कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ४३ )
युगनकी बातमैं कहांलोंकहौं मनबचननके परेजोहै ताकिबाटब्रह्मो भूलिगयेहैं
जो बाट पाठहोयहै तोयह अर्थहै औजोत्राता पाठ होयहै तो यहअर्थ है कि सबके
त्राताकहे रक्षक जो साहब ताको ब्रह्मा भूलगयेहैं १ जौन रामनामको अर्थ जग-
दमुख लैके बाणी औसमष्टि जीव आदि जगत् रच्योहै तौनेयुगतिब्रह्मोविष्णु महे-
शके मन में भावत भई सो दूनो अक्षर रामनाम को लैके रचत भये ॥ २ ॥
बिविअक्षरकाकीनविधाना।अनहदशब्दज्योतिपरमाना ३॥
अक्षरपढ़िगुनिराहचलाई। सनकसनन्दनकेमनभाई ॥ ४ ॥
ओई जे द्वै अक्षरहैं तिनको बिधान करतभये (और जो बंधान पाठहोई तौ
बंधान करतभये ) । कहांबिधानकियो कि ज्योतिरूपी जोहै आदिशक्ति रेफरूप
अग्निबीज परा जाकोमंगल में पांचब्रह्ममें लिख्यो है ताहीते अनहद शब्द उठावत
भये मनमें जो कुछ कहनेकी बासना आई चित्तमें सो मूलाधारकी जोहै ज्योति
तौनेमें मन मिल्यो कहे संकल्पउठयो तबवह ज्योति डोली ताते कछु पवनको सं-
चारभयो ताते नादकी प्रकटता भई तब वह पराबानी उठी सो पश्यंती मध्यमाहै
त्रिकुटीके ऊपर मकारहै विन्दुरूपसहस्र कमलमें तहां टक्करपाय बैखरी ये तीनरूप-
ह्वैकैबाहरको आई। सो जहां अग्निको औपवनको संयोग होयहै तहां जोशब्द-
होयहै सो अनहद कहावैहै। सो वह बाणी जो बाहर आई सोसम्पूर्ण अक्षर
भै। तौने पढ़ि गुनिकै सनक सनंदन जे जीव हैं तिनके मनमें भावत भई
अथवा सनकसनंदनादिक जे ब्रह्माकेपुत्र तिनके मनमें भावत भई सो वहै राह
चलावत भये ॥ ३ ॥ ४ ॥
वेदकितावकीन्हविस्तारा। फैलगैलमनअगमअपारा ॥५॥
तेई अक्षरनको लैके वेद किताब कुरान पुरान जेहैं तिनको बिस्तार करतभये ।
सो सबके मनमें फैलगैल कहे फैलजात भई अर्थात् जाकेमनमें जौन गैलनीकी
लगी सोचतभये । सोवहगैल तोभूलहीगये बहुतगैल ह्वैगई । अपने अपने मत
नकी अपनी अपनी गैलकहैंहैं कि यही सिद्धांतहै । तिहिते नानासिद्धांत ह्वै
गये जोसिद्धांतहै ताको तो पावै नहीं। वेदादिकनको कुरानादिकनको कह-