमादिक कियो हृदय शुद्ध भयो तब आपहीको मानैहै कि, महीं
रामहौं सो तुमको कैसे जानिसकै । या हेतुते तुम्हारीकृपै ते तुमको जानैहै
अथवा तुमको जानैहै तब तुमही ह्वैकै जानैहै तुम्हारे लोककों जायहै । अर्थात् ।
जब तुमने वाको हंसरूप दियो तब वह पाँचौ शरीर ते भिन्नह्वैकै हंसरूपमें
स्थितभयो तुमको जान्यो वह हंसस्वरूप कैसोहै तुम्हारी अनिर्वचनीयासाभक्तिरूप
जो चन्दनहै सो वाके उरमें लग्योहै ताकी शीतलता ते वह धोखा ब्रह्मके
ज्ञानकी गरमीनहीं आयसकैहै । जिनको कृपाकरिकै तुम हंसरूप देहुहौ सो
जानैहै तुमको सो ऐसे जे साहब हैं परमपुरुष निरालंब तिनको कबीरजी
कहैहैं कि मैं बलिहारी जाऊँहौं परमपुरुष श्रीरामचन्द्रही हैं तामें प्रमाण ॥
( धर्मात्मासत्यसंधश्चरामोदाशरथिर्यदि । पौरुषेचाप्रतिद्वंद्वःशरैनंजहिरावणिम् )॥
इतिवाल्मीकीये ॥ लक्ष्मण जीने मेघनाद के मारत में शपथ कियो है कि
जोपौरुषमें अप्रतिद्वंद्वी श्रीरामहोयं कहेपुरुषत्वमें वैसो दूसरो न होय तो हमारो