कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । (५३)
षामसौक्लेशलएवशिष्यते नान्यंयथास्थूलतुषावघातिनाम् ॥ इति भागवते ) औ नौ
सूतकहे सगुना जो नवधा भक्ति है तेहिकरिकै बांधिगयो औ यमकहे दुई
बिद्या औ अबिद्या तेहिकरिकै अंजनी जो माया ताके पूत जे जीव हैं ते सब
बांधि गये ॥ १ ॥
यमकेवाहनबाँधिनिजनी । बाँधेसृष्टिकहांलौंगनी ॥ २ ॥
बाँधे देवतेंतीस करोरी । सुमिरतबंदिलोहेगैतोरी ॥ ३ ॥
औ यम जे बिद्या अबिद्या दूनों मायाहैं तिनके सब जीव बाहन भये । काहेतें
कि उन्हींको ढोवन लगे उन्हींकी चाल चलन लगे औ वै जे दूनों मायाहैं ते
बांधिनिजनी कहे फेरिफेरि जीवनको उत्पन्न करिकै संसार दैकै बांधि लियो
औ शीशमें चढ़ी रहती हैं सो अनादि कालते बँधीजो सृष्टि ताको कहांलौं गनी
२ तेंतीसकोटि देवता बांधेगये तिनको सुमिरतमात्रहीमें बंदि कहे लोहेकी बेड़ी
में परिकै तोरी कहे मारेगये अथवा तेंतीसकोटि देवता बांधिगये तिनके सुमिर
तमात्रहीमें बन्दी कहे लोहेकी बेरी में परिके तोरि कहे मरि गये अथवा तेतीस
कोटि देवता बांधे गये तिनके सुमिरत मात्रहीबन्दीकहे लोहेकी बेरीमें परिकै
तोरिकहे मारेगये अथवा तेतीसकोटि देवता बांधेगये तिनके सुमिरतमात्रमें
का बन्दि लोहेकी बेरी जीव तोरिगये ? नहीं तोरिगये ॥ ३ ॥
राजासुमिरै तुरियाचढ़ी । पंथीसुमिरि नामलैवढ़ी ॥ ४ ॥
अर्थविहीना सुमिरैनारी । परजासुमिरैपुहुमीझारी ॥ ५ ॥
तुरीया अवस्था को नामहै तामें ज्ञानी लोग चढ़ी कहे आरूढ़ हैकै राजित
होयहैं ताहीते राजा कहै हैं ते अहंब्रह्मको सुमिरै हैं औ पंथी ने अनेकपंथ चला
वन वालेहैं ते नानामतके पंथमें आरूढ़हैं अपने अपने इष्टदेवनके नामलैके साधन
में बढ़ेहैं सोयहै। बिरही हैं ४ अर्थ बिहीना कहे अर्थ जो है द्रव्य ताको वैराग्य
ते त्यागि बनमें बसिकै अपने इष्टदेवनको सुमरै हैं ते औ पर जो ब्रह्म है
तामें जो जायोचाहै सारी पुहुमी सहित सुमिरैहै अर्थात् सर्वत्र ब्रह्मही देखैहै ते
ये दोऊ सगुण निर्गुण उपासक नारी जो माया है ताहीको सुमिरैहैं काहेते कि
जहांलौं मन जाय है तहां लौं सब माया है ॥ ५ ॥