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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ३४ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ बाप पूतकी ऐकैनारी, औ एकै माय विआय ॥
ऐसा पूत सपूत न देखों, जोबापैचीन्हैंधाय ॥ ६ ॥
बापता धोखाब्रह्महै जाते शुद्धजीवअशुद्धहैउत्पन्नभयेहैं ते अशुद्ध जीव पूतहैं
सो दोऊमाया सबलित भये ताते बाप पूतकीएकै नारी भई । औ पूर्व जगत् का-
रण रूपा जो माया है तौनेहींते(अहंब्रह्म(स्मि)मान्योहै औ तौनेहींते व्यष्टि जीवनकी
उत्पत्तिहूभई है याते दोहुनकी एकै महतारी है।याते एकै माया बियानी है।सो ऐसा
पूत सपूत नहीं देखेहु है कौनसो बाप जोहै ब्रह्म ताको धायकै कहे बहुत बुद्धि
दौरायकैं चीन्हैं कि, यह धोखा है । अब जाकी शक्ति करिकै यह जगत् भयोहै
जौनी भांतिते सो समेटि कै सिंहावलोकन कैकै पुनि कहैहैं ॥ ६ ॥
इति प्रथम रमैनी समाप्तम् ।
अथ दूसरी रमैनी ॥२॥१॥
चौपाई ।
अंतर ज्योति शब्द यक नारी।हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी॥१॥
तेतिरियैभगलिंगअनंता । तेउनजानैआदिउअंता ॥ २ ॥
बाखरीएकविधातैकीन्हा । चौदहठहरपाटिसो लीन्हा॥ ३ ॥
हरिहरब्रह्ममहंतौनाऊ । तेपुनितीनिवसावलगाऊ ॥ ४ ॥
तेपुनिरचिनिखंडब्रह्मांडा । छादर्शनछानवेपखंडा ॥ ५ ॥
पेटहिकाहूनवेदपढ़ाया। सुन्नतिकरायतुरु कनाहिं आया ॥ ६ ॥
नारीमोचित गर्भप्रसूती । स्वांगधरै बहुतै करतूती ॥ ७ ॥
तहियाहमतुमएकैलोहू । एकैप्राणबियायलमोहू ॥ ८ ॥
एकैजनी जनासंसारा । कौनज्ञानते भयो निनारा ॥ ९ ॥
भावालकभगद्वारेआया । भगभोगेतेपुरुष कहाया ॥ १०॥

रमैनी । ( ३५ )
अविगतिकीगतिकाहुनजानी।एकजीभकितकहौंबखानी १ १
जोमुखहोइजीभदशलाषा।तौकोइआयमहंतौभाषा ॥१२॥
साखी ॥ कहहिंकबीर पुकारिकै, ई लेऊ व्यवहार ॥
एक रामनाम जानेविना, भव बूडि मुवा संसार॥१३॥
अंतर ज्योति शब्द यक नारी।हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी॥१॥
अन्तरज्योति कहे वह ज्योतिके अन्तरकेभीतरै नारी जोहै गायत्रीरूपबा-
णी सो शब्द जो है राम नाम ताको लैकै प्रगट भईहै सो मङ्गलमें कहि आ-
येहैं। तौने शब्दकी शक्तिते तानारीके हरि ब्रह्मा त्रिपुरारी भये हैं। अर्थात्
रामनामको जगत् मुख अर्थ लै कै वहै बाणी रूप नारी वेद शास्त्र औ सब सं-
सार प्रगटकियो रामनाममें ये सब भरेंहैं सो मैं अपने मंत्रार्थमें लिख्यो है
सो राम नाममें जो साहब मुख अर्थहै ताको छिपाय दियो ॥ १ ॥
तेतिरियैभगलिंगअनंता । तेउनजानैआदिउअंता ॥ २ ॥
तौन जो है तिरिया ताते अनंत भग लिंग होत भये अर्थात् बहुत स्त्री पुरुष
भये ते अनेक शास्त्रनमें अनेक वेदनमें बिचार करत २ थके तबहूं वह राम
नामके अर्थको अन्त न पाये ॥ २ ॥
वखरीएकविधातैंकीन्हा । चौदहठहरपाटिसोलीन्हा ॥३॥
एक बखरी यह ब्रह्मांड ब्रह्मा बनावत भये सो चौदह ठहर कहे चौदह
भुवन करिकै पाटि लेते भये ॥ ३ ॥
हरिहरब्रह्ममहंतौनाऊ । तेपुनितीनिबसावलगाऊ ॥ ४ ॥
औ हरि हर ब्रह्मा जौन ब्रह्मांड प्रथम ब्रह्मा बनायो है वोही ब्रह्माण्ड में
तीनि गांव बसावत भये तहांके मालिक होत भये औ जे प्रथम ब्रह्मादिक देव-
ता भये हैं तेई ब्रह्मादिकनके अंगनके देवता होतभये । सो मङ्गलमें लिखि-
आयेहैं ब्रह्मादिकनकी उत्पत्ति औपुनि भगवान्की नाभीमें कमल भयो तेहिते
ब्रह्माभयेहैं तिनते उत्पत्ति भई है औ ब्रह्मवैवर्त्तमें प्रथम ब्रह्माकी उत्पत्ति प्रकृति

( ३६ ) बीजक कबीरदास ।
पुरुषके अंगनते भईहै । औपुनि भगवान्की नाभीमें कमल भयोहै जौं मंगल
में कहिआये हैं, तेहिते ब्रह्माभये हैं तिनतें उत्पत्ति भई है । औ तौनै बात या
रमैनीहूं में कहै हैं कि पहिले इच्छा रूपी नारीते ब्रह्मादिक भये । औ पुनि
ब्रह्माण्डांतरानुवर्ती ब्रह्मादिकभये ते सतोगुणाभिमानी जे विष्णुते ऊपर देवलोक
बसावतभये ते ताके मालिक । और जो गुणाभिमानी जे ब्रह्माते मध्यकें
लोक बसाये ते तहांके मालिक । औ तमोगुणाभिमानी जे महादेव ते नीचेकें
लोक बसाये तहांके मालिकं होतभये । सो येतीनौ तीन लोकके मालिक होत
भये सोये तीनों तीन लोकके मालिकै हैं परंतु तौन तौन लोकनकी प्रधानता
देखाई है ॥ ४ ॥
तेपुनिरचिनिखंडब्रह्मांडा । छादर्शनछानवेपखंडा ॥ ५ ॥
पेटहिकाहुनवेदपढ़ाया । सुनतिकरायतुरुकनहिंआया॥६॥
तेतीनौँ देवता मिलिकै ब्रह्मांड में छा दर्शन छानबे पाखंड बनावत भये ॥
“ योगी जंगम सेवरा संन्यासी दुरवेश । छठयें कहिये ब्राह्मण छाघर छाउप-
देश ॥ दशसंन्यासी बारहयोगी चौदहशेष वखाना । बौध अठारहि जंगम
अठारहि चोबिस सेवरा जाना ॥” औ प्रथम उत्पत्तिमें कहि आये हैं ब्रह्मा वि-
ष्णु महेश तें यह ब्रह्मांडके ऊपर अपने लोक बसाये फिरि एक २ अंशते
अनंत कोटि ब्रह्मांडन में बसे जाय ५ औ पेटैते कोउ वेद नहीं पढ़ि आया
कहै गायत्री नहीं पढ़्यौ बरुवा नहीं भयो औ न पेटैते सुनति करायकै तुरुक
बनिआया है ताते॒हिन्दू तुरुकको जीव एकईहै सोतो ना जान्यो वेद किताब
की वाणी सुनिकै अपने २ कर्मते सब अनेक भेद ह्वैगये वेद किताबको भेद
न जान्यो ॥ ६ ॥
नारीमोचित गर्भप्रसूती । स्वांगधरै बहुतैकरतूती ॥ ७ ॥
तहियाहमतुमएकैलोहू । एकैप्राणबियापलमोहू ॥ ८ ॥
गर्भबासमें जबतुम रहेहो तब न हिन्दूए रह्योहै नातुरुकरह्यो न वेद पढ्योँ
नं तिहारी सुन्नति भई । जब गर्भते निकसे तब कर्म करिकै हिन्दू मुसलमान
ह्वैगये । बहै नारी जो है वाणी ताही में चित्त लगायकै कर्म करिकै नाना

रमैनी । ( ३७ )
स्वाग हिंदू मुसल्मान भये ७ सो कबीरजी कहैहैं कि जैसे हम शुद्धहैं तैसे तुमहूं
शुद्ध रहैहौ । जब तुमहीं मन प्रकट कियो है औ इच्छा भई है तब हम तुम
एकही लोहू रहे हैं अर्थात् एकई जाति चित्त स्वरूप शुद्ध रहे हैं । सो एक
मोह कहे भ्रम जो है मन सो व्याप्त ह्वैकै नाना भांतिन तुमको कराइ दियों
कि हम हिंदू हैं हम तुरुकहैं इत्यादिक सबसों ॥ ८ ॥
एकैजनी जनासंसारा । कौनज्ञानते भयोनिनारा ॥ ९ ॥
भावालकभगद्वारेआया । भगभोगैतेपुरुषकहाया ॥ १० ॥
अविगतिकीगतिकाहुनजानी। एकजीभकेतकहौंबखानी ११
एक जनी कहै उत्पत्ति करनहारी माया औ एकै जना कहे उत्पत्ति करन-
हार मनका अनुभव ब्रह्ममाया सबलित इन्हीं ते सब जगत् है तुम कौन ज्ञा-
नते हिंदू तुरुक नाना जाति बनाय लिये निनार निनार ९ जब भगकें द्वारे आया
तब बालक कहाया औ जब भोगन लग्यो तब पुरुष कहाया १० अविगति
जो है धोखा ब्रह्म ताकी गति कोई नहीं जानै है मैं एक जीभते केतो बखा-
निकै कहौं ॥ ११ ॥
जौमुखहोइजीभदशलाषा । तौकोइआयमहंतौभाषा॥१२॥
जो एक मुखमें लाख जीभ होय तौ कोई कहे महन्त वही ब्रह्मको भाषे
अर्थात् न भाषै यह याकुअर्थ है काहेते कि वाके तौ कुछ रूप रेखा हई नहीं
है धोखही है अथवा महंत जे ब्रह्मादिक अपने २ लोकके मालिक जिन जग-
तकी उत्पत्ति कियो है तिनके करतव्यताको जो काहूके दशलाख जीभ होय
कहै तौ का कहिसकै अर्थात् नहीं कहिसकै ॥ १२ ॥
साखी ॥ कहहिंकबीर पुकारिके, ई लयऊ ब्यवहार ॥
रामनाम जानेबिना; भव बूड़ि मुवा संसार॥१३॥
कबीरजी पुकारिकै कहैहैं कि या जो उत्पत्ति वर्णन करिआये सो सब लय
कहे नाशमानहै ! औ ऊ कहे वह धोखा ब्रह्मको जो वर्णन करि आये सो व्यवहा-

( ३८ ) बीजक कबीरदास ।
रै मात्रहै अर्थात् समुझेते धोखाँहीहै कुछ वस्तु नहीं है सो एक बिना रामनामके
जाने कहे साहबको जो बतावैहै रामनाम सो अर्थ बिनजाने मायाको बतायो जौ
है राम नाममें संसार औ ब्रह्माको अर्थ तौनेहै भव कहे भयरूप समुद्र तौनैंमें
संसार बूडि मुवा इहां लक्षणा है संसार बूडि मुवाकहे संसारी जीव बूडि
मुये ॥ १३ ॥
इतिदूजीरमैनीसमाप्तम् ।
अथ तीसरी रमैनी ।
चौपाई ।
प्रथम अरंभ कौनके भाऊ । दूसर प्रकट कीन सोठाऊ ॥१॥
प्रकटेब्रह्म विष्णु शिव शक्ती।प्रथमैभक्ति कीन जिव उक्ती॥२॥
प्रकटेपवन पानी औ छाया।बहुबिस्तारकै प्रकटी माया ३॥
प्रकटे अंड पिंड ब्रम्हंड।पृथिवी प्रकटकीन नवखंडा॥४॥
प्रकटे सिध साधक संन्यासी । ये सब लागिरहे अविनासी५
प्रकटे सुरनर मुनिसबझारी । तेऊ खोजि परे सबहारी॥६॥
साखी ॥ जीउ सीउ सब प्रकटे, वे ठाकुर सब दास ॥
कबिर और जानैनहीं, एक रामनामकी आस॥७॥
प्रथम अरंभ कौनके भाऊ । दूसर प्रकटकीनसोठाऊ ॥ १॥
प्रकटेब्रह्मविष्णुशिवशक्ती । प्रथमैभक्तिकीनजिवउक्ती ॥२॥
प्रथमअरंभ कौनके भाऊकहे भयो औ दूसर कौन प्रकटकियो जाते ये
सब व्यवहारहैं १ प्रथम अनुमान समष्टिजीवकियो मनके अनुभव ते ब्रह्म-
भयो औ बाणीभई ताते ब्रह्मा विष्णु महेशादिक देवता प्रकटभये उनकी सब

रमैनी । ( ३९ )

शक्ति प्रकटभई औप्रथम ही जीव जोहै सो अपनी उक्तिकरिकै उक्तदेवनकी
भक्तिकरत भयो अर्थात् नाना उपासना बांधिलेतभये ॥ २ ॥
प्रकटेपवनपानीऔछाया। बहुविस्तारकैकैप्रकटीमाया॥३॥
प्रकटेअंडापिंडब्रह्मांडा। पृथिवीप्रकटकीननवखण्डा ॥ ४ ॥
वे जे ब्रह्मादिकहैं ते अपनो अपनो ब्रह्माण्ड करतब करतभये तेहिसे पवन
पानी औछाया बहुतबिस्तारकैकै मायाप्रकटभई । औचारि जे खानिहैं
अंडज पिंडज स्वेदज उद्भिज्ज प्रकट भये जे ब्रह्मांडमें हैं औ नवखण्ड पृथ्वी
प्रकट भई ॥ ३ ॥ ४ ॥
प्रकटेसिधसाधकसंन्यासी। ईसबलागिरहेअबिनासी॥५॥
प्रकटेसुरनरमुनिसवझारी। तेऊखोजिपरे सबहारी ॥ ६ ॥
औ सिद्धसाधक संन्यासी प्रकटहोतभये ये संपूर्णजे हैं ते अबिनाशीमें लागि-
रहे हैं अर्थात् अबिनाशीको खोजैंहैं ॥ ५ ॥ औसुरनरमुनिसब झारिकै प्रकटहोत
भये तेऊ अबिनाशीको खोजत खोजत हारि परे तिनहूं न पायो ॥ ६ ॥
साखी ॥ जीव सीव सब प्रकटे, वे ठाकुर सबदास ॥
कबीर और जाने नहीं, एकरामनामकी आस॥७॥
जीव औ सीव कहे ईश्वर सो सब प्रकटे सो ईश्वर तो ठाकुर भयो औ
सब जीव दासभये । सोकबीरजी कहै हैं कि हमतो दूसरोकाहूको नहीं जाने
हैं न अबिनाशी निर्गुण ब्रह्मको जानै, न सगुणईश्वरन को जानै । निर्गुण
सगुण के परे जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनके एक रामनामकी हमोर आशाहै कि
वही हमारो उद्धार करैगो अथवा कबीर कहै काया के बीर जीव ! और को
तैनाजानु एक रामनामही को जानु यही संसार ते छोड़ावैगो ॥
इति तीसरी रमैनी समाप्तम् ।

( ४० ) बीजक कबीरदास ।
अथ चौथीरमैनी ।
चौपाई ।
प्रथम चरणगुरूकीन बिचारा । करतागावै सिरजनहारा॥१॥
कर्म करिकै जग बौराया।शक्ति भक्तिलै बांधिनिमाया॥२॥
अद्भुत रूप जातिकी वानी।उपजी प्रीति रमैनी ठानी ॥३॥
गुणिअनगुणी अर्थनहिं आया। बहुतकजने चीन्हि नहिं पाया ४
जो चीन्है तेहि निर्मल अंगा।अनचीन्हे नल भयेपतंगा॥५॥
साखी ॥ चीन्हि चीन्हि कह गावहू, बानी परी न चीन्हि॥
आदि अंत उत्पति प्रलय, सब आपुहिकहि दीन्हि॥६॥
──────
प्रथमचरणगुरूकीनविचारा । करतागावैसिरजनहारा ॥१॥
कर्म करिकैजगबौराया । शक्तिभक्तिलैबांधिनिमाया॥२॥
प्रथमचरणकहे जगत्‌की आदिमें गुरुकहे साहब बिचारकीन कहेसुरति
दीन कि हमको जानै,हम हंसरूपदै अपनेधामकोलै आवैं।सो जीवनेह ते वा चैतन्यता
पाय जगत्मुख है जगत्‌उत्पन्नकरिकै संसारीह्वैगये सो करता तो साहबहैं जिनकी चैत-
न्यता पायजीव समष्टिते व्यष्टिभये तौनेसाहबकी करतब्यता तो न जान्यो ब्रह्मादिक
नहीको सिरजनहार मानतभये ॥ १ ॥ तेईब्रह्मादिक नानाकर्मनको प्रतिपादन
करिकै जगत् बौरायदियो औशक्ति जो है गायत्री तौने के उपदेशकी विधिकैकै
ताकी भक्ति आपकैकै औजीवनको कराय कै माया में बांधदियो ॥ २ ॥
अद्भुत रूप जातिकीवानी । उपजीप्रीतिरमैनीठानी ॥ ३ ॥
गुणिअनगुणीअर्थनहिंआया।बहुतकजनेचीन्हिनहिंपाया४
अद्भुत रूप औ नाना जातिकी जोहै कर्म प्रतिपादक ब्रह्मादिकनकी बाणी
अर्थात् अद्भुतरूपनके हैं ध्यान जिनमें कहेकाहूके बहुत मूड़ काहूके बहुत हाथ

रमैनी। ( ४१ )
काहूके बहुतपांय काहूके मूंडनहीं ( छिन्नमस्ताको ध्यान लिखे है कि, हाथमें
मूँडलीने है गलेमें लोइ चले है सो मुहेमें परैहै ताको पीये है ) । और नाना-
भांतिकी जो है कर्म्म-प्रतिपादिका बाणी अर्थात अद्भुत रूपनकाहै ध्यान तिनमें
यहिरीति के देवतनकी उपासना करैहै औनाना जातिकीकहे नाना तरहकी है
उपासना बर्णन जिनमें ऐसी उनकी बाणीसुनके तिन 'तिन देवनपर जीवनकी
प्रीति उपजतभई । औ रमैनीठानी जो कह्यो सो अपने अपने उपास्य देव
तनकी रमनी कहै कथा सो ब्रह्मादिकन की बाणीको आशयलेके बनाय लेते
भये ॥ ३ ॥ गुणीजेंहै सगुण उपासनावाले तेजिवको स्वस्वरूप दासरूपता
खोजनलगे औअनगुणी जैहैं निर्गुणवाले ते जीवको अनुमान जो ब्रह्मत्वरूपता
खोजनलगे सो वा वेदतात्पर्यार्थ दुइमें कोई नहीं पाये अर्थात् बहुतेरेनेबहुत-
बिचारकियो परंतु न चीन्हपायो ॥ ३ ॥ ४ ॥
जोचीन्है तेहिनिर्मलअंगा । अनचीन्हेनलभयेपतंगा ५
जे यह धोखाको जानैहैं कि यह धोखाहै तिनहीं को जानिये कि इनके
पारखहै । यहबात बिनाजाने जगत्‌के जेजीवहैं ते जैसे दीपकमें पतंग जरिजा-
यहै ऐसे वह धोखामेंपरिकै नाना दुःखपावैहैं । औ जोकोई साहबको चीन्हैहै
जाको नेतिनेति वेदकहैंहैं औ पारिख करैहैं ताके निर्मलअंग हैजायहै अर्थात्
हंसरूप पावै है । काहेते कि वह साहब तो निर्गुण सगुण मनबचनके परैहै
सोजब वाको चीन्ह्यौ तब वाहू मनबचनके पर है जायहै ॥ ५ ॥
साखी॥चीन्हि चीन्हि कह, गावहू वाणीपरी न चीन्ह ॥
आदिअंत उत्पत्तिप्रलय,सवआपुहिकहिदीन्ह ॥६॥
चीन्हौ चीन्हौ तुमकहा गावहुहौ अर्थात् कहाकहौहौ वहबाणीतो तुमकों
चीन्हि नहीं परी काहेते बाणी आपही कहतजाय है कि जाकी उत्पत्तिहोयहै
ताकी प्रलयभी होय है; जाकी आदि होयहै ताको अंतहू होयहै, तातेजेते
पदार्थ जगत्‌में बाणी आदिदैहैं ते मन बचनके परे नहीं हैं । औ जोचीन्हैहै
ताको निर्मल अंग होयजायहै । यहजो कह्यो ताते यहदेखाय दियो कि जब

( ४२ ) बीजक कबीरदास ।
मनादिक एको नहीं रहिजायहैं, तब मन वचनके परे जो पुरुषहै सो वह
मुक्तजीवको हंसरूप देइ है ताको पायकै तेहिहंसरूपके इन्द्रिनते साहबको
देखैहैं सो याकोप्रमाण बेदमें है ॥ “मुक्तस्यविग्रहोलाभः” इतिकठशाखायाम् ।
सो यह बिचारनहीं करै हैं बाणीकेफेरमें ब्रह्महूं भूलिगये सो आगे कहैंहैं ॥ ६ ॥
इतिचौथीरमैनीसमाप्तम् ।
अथ पांचवीं रमैनी ।
चौपाई ।
कहँलौंकहौंयुगनकीबाता । भूलेब्रह्म न चीन्हे त्राता ॥ १ ॥
हरिहर ब्रह्माकेमनभाई । बिबि अक्षर लै युगतिबनाई ॥ २ ॥
बिबिअक्षरकाकीनविधाना।अनहदशब्दज्योतिपरमाना ३॥
अक्षरपढिगुनिराहचलाई । सनकसनन्दनकेमनभाई ॥ ४ ॥
वेदकिताबकीन्हबिस्तारा। फैलगैलमनअगमअपारा॥ ५ ॥
चहुंयुगभक्तनबांधलबाटी । समुझिनपरै मोटरी फाटी ॥ ६ ॥
भैभै पृथवी चहुंदिशिधावै । सुस्थिर होय न औषध पावै ॥ ७ ॥
होयभिस्तजोचितनडोलावै।खसमैंछोड़िदोजखकोधावै८॥
पूरुव दिशा हंसगति होई । है समीप संधि बूझै कोई ॥ ९ ॥
भक्तौभक्तिनकीनशृंगारा । बूड़िगयेसबमांझहिंधरा ॥ १०॥
साखी ॥ बिनगुरुज्ञानैदुन्दभो, खसमकही मिलिवात ॥
युगयुग कहवैया कहै, काहु न मानीजात ॥ १ ॥
कहँलौंकहौंयुगनकीबाता । भूलेब्रह्म न चीन्हे त्राता ॥ १॥
हरिहर ब्रह्माकेमनभाई। बिबि अक्षर लै युगतिबनाई ॥ २ ॥

रमैनी । ( ४३ )
युगनकी बातमैं कहांलोंकहौं मनबचननके परेजोहै ताकिबाटब्रह्मो भूलिगयेहैं
जो बाट पाठहोयहै तोयह अर्थहै औजोत्राता पाठ होयहै तो यहअर्थ है कि सबके
त्राताकहे रक्षक जो साहब ताको ब्रह्मा भूलगयेहैं १ जौन रामनामको अर्थ जग-
दमुख लैके बाणी औसमष्टि जीव आदि जगत् रच्योहै तौनेयुगतिब्रह्मोविष्णु महे-
शके मन में भावत भई सो दूनो अक्षर रामनाम को लैके रचत भये ॥ २ ॥
बिविअक्षरकाकीनविधाना।अनहदशब्दज्योतिपरमाना ३॥
अक्षरपढ़िगुनिराहचलाई। सनकसनन्दनकेमनभाई ॥ ४ ॥
ओई जे द्वै अक्षरहैं तिनको बिधान करतभये (और जो बंधान पाठहोई तौ
बंधान करतभये ) । कहांबिधानकियो कि ज्योतिरूपी जोहै आदिशक्ति रेफरूप
अग्निबीज परा जाकोमंगल में पांचब्रह्ममें लिख्यो है ताहीते अनहद शब्द उठावत
भये मनमें जो कुछ कहनेकी बासना आई चित्तमें सो मूलाधारकी जोहै ज्योति
तौनेमें मन मिल्यो कहे संकल्पउठयो तबवह ज्योति डोली ताते कछु पवनको सं-
चारभयो ताते नादकी प्रकटता भई तब वह पराबानी उठी सो पश्यंती मध्यमाहै
त्रिकुटीके ऊपर मकारहै विन्दुरूपसहस्र कमलमें तहां टक्करपाय बैखरी ये तीनरूप-
ह्वैकैबाहरको आई। सो जहां अग्निको औपवनको संयोग होयहै तहां जोशब्द-
होयहै सो अनहद कहावैहै। सो वह बाणी जो बाहर आई सोसम्पूर्ण अक्षर
भै। तौने पढ़ि गुनिकै सनक सनंदन जे जीव हैं तिनके मनमें भावत भई
अथवा सनकसनंदनादिक जे ब्रह्माकेपुत्र तिनके मनमें भावत भई सो वहै राह
चलावत भये ॥ ३ ॥ ४ ॥
वेदकितावकीन्हविस्तारा। फैलगैलमनअगमअपारा ॥५॥
तेई अक्षरनको लैके वेद किताब कुरान पुरान जेहैं तिनको बिस्तार करतभये ।
सो सबके मनमें फैलगैल कहे फैलजात भई अर्थात् जाकेमनमें जौन गैलनीकी
लगी सोचतभये । सोवहगैल तोभूलहीगये बहुतगैल ह्वैगई । अपने अपने मत
नकी अपनी अपनी गैलकहैंहैं कि यही सिद्धांतहै । तिहिते नानासिद्धांत ह्वै
गये जोसिद्धांतहै ताको तो पावै नहीं। वेदादिकनको कुरानादिकनको कह-

( ४४ ) बीजक कबीरदास ।
नलगे कि अगमै है अपारहै काहेतें कि नानामतहैं तिनमेंवेदकुरानको प्रमाण सब
मैं है सो एक सिद्धांतमें निश्चय काहूकी न होत भई अथवा अगम अपार जो
धोखा ब्रह्महै सोई सबके सिद्धांतमें फैलगयो कहै ब्रह्मही रहिगयो अर्थात्
अपने अपने मतनमें सिद्धांत वही ब्रह्महीको करत भये । सो वह धोखा तों
अगम अपारहै काहूको मिलबइ नहीं कियो ॥ ५ ॥
चहुंयुगभक्तनबाँधलबाटी। समुझिनपरैमोटरीफाटी॥ ६ ॥
भै भै पृथ्वीचहुंदिशिधावै। सुस्थिरहोयनऔषधपावै ॥ ७ ॥
चारिहुयुगके नाना देवतनके जे भक्तहैं ते अपनी अपनी राह संसार छुटवेकी
बांधत भये तबहूं वह सिद्धांत न समुझि पर्यो काहेते कि बहुत राह ह्वैगई
रामनामके संसार मुख अर्थमेंहै तो सब मतबनेही हैं परंतु साहबमुख जो
अर्थ है रामनामको ताको भूलही गये । भरमकी जो है मोटरी सो फटी कहे
पण्डित भये पढ़े भरम नाशकी उपायकरनलगे अर्थात् शास्त्रनके अर्थ विचार-
नलगे यही फटिबो है सो वह राह तो पाई नहीं बहुत राह ह्वैगई तब नाना
प्रकारकी शंकाउठी भरम फैलिरह्यो नाना शास्त्रनके सिद्धांतमें वेदको प्रमाण
सबहीमें मिलैहैं काको सांच कहैं काको असांच कहैं ताते शास्त्रनमें एको सि-
द्धांत न करिसकें ६ तब जीवजेहैं ते भै भै पृथ्वीमेंचारों ओर भ्रमन लगे खो-
जनलगे एकहु मतको सिद्धांत नहीं पावैंहैं सो यहरोगकी औषध, जो साहब-
को जानै है ताही, बिरले संतके पासमें है सो तौ पावत न भये औरै और में लगे
ताते स्थिर न होत भये ॥ ६ ॥ ७ ॥
होयभिस्तजोचितनडोलावै। खसमैछोड़िदोजखकोधावै ८॥
पूरुवदिशाहंसगतिहोई । है समीप संधि बूझैकोई ॥ ९ ॥
जो चित्त न डोलावै स्वधर्ममें चलै तौ भिस्त जो स्वर्ग सो होय है अथवा जौ
ने जौने देवतनकी उपासना करैहै तिनके लोकजायहै अथवा यज्ञपुरुषकी आरा-
धना करिकै स्वर्गजायहै औ खसम कहे मालिक ऐसे जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको

रमैनी । ( ४५ )
भुलाइकै सब जीव दौरै हैं मुक्तकहांतै होयँ । दोजख जो नरकहै ताहीमें
परैहैं । इहांस्वर्गहूको नरकही मानिकै कहैहैं काहेते कि खसमके भूले जो स्वर्गहू
जायगो तौ दुःखही पावैगो आखिर गिरिही परैगो ॥ ८ ॥ पूर्व दिशा कहे
सबके पूर्व जब शुद्धजीव रह्योहै कहे जब शुद्धह्वैकै अपनेस्वस्वरूपको चीन्है
तब साहब हंसस्वरूप देय है । सो वा साहबको बिचार कर्मके बाहिरैहै सो
याकी जो संधिहै कहे बिचारहै सो समीपही है । जो अपने स्वरूपको चीन्है तौ
साहब हंसरूप देवै करै परन्तु बूझत कोई कोई है ॥ ९ ॥
भक्तौभक्तिनकीनशृँगारा । बूड़िगयेसबमांझहिधारा ॥१०॥
ज्ञान मिश्रावाले जेभक्तहैं ते भक्तिनि जो माया तेहिते शृंगार करतभये कहे
बिचार करतभये कि हमहीं ब्रह्महैं । वह मनकी धारामें बूड़िगये । कहां बूड़े ?
कि यहसब मिथ्याहै यहकहतकहत एक अनुभव सिद्धांतराख्यो सो अनुभवजीव
को है ताते मनते भिन्न नहीं है वही मनकी मांझ धारामें बूड़िगये ॥ अथवा
साहबको छोड़िकै जे नाना देवतनके भजन करैहैं ते भक्त भक्तिनि कहावै हैं
ते साहबको तो न जान्यो शृंगार करतभये कहे नानावेष बनावतभये कोई छिद्र-
नांकौकी ओर चंदनदियो कोई मृत्तिका दियो कोई राख लगायो इत्यादिक
नानावेष बनावत भये ते सब संसाररूपी समुद्रकी मांझ धारामें बूड़िगये॥१०॥
साखी ॥ विनगुरुज्ञानै द्वन्द्वभो, खसमकही मिलिबात ॥
युगयुग कहवैया कहै, काहू न मानीजात ॥११॥
खसम जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते मिलीबात कही कहे अपनो रामनाम
बतायो तामें द्वैअर्थ रह्यो एकसाहबमुख एकसंसारमुख सो आदिमङ्गल में लि-
खियाये हैं । सोसबते श्रेष्ठ गुरुसाहब तिनको ज्ञान तो नहीं भयो संसारमुख
अर्थ ग्रहण कियो ताते द्वन्दकहे जन्ममरण दुःख सुख स्त्री पुरुष ज्ञान अज्ञान
इत्यादिक संसारमें होतभयो सो कबीरजी कहैहैं कि युगयुगमें कहनहार जो
मैंहौं कबीर सो कह्यो मेरीकही बात काहूसों नहीं मानी जातहै ॥ ११ ॥
इतिपँचईरमैनीसमाप्तम् ।

( ४६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ छठी रमैनी ।
चौपाई ।
वर्णहुं कौनरूप औ रेखा । दूसर कौन आय जो देखा १
औ ओंकार आदिनहिंवेदा । ताकर कहौं कौन कुलभेदा २
नहिंतारागणनहिंरविचंदा । नहिंकछुहोत पिताके बिंदा ३
नहिंजलनहिंथलनहिंथिरपवना।कोधरैनामहुकुमकोवरना४
नहिंकछुहोतदिवसअरुराती । ताकरकहहुकौनकुलजाती५
साखी ॥ शून्यसहज मनस्मृतिते, प्रकटभई यकज्योति ॥
बलिहारी तापुरुष छवि, निरालंब जो होति ६॥
वर्णहुंकौनरूपऔरेखा । दूसरकौन आय जो देखा १
औ ओंकार आदि नहींवेदा । ताकरकहौं कौनकुलभेदा २
वह जो अनिर्वचनीयहै ताको कौनरूप रेखावर्णनकरों मैंहीं नहीं वर्णन करि
सकौं हौं तौ दूसर कौन आयजोदेख्यो ॥ १ ॥ प्रणवको वेदहू नहीं जानेहैं
काहेते कि प्रणव एकाक्षरब्रह्मवेदनको आदि है सो तौ प्रणवहू नहीं रह्यो
ताहूको आदि है उसको कौन कुल भेद कहौं ॥ २ ॥
नहिंतारागणनहिंरविचंदा । नहिंकछुहोतपिताकेबिंदा ३
नहिंजलनहिंथलनहिंथिरपवना।कोधरैनामहुकुमकोवरना४
नहिंकछुहोतदिवसअरुराती । ताकरकहहुंकौनकुलजाती५
न तारागण न सूर्य्य न चंद्रमा न पिताको बिंदु एकौ नहीं रहे जाते सब
उत्पत्तिहै ॥३॥ पृथ्‍वी अप् तेज, वायु आकाश ये एकौ नहीं रहे तहां कौन नाम
धरतभये औ काको हुकुम वर्णन करत भये ॥ ४ ॥ औ तहां न दिवस होत
भयो न रात्रि होत भई ताकी कौन कुलजाति कहौं ॥ ५ ॥

रमैनी । ( ४९ )
साखी ॥ शून्यसहजमनस्मृतिते, प्रकटभई यकज्योति ॥
बलिहारी तापुरुषछवि, निरालंब जो होति ॥ ६ ॥
सहज शून्य जो ( प्रकाश देखिपरे ) ब्रह्मताके मनके स्मरणते एक ज्योति
प्रकटहोयहै सो सालंबहै, योगीजन ब्रह्माण्डमें देखै हैं । औ वह जो अनुभव
ब्रह्महै सोऊ सालंबहै काहेते कि वाहूको मन करिकै अनुभव होयहै सो कबीर-
जी कहै हैं कि ये दोऊ सालंबहै कि तिनकी बलिहारी मैं कहां जाऊं सबके
मालिक निरालंब परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनकी छबिकी मैं बलिहारी
जाऊँहौं साहब निरालंब काहेतेंहैं कि जीवकी जेती सामग्रीहैं मनादिक इंद्रियन-
करिकै ज्ञानकरिकै अनुभव करिकै साहब न देखेजायहैं न जाने जायहैं जब
आपही अपनो हंसरूप देय हैं तब वह रूप करिकै देखेजायहैं औ आपही ते
जानेजाय हैं तामें प्रमाण ॥ ( सो जानै जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहिं तुम्हैं
ह्वैजाई ॥ तुम्हरी कृपा तुम्हहिं रघुनन्दन । जानहिं भक्त भक्ति उरचंदन १) अर्थ हे
श्रीरामचन्द्र जाको तुमजनाइ देहुहै। सो जानै है । जो कहो हमारही जनाये
कैसे जानेगो वेदशास्त्रतो सबननौतैहैं तौ एकबड़ो अवरोधहै जबतुम्हारे जानवेके
लिये शमदमादिक कियो हृदय शुद्ध भयो तब आपहीको मानैहै कि, महीं
रामहौं सो तुमको कैसे जानिसकै । या हेतुते तुम्हारीकृपै ते तुमको जानैहै
अथवा तुमको जानैहै तब तुमही ह्वैकै जानैहै तुम्हारे लोककों जायहै । अर्थात् ।
जब तुमने वाको हंसरूप दियो तब वह पाँचौ शरीर ते भिन्नह्वैकै हंसरूपमें
स्थितभयो तुमको जान्यो वह हंसस्वरूप कैसोहै तुम्हारी अनिर्वचनीयासाभक्तिरूप
जो चन्दनहै सो वाके उरमें लग्योहै ताकी शीतलता ते वह धोखा ब्रह्मके
ज्ञानकी गरमीनहीं आयसकैहै । जिनको कृपाकरिकै तुम हंसरूप देहुहौ सो
जानैहै तुमको सो ऐसे जे साहब हैं परमपुरुष निरालंब तिनको कबीरजी
कहैहैं कि मैं बलिहारी जाऊँहौं परमपुरुष श्रीरामचन्द्रही हैं तामें प्रमाण ॥
( धर्मात्मासत्यसंधश्चरामोदाशरथिर्यदि । पौरुषेचाप्रतिद्वंद्वःशरैनंजहिरावणिम् )॥
इतिवाल्मीकीये ॥ लक्ष्मण जीने मेघनाद के मारत में शपथ कियो है कि
जोपौरुषमें अप्रतिद्वंद्वी श्रीरामहोयं कहेपुरुषत्वमें वैसो दूसरो न होय तो हमारो

( ४८ ) बीजक कबीरदास ।
बाण मेघनाद का शिरकाटि लेइ सो मेघनादको शिरकाटि लियोः औ भागवत
हूमैं हैं ॥ ( ध्येयंसदापरिभवघ्नमभीष्टदोहं तीर्थास्पदंशिवविरंचिनुतंशरण्यम् ॥
भृत्यार्तिहंप्रणतपालभवब्धिपोतंवंदेमहापुरुषतेचरणारविंदम् १ ) अर्थ हे महापुरुष
तिहारेचरणारबिंदकीहम बंदना करैहैं कैसे तिहारे चरणारबिंदहैं कि सब
कालमें ध्यानकरिबेके योग्यहैं औ परिभव जो तिरस्कार ताकेनाश करने-
वाले हैं अर्थात् जो कोई ध्यानकरै है ताको तिरस्कार लोकमें कोई नहीं
करैहै। औ मनोबांछित पूर्ण करनेवाले तीर्थ जे हैं तिनके आश्रय भूत औ
शिव विरंचि ते स्तुतिकेरगये शरण्यमकहे रक्षाकरनेमें समर्थ औ दासनके
पीडा हरणवाले दीननके पालनवाले औ संसार समुद्रके नौकारूप। तामें प्रमाण
कबीरजीको ॥ ( साहब कहियेएक को, दूजा कहा न जाय। दूजासाहब जो
कहै, बादबितंडै आय ) ॥ ६ ॥
इतिछठवीं रमैनी समाप्तम्।
अथ सातवींरमैनी ।
( जीवमुख )
जहियाहोतपवनहिंपानी । तहियासृष्टिकौनउतपानी ॥१॥
तहिया होत कली नहिं फूला।तहिया होत गर्भ नहिंमूला २
तहिया होत न बिद्या वेदा । तहिया होत शब्द नहिं खेदा ३
तहिया होत पिंड नहिं बासू।नाधर धरणि न गगन अकासू।४
तहिया होत गुरू नहिं चेला ।गम्य अगम्य न पंथ दुहेला ५
साखी ॥ अविगति की गति क्याकहौं, जाकेगाँउ न ठाँउ॥
गुण बिहीना पेखना, का कहि लीजै नाँउँ ॥६॥

रमैनी । (४९)
जहियाहोतपवननहिंपानी। तहियासृष्टिकौनउतपानी॥१॥
तहियाहोतकलीनाहिंफूला। तहियाहोतगर्भनाहिंमूला ॥२॥
जहिया कहे जेहि समय सृष्टि नहीं रही जेहि समय न पवन रह्यो न पानी
रह्यो तब सृष्टिको कौन उत्पन्नकियो १ न तब कली रही न फूल रह्यो अर्थात्
न बालरह्यो न वृद्धरह्यो न गर्भरह्यो न गर्भको मूलबीज रह्यो ॥ २ ॥
तहियाहोतनविद्यावेदा । तहियाहोतशब्दनाहिंखेदा ॥ ३॥
तहियाहोतपिंडनहिंवासू । नाघरधरणिनगगनअकासू॥४॥
तहियाहोतगुरुनहिंचेला । गम्यअगम्यनपंथदुहेला ॥ ५ ॥
न वेदरह्यो न चौदहौ विद्यारहीं न शब्द रह्यो न खेद कहे दुःखरह्यो ३
न पिंडरह्यो न पिंडमें जीवको बासरह्यो न अधरकहे पातालरह्यो ना धरणिरही
न आकाश रह्यो ४ न गुरुरह्यो न चेला रह्यो न गम्यकहे सगुणरह्यो न अगम्य
कहे निर्गुणरह्यो औ दुहेला कहे दोनोंपंथ नहींरहे ॥ ५ ॥
साखी ॥ अविगतकीगतिक्याकहौं, जाकेगाँउनठाँउ ॥
गुणविहीना पेखना, काकहिलिजै नाँउ ॥ ६ ॥
वह जो अविगतकहे अव्यक्त जो नहीं प्रकटहोय, धोखा ब्रह्म है निराकार
ताकेगाँव ठाँउ नहीं है वह गुणकरिकै विहीन जो निर्गुणहै ताको पेखना कहे
देखिबेको का कहिकै नामलीजै कि यहहै वातो कुछवस्तुही नहीं है ॥ ७ ॥
इति सातवीं रमैनीसमाप्तम् ।
अथ आठवीं रमैनी ।
( वेदांत विचार )
तत्त्वमसी इनके उपदेशा । ईउपनिषद कहै सन्देशा ॥ १ ॥
उनिश्चय उनकेबड़भारी। वाहिकिवर्णकरै अधिकारी ॥२॥
परमतत्त्वकानिजपरमाना।सनकादिकनारदसुखमाना ॥३॥
४

( ५० ) बीजक कबीरदास ।
याज्ञवल्क्यऔजनकसँबादा । दत्तात्रयी वहै रसस्वादा ॥४॥
वहै वसिष्ठ राममिलि गाई । वहै कृष्णऊधवसमुझाई ॥५॥
वहै बात जो जनक दृढाई । देहै धरे विदेह कहाई ॥ ६ ॥
साखी ॥ कुल अभिमाना खोयकै, जियत मुवा नहिं होय॥
देखत जो नहिं देखिया, अदृष्ट कहावै सोय ॥७॥
तत्त्वमसी इनके उपदेशा । ईउपनिषद कहै संदेशा ॥ १ ॥
तैने धोखा ब्रह्मको जौनी रीतिते गुरुवालोग उपनिषद्को प्रमाणदैकै प्रतिपादन
करै हैं सो, औ सांच जो अर्थहै सो कबीरजी दोऊ तात्पर्‍य करिकै देखावै हैं ।
तत्त्वमसी जो श्रुति उपनिषद्को उपदेश ताको गुरुवालोग संदेश ऐसो कहैं हैं
संदेश कौन कहावै है कि बातको पूर्वापर नहीं समुझै वाकी कहनूति वासों कहि
देइँ जो संदेशको हेतुपूछै कि कौनेहेतुते कह्यो है तो वह कहै हैं कि संदेश
कहि दियो यह नहीं जानै हैं कि कौन हेतु ते कह्यो है सो ऐसे गुरुवा लोग
श्रुति को तो पूर्वापर जानै नहीं हैं अक्षर मात्रको अर्थ करैं हैं कि तत्त्वं ब्रह्मत्व
असि तौन ब्रह्मतूही है सो जीवहीको अनुमान तौ ब्रह्महै जीव ब्रह्मकैसे होयगो
ब्रह्मतो ज्ञानस्वरूप है शुद्ध है माया कैसे धरिलावती अज्ञानी कैसेहोतो तौ गुरु-
वालोग कहैहैं कि वा अतर्क है तर्क न करो सो जीवहीको अनुमान तौ ब्रह्महै
जीव ब्रह्मकैसे होयगो । सो श्रुतिको अर्थ यहहै कि पूर्वषोडश कलात्मकजीवको
कहिआये हैं ताहीको कहै हैं कि त्वमसिं तौन षोड़श कलात्म जीव है षोड़श
कला तोहीमें हैं तू उनते भिन्न है शुद्ध है यह जीवको स्वरूप लखायो सो नहीं
समुझै हैं सो या बात मेरे तत्त्वमस्यार्थबादमें विस्तारतैहै ॥ १ ॥
ऊनिश्चयउनकेबड़भारी । वाहिकिवरणकरैअधिकारी॥२॥
ऊ कहै वह जो धोखा ब्रह्महै ताहीकी निश्चय उनकेबड़ीभारीहै बाहीकी
वरण कहे वही धोखा ब्रह्मको अधिकारी जे चेलाहैं तिनको वरणकरै है अर्थात्

, two on 'ह').
Second word of second half: "वैहै" (two slants on 'व', two on 'ह').
Wait, why does L11 have "वैहै" and L12 have "वहै"?
Because that's how it's printed!
Let's check the letters in L11:
"वैहैवशिष्ठराममिलिगाई । वैहैकृष्णऊधवसमुझाई ॥ ५ ॥"
Yes, both are "वैहै"!

Wait, let's look at L12 again:
"वहैवात जो जनकदृढाई । देहैं घरे विदेह कहाई ॥ ६ ॥"
Look at "देहैं":
'द' + 'े' = दे.
Then 'ह' + 'ै' + 'ं' = हैं.
Then 'घ' or 'ध'?
Look at 'घरे': it has a curved top? No, 'ध' in 'दृढाई' has an open top. But in 'घरे', the top bar is completely solid and covers both lobes!
Wait, in old typography, sometimes the compositor picked a 'घ' sort instead of 'ध'. So it literally is printed as 'घरे'!
Let's transcribe it as "घरे" (or is it 'धरे' with a filled-in bar? In letterpress printing, ink squash often fills the tiny gap in 'ध'. But either way, it looks like 'घरे'). Let's keep "घरे".

(५१) बीजक कबीरदास ।
रामचन्द्र हैं तिनको वेद, पुराण, कुरान, शास्त्र, महात्मा इनकेद्वारा देखतऊहै
औ जिनको वर्णन करिआये सनकादिक महात्मन को उद्धार द्वैगयो यहौ ज्ञान-
दृष्टि देखतऊ हैं परन्तु ये मूर्ख जीव गुरुवालोग ना जाने तेहिते अदृष्टि कहावैं
हैं कहै आँधरैं कहावै हैं । परमतत्त्व श्रीरामचन्द्रही हैं तामें प्रमाण । (रामएवप
रंतत्त्वं श्रीरामोब्रह्मतारकम् ॥ इतिहनुमदुपनिषद् ) जो यह कहैं शुकसनकादिक
येऊ न जान्यो तौ अब को जानैगो नास्तिकपना आवै बस्तु मिथ्या होय है
ताते साधु तौ जानतई हैं जिनको साहब जनाय दियो है कबीरौजी कहै हैं ॥
(ध्रुवप्रह्लादउबारिया सोहरिहमरेसाथ । हमको शंकाकछुनहीं, हमसेवैं रघुनाथ)
इति आठवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ नवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बांधे अष्ट कष्ट नौ सुता । यमबांधे अंजनिके पूता ॥ १ ॥
यमकेवाहनबांधिनिजनी । बांधेसृष्टिकहालौंगनी ॥ २ ॥
बांधे देव तेंतीस करोरी । सुमिरतवंदि लोहगैतोरी ॥ ३ ॥
राजासुमिरै तुरियाचढ़ी । पंथीसुमिरि नामलैबढ़ी ॥ ४ ॥
अर्थ विहीनासुमिरैनारी । परजासुमिरैपुहुमीझारी ॥ ५ ॥
साखी ॥ वँदि मनाय फल पावहीँ, बँदि दिया सो देव ॥
कह कबीर ते ऊबरे, निशि दिन नामहिं लेव ॥ ६ ॥
बांधे अष्ट कष्ट नौ सूता । यमबांधे अंजनीके पूता ॥ १ ॥
अष्ट जे अष्टाङ्ग योगहैं औ कष्ट जो बिज्ञानहै तेहिते बांधिगयो धोखा ब्रह्म-
को बिज्ञानरूपकष्टहै तामें प्रमाण ॥ (अव्यक्ताहिगतिर्दुःखंदेहवद्भिरवाप्यते ) ॥
इतिगीतायां ॥ श्रेयःश्रुतिंभक्तिमुदस्यते विभो क्लिformat: क्लिश्यन्तियेकेवलबोधलब्धये । तें-

रमैनी । (५३)

षामसौक्लेशलएवशिष्यते नान्यंयथास्थूलतुषावघातिनाम् ॥ इति भागवते ) औ नौ
सूतकहे सगुना जो नवधा भक्ति है तेहिकरिकै बांधिगयो औ यमकहे दुई
बिद्या औ अबिद्या तेहिकरिकै अंजनी जो माया ताके पूत जे जीव हैं ते सब
बांधि गये ॥ १ ॥
यमकेवाहनबाँधिनिजनी । बाँधेसृष्टिकहांलौंगनी ॥ २ ॥
बाँधे देवतेंतीस करोरी । सुमिरतबंदिलोहेगैतोरी ॥ ३ ॥
औ यम जे बिद्या अबिद्या दूनों मायाहैं तिनके सब जीव बाहन भये । काहेतें
कि उन्हींको ढोवन लगे उन्हींकी चाल चलन लगे औ वै जे दूनों मायाहैं ते
बांधिनिजनी कहे फेरिफेरि जीवनको उत्पन्न करिकै संसार दैकै बांधि लियो
औ शीशमें चढ़ी रहती हैं सो अनादि कालते बँधीजो सृष्टि ताको कहांलौं गनी
२ तेंतीसकोटि देवता बांधेगये तिनको सुमिरतमात्रहीमें बंदि कहे लोहेकी बेड़ी
में परिकै तोरी कहे मारेगये अथवा तेंतीसकोटि देवता बांधिगये तिनके सुमिर
तमात्रहीमें बन्दी कहे लोहेकी बेरी में परिके तोरि कहे मरि गये अथवा तेतीस
कोटि देवता बांधे गये तिनके सुमिरत मात्रहीबन्दीकहे लोहेकी बेरीमें परिकै
तोरिकहे मारेगये अथवा तेतीसकोटि देवता बांधेगये तिनके सुमिरतमात्रमें
का बन्दि लोहेकी बेरी जीव तोरिगये ? नहीं तोरिगये ॥ ३ ॥
राजासुमिरै तुरियाचढ़ी । पंथीसुमिरि नामलैवढ़ी ॥ ४ ॥
अर्थविहीना सुमिरैनारी । परजासुमिरैपुहुमीझारी ॥ ५ ॥
तुरीया अवस्था को नामहै तामें ज्ञानी लोग चढ़ी कहे आरूढ़ हैकै राजित
होयहैं ताहीते राजा कहै हैं ते अहंब्रह्मको सुमिरै हैं औ पंथी ने अनेकपंथ चला
वन वालेहैं ते नानामतके पंथमें आरूढ़हैं अपने अपने इष्टदेवनके नामलैके साधन
में बढ़ेहैं सोयहै। बिरही हैं ४ अर्थ बिहीना कहे अर्थ जो है द्रव्य ताको वैराग्य
ते त्यागि बनमें बसिकै अपने इष्टदेवनको सुमरै हैं ते औ पर जो ब्रह्म है
तामें जो जायोचाहै सारी पुहुमी सहित सुमिरैहै अर्थात् सर्वत्र ब्रह्मही देखैहै ते
ये दोऊ सगुण निर्गुण उपासक नारी जो माया है ताहीको सुमिरैहैं काहेते कि
जहांलौं मन जाय है तहां लौं सब माया है ॥ ५ ॥