सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 95

( ४४ ) बीजक कबीरदास ।
नलगे कि अगमै है अपारहै काहेतें कि नानामतहैं तिनमेंवेदकुरानको प्रमाण सब
मैं है सो एक सिद्धांतमें निश्चय काहूकी न होत भई अथवा अगम अपार जो
धोखा ब्रह्महै सोई सबके सिद्धांतमें फैलगयो कहै ब्रह्मही रहिगयो अर्थात्
अपने अपने मतनमें सिद्धांत वही ब्रह्महीको करत भये । सो वह धोखा तों
अगम अपारहै काहूको मिलबइ नहीं कियो ॥ ५ ॥
चहुंयुगभक्तनबाँधलबाटी। समुझिनपरैमोटरीफाटी॥ ६ ॥
भै भै पृथ्वीचहुंदिशिधावै। सुस्थिरहोयनऔषधपावै ॥ ७ ॥
चारिहुयुगके नाना देवतनके जे भक्तहैं ते अपनी अपनी राह संसार छुटवेकी
बांधत भये तबहूं वह सिद्धांत न समुझि पर्यो काहेते कि बहुत राह ह्वैगई
रामनामके संसार मुख अर्थमेंहै तो सब मतबनेही हैं परंतु साहबमुख जो
अर्थ है रामनामको ताको भूलही गये । भरमकी जो है मोटरी सो फटी कहे
पण्डित भये पढ़े भरम नाशकी उपायकरनलगे अर्थात् शास्त्रनके अर्थ विचार-
नलगे यही फटिबो है सो वह राह तो पाई नहीं बहुत राह ह्वैगई तब नाना
प्रकारकी शंकाउठी भरम फैलिरह्यो नाना शास्त्रनके सिद्धांतमें वेदको प्रमाण
सबहीमें मिलैहैं काको सांच कहैं काको असांच कहैं ताते शास्त्रनमें एको सि-
द्धांत न करिसकें ६ तब जीवजेहैं ते भै भै पृथ्वीमेंचारों ओर भ्रमन लगे खो-
जनलगे एकहु मतको सिद्धांत नहीं पावैंहैं सो यहरोगकी औषध, जो साहब-
को जानै है ताही, बिरले संतके पासमें है सो तौ पावत न भये औरै और में लगे
ताते स्थिर न होत भये ॥ ६ ॥ ७ ॥
होयभिस्तजोचितनडोलावै। खसमैछोड़िदोजखकोधावै ८॥
पूरुवदिशाहंसगतिहोई । है समीप संधि बूझैकोई ॥ ९ ॥
जो चित्त न डोलावै स्वधर्ममें चलै तौ भिस्त जो स्वर्ग सो होय है अथवा जौ
ने जौने देवतनकी उपासना करैहै तिनके लोकजायहै अथवा यज्ञपुरुषकी आरा-
धना करिकै स्वर्गजायहै औ खसम कहे मालिक ऐसे जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको