कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ बँदिमनायफलपावहीं, बंदिदियासोदेव ॥
कहकबीरतेऊबरे, निशिदिननामहिंलेव ॥ ६ ॥
बंदि कहे विद्या अविद्यारूप जो बेरी ताको जे मनावैं हैं ते तौनै फल-
पावैं हैं अर्थात् जे स्वर्गादिक की चाह करैहैं ते लोहेकी बेरीमें परे । जे अहं-
ब्रह्मास्मि मानेते सोने की बेरीमें परे । सो जोने इष्टदेवत नको मनाये सोब-
न्दीही फल देतभये अथवा ते फल देवते दियोहै जिन उपासना कियोहै बन्दि-
में नाय कहे बन्दिमें डारिदिये हैं तेई फल पावै हैं । अर्थात् स्वर्गादिक जे
फलहैं तेसब बंदिमें डारनवारे हैं । सो बंदि डारनवारो जे फलदेय हैं तेकादेव
हैं ? नहीं हैं सो कबीरजी कहैं हैं कि जे श्रीरामचंद्र को नाम निशिदिन लेयहैं
तेई उबरे हैं ॥ ६ ॥
इति नवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथदशवीं रमैनी ।
चौपाई ।
राही लै पिपराही बही । करगी आवत काहु न कही ॥ १ ॥
आई करगी भो अजगूता।जन्म जन्म यम पहिरे बूता ॥ २ ॥
बुतापहिरयमकरै पयाना।तीनलोकमें कीन समाना ॥ ३ ॥
बांधे ब्रह्मा विष्णु महेशू । पार्वती सुत बांध गणेशू ॥ ४ ॥
बाँधेपवन पावक नभनीरू। चन्द्र सूर्य बांधे दोउ वीरू ॥ ५ ॥
सांचमन्त्र बांधेसबझारी । अमृत वस्तु न जानै नारी ॥ ६ ॥
साखी ॥ अमृत वस्तु जानै नहीं, मगन भये कित लोग ॥
कहहिं कविर कामोनहीं, जीवह मरण न योग॥७॥
राही लैपिपराहीबही । करगीआवतकाहुनकही ॥ १ ॥
राहीकहे सुराहके चलनवाले औ पिपराही कहेपीपरकी बनिका की नाई अनेक
मति में डोलनवाले जे जीव तें राही जे हैं तिनहूं को लैकै संसारसागर में