कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८ ) बीजक कबीरदास ।
बाण मेघनाद का शिरकाटि लेइ सो मेघनादको शिरकाटि लियोः औ भागवत
हूमैं हैं ॥ ( ध्येयंसदापरिभवघ्नमभीष्टदोहं तीर्थास्पदंशिवविरंचिनुतंशरण्यम् ॥
भृत्यार्तिहंप्रणतपालभवब्धिपोतंवंदेमहापुरुषतेचरणारविंदम् १ ) अर्थ हे महापुरुष
तिहारेचरणारबिंदकीहम बंदना करैहैं कैसे तिहारे चरणारबिंदहैं कि सब
कालमें ध्यानकरिबेके योग्यहैं औ परिभव जो तिरस्कार ताकेनाश करने-
वाले हैं अर्थात् जो कोई ध्यानकरै है ताको तिरस्कार लोकमें कोई नहीं
करैहै। औ मनोबांछित पूर्ण करनेवाले तीर्थ जे हैं तिनके आश्रय भूत औ
शिव विरंचि ते स्तुतिकेरगये शरण्यमकहे रक्षाकरनेमें समर्थ औ दासनके
पीडा हरणवाले दीननके पालनवाले औ संसार समुद्रके नौकारूप। तामें प्रमाण
कबीरजीको ॥ ( साहब कहियेएक को, दूजा कहा न जाय। दूजासाहब जो
कहै, बादबितंडै आय ) ॥ ६ ॥
इतिछठवीं रमैनी समाप्तम्।
अथ सातवींरमैनी ।
( जीवमुख )
जहियाहोतपवनहिंपानी । तहियासृष्टिकौनउतपानी ॥१॥
तहिया होत कली नहिं फूला।तहिया होत गर्भ नहिंमूला २
तहिया होत न बिद्या वेदा । तहिया होत शब्द नहिं खेदा ३
तहिया होत पिंड नहिं बासू।नाधर धरणि न गगन अकासू।४
तहिया होत गुरू नहिं चेला ।गम्य अगम्य न पंथ दुहेला ५
साखी ॥ अविगति की गति क्याकहौं, जाकेगाँउ न ठाँउ॥
गुण बिहीना पेखना, का कहि लीजै नाँउँ ॥६॥