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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

रमैनी । ( ५७ )
साखा ॥ मुवा अहै मरिजाहुगे, मुये कि वाजीढोल ॥
स्वप्नस्नेही जगभया, सहिदानी रहिगाबोल ॥ ११ ॥
आँधर सृष्टि सृष्टिमैं बौरी । तीनिलोकमहँलागिठगौरी ॥१॥
साहब कहैहैं कि जे मोको ज्ञानदृष्टि करिकै नहीं देखैहैं ते जे आँधरहैं ते
माया औ निराकार धोखा ब्रह्मयाहीकी गोष्टीजोवार्ता सो करतेभये । ताहीमें
सारीसृष्टिबौरीह्वै जातभई कोई तौ मैंही ब्रह्महौं यहमानि अपने को मुक्तमानत भये,
कोई जीवात्मैको मानै कोई शून्यहिको मानतभये कोई मायामें परि नानादेवत-
नकी उपासना करि अपनेको भक्तमानत भये । सो यही ठगौरी जो माया
है सो तीनोंलोकमें लागतभई सो आगे कहै हैं ॥ १ ॥
ब्रह्माहिंठग्योनागसंहारी । देवनसहितठग्योत्रिपुरारी ॥ २ ॥
राजठगौरी विष्णुहिंपरी । चौदहभुवन केर चौधरी ॥ ३ ॥
मायाब्रह्माकोठग्यो ते संसार की उत्पत्ति करनलगे शेषनागको संहारिकै
कहेबांधिकै नागकहजाई जो पाठहोय तौ मायाब्रह्मा को ठगिसि औ शेषनाग
कहँजाइकै ठगिसि सो शेषनाग पृथ्वीको भारशीशमें धरतभये । देवन सहित
महादेवको ठग्यो ते संसारके संहारमेंलगे । देवता अपने अपने काममें लगे २ औ
चौदह भुवन को चौधरी विष्णुको करिकै ठग्यो ते संसारको पालन करनलगे ।
याहीरीतिते मायाते जेगुणाभिमानी रहे तिनको सबकोठग्यो ॥ ३ ॥
आदिअंतज्यहिकाहुनजानी ।ताकोडरतुमकाहेनमानी॥४॥
फिरिकैसीहै माया जाको आदि अंतकोई जनबई न कियो काहूते न जा-
न्यो वा कुछवस्तुही नहीं है भ्रमहीमात्रहै । जेतोपदार्थ देखैहै सुनैहै कहैहै सो
सबत्रिगुणमय है । गुण न आत्मैंमें है न ब्रह्महीमें है । ताते ये सब मिथ्या-
हीहैं । औ धोखा ब्रह्ममिथ्याहै कैसे सो कहै हैं । सबको निराकरण करतकरत
जो वा रहिजाय है ताही को मानौंहौं कि " सो ब्रह्महमहैं " ताहूको मूलअ-