कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६ ) बीजक कबीरदास ।
ऐसो अमृत बस्तु साहब समीपई है वा जीवका जननमरण योगहै अर्थात् नहीं
है व्यंग्यते या कहैहैं कि जीव महामूढ़है । काहेते जो साहब को जानि लेइ
तो जन्म मरन छूट जाइ काहे ते के रक्षक साहबही है । अथवा जिनको सांच
मंत्र माने रहे ते तो सब बांधिगये अमृत वस्तु जो रामनामको साहबमुखअर्थ
सो जानतही नहींहै याते जनन मरण न छूटतभयो ॥ ७ ॥
अरु जो प्रथम तुकमें लोइ और दूजे तुकमें जीवहिमरन नहोइ ऐसा पाठ
होवे तौ यह अर्थ कि, लोइ कही लपट जाईहै प्रकाश तौने ही मै सब लीन
भये, जो कहो लीन भये जीव न रहिगये तो जीव बनेहैं काहेते कि, जीवको
मरन नहीं होईहै । वह ब्रह्मका मैं नहीं ?
इति रमैनी दशवीं समाप्तम् ।
अथ ग्यारहवीं रमैनी ।
गुरुमुख । चौपाई ।
आँधरसृष्टिसृष्टिभै बौरी । तीनिलोकमहँलागिठगौरी ॥ १ ॥
ब्रह्महिं ठग्यो नागसंहारी । देवन सहित ठग्यो त्रिपुरारी ॥ २॥
राज ठगौरी विष्णुहिं परी । चौदह भुवन केर चौधरी ॥ ३ ॥
आदि अंतजेहि काहु न जानी।ताको डर तुम काहे मानी ॥४॥
ऊउतंग तुम जाति पतंगा । यमघर किहेहु जीव कै संगा ॥५॥
नीमकीट जस नीमपियारा । विषको अमृत कहै गँवारा ॥६॥
बिषके संग कवन गुण होई । किंचित लाभ मूल गो खोई ॥७॥
विष अमृतगों एकही सानी । जिन जाना तिनविष कै मानी ८
कहा भये नर सुध बेस्रूझा । बिनपरचै जग मूढ़ न बूझा ॥९॥
मतिके हीन कौन गुण कहई।लालच लागे आशा रहई॥१०॥