कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ४५ )
भुलाइकै सब जीव दौरै हैं मुक्तकहांतै होयँ । दोजख जो नरकहै ताहीमें
परैहैं । इहांस्वर्गहूको नरकही मानिकै कहैहैं काहेते कि खसमके भूले जो स्वर्गहू
जायगो तौ दुःखही पावैगो आखिर गिरिही परैगो ॥ ८ ॥ पूर्व दिशा कहे
सबके पूर्व जब शुद्धजीव रह्योहै कहे जब शुद्धह्वैकै अपनेस्वस्वरूपको चीन्है
तब साहब हंसस्वरूप देय है । सो वा साहबको बिचार कर्मके बाहिरैहै सो
याकी जो संधिहै कहे बिचारहै सो समीपही है । जो अपने स्वरूपको चीन्है तौ
साहब हंसरूप देवै करै परन्तु बूझत कोई कोई है ॥ ९ ॥
भक्तौभक्तिनकीनशृँगारा । बूड़िगयेसबमांझहिधारा ॥१०॥
ज्ञान मिश्रावाले जेभक्तहैं ते भक्तिनि जो माया तेहिते शृंगार करतभये कहे
बिचार करतभये कि हमहीं ब्रह्महैं । वह मनकी धारामें बूड़िगये । कहां बूड़े ?
कि यहसब मिथ्याहै यहकहतकहत एक अनुभव सिद्धांतराख्यो सो अनुभवजीव
को है ताते मनते भिन्न नहीं है वही मनकी मांझ धारामें बूड़िगये ॥ अथवा
साहबको छोड़िकै जे नाना देवतनके भजन करैहैं ते भक्त भक्तिनि कहावै हैं
ते साहबको तो न जान्यो शृंगार करतभये कहे नानावेष बनावतभये कोई छिद्र-
नांकौकी ओर चंदनदियो कोई मृत्तिका दियो कोई राख लगायो इत्यादिक
नानावेष बनावत भये ते सब संसाररूपी समुद्रकी मांझ धारामें बूड़िगये॥१०॥
साखी ॥ विनगुरुज्ञानै द्वन्द्वभो, खसमकही मिलिबात ॥
युगयुग कहवैया कहै, काहू न मानीजात ॥११॥
खसम जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते मिलीबात कही कहे अपनो रामनाम
बतायो तामें द्वैअर्थ रह्यो एकसाहबमुख एकसंसारमुख सो आदिमङ्गल में लि-
खियाये हैं । सोसबते श्रेष्ठ गुरुसाहब तिनको ज्ञान तो नहीं भयो संसारमुख
अर्थ ग्रहण कियो ताते द्वन्दकहे जन्ममरण दुःख सुख स्त्री पुरुष ज्ञान अज्ञान
इत्यादिक संसारमें होतभयो सो कबीरजी कहैहैं कि युगयुगमें कहनहार जो
मैंहौं कबीर सो कह्यो मेरीकही बात काहूसों नहीं मानी जातहै ॥ ११ ॥
इतिपँचईरमैनीसमाप्तम् ।