कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
बघेलवंशवर्णन । ( ६९७ )
दोहा-कछु दिनमें आवत भयो, जयपुरको नरनाह ॥
शाहन करन पनाहभे, भूपति जेहिं कुलमाह ॥ ५८ ॥
भगिनि उभय रह जानकी, कृष्ण कुवँरि जिन नाम ॥
व्याहि विदा कीन्ह्यो तिन्हैं, दै बहु धन अभिराम ॥५९॥
पुनि बीते कछु काल श्री, विश्वनाथ नरपाल ॥
है वश काल निवास किय, पास अवधपति लाल ॥६०॥
श्रीरघुराज तनय तेहि केरो । हरिइच्छा गुणि बिन अवसेरो ॥
मानि राज्य सब यदुपति केरी । कामदार सों कह्यो निवेरी ॥
राजाराम राज्यके एकू । तिनकी कृपा न भय मोहिं नेकू ॥
स्वामि धर्मरत जन हितकारी । करिहैं कबहुँ न काम बिगारी ॥
सुदिन अबै न राज अभिषेकु । कह्यो ज्योतिषी सहित विवेकू ॥
ताते मो मन भावत येहू । करो यज्ञ संमत करिदेहू ॥
सुनि दिवान कह बहुत सराही । प्रभु भल कह्यो ऐसहीं चाही ॥
तब रघुराज परम सुख पाई । आशु बनारस मनुज पठाई ।
दोहा--विप्र वेद वित छिम्र बहु, रीवां नगर बोलाय ॥
सुदिन शोधाय सचाय गो, लछिमनबाग सिधाय ६१॥
तहँ किय कठिन कायको नेमा । पगो परम यदुपति पद प्रेमा ॥
मज्जन करि गायत्री जापा । प्रथम करै नितहरै जो पापा ॥
पुनि षोडश प्रकार भरि चायन । पूजन करै रमा नारायन ॥
पुनि नारायण अष्टाक्षर मनु । बीसहज़ार जपैं निश्चल मनु ॥
यही भांति विप्रनहुँ जपावै । रहै यकांत अनत नहिं जावै ॥
पुरश्चरण सौ दिन करि यहि विधि । कृष्ण कृपा पात्रता लही सिधि ॥
कह्यो स्वप्नमें आय मुरारी । राज्य करै है मम अधिकारी ॥
लहत मनहिं मन परमहुलासा । कोहुसों कबहुँ न कियो प्रकाशा ॥
दोहा--जप अष्टाक्षर मंत्रको, बीस हजाराहिं केर ॥
जौलौं रहै शरीर जग, किय संकल्प करेर ॥ ६२ ॥
( ६९८ ) बघेलवंशवर्णन ।
रमा द्वारकाधीशकी, त्यों बलकी करि सूर्त्ति ॥
हेम रजत रचवायकै, परम मनोहर मूर्ति ॥ ६३ ॥
वेद् विहित करवायकै, आसु प्रतिष्ठा वेश ॥
बांधवेश विश्वनाथ सुत, पूजन करत हमेश ॥ ६४ ॥
करन लगै जप जेहिंसमय,तब भरि मोद अनंत ॥
भजन सुनैं भजनीनसौं, निर्मित निज बहु संत ॥ ६५ ॥
सुदिन राज्य अभिषेक को, आयो जब मुदवान ॥
सब तद्वीर महान भै, वेद् विधान प्रमान ॥ ६६ ॥
श्रीरघुराज जाय मखशाला । वसु मंत्रिनते सहित उताला ॥
रघुपति यदुपति मूरति काहीं । थिति कै हेमसिंहासन माहीं ॥
महाराज अभिषेक कराई । अभिषेकित भो आपु सोहाई ॥
श्रीकृष्णहिके कृपापात्र कर । अधिकारी भो विदित अवनिपर ॥
कर परताप छयो परतापा । सज्जन सुखप्रद सुयश अमापा ॥
पितु सम पालत प्रजन सप्रीती । नीति रीति करि. मेटि अनीती ॥
सुनि सुनि शाहहु जाहि सराह्यो । आय अजंट लाट भल चाह्यो ॥
राज्य करत बीत्यो कछु काला । दर्शन हित जगदीश कृपाला ॥
दोहा-करि लालसा विशाल लै, संग चमू चतुरंग ॥
रानिन युत जगपति पुरी, गमन्यो सहित उमंग ॥ ६७ ॥
बीच बीच वीथिन करि वासा । श्रीरघुराज राज सहुलासा ॥
शतक संस्कृत यक जगदीशा । विरच्यो मैं निज आँखिन दीसा ॥
भाषा शतक कवितमें दूजो । विरचन लग्यो सो उमग पूजो ॥
पर्यो अमर कंटक मग माहीं । गमनत भयो नाथ तहँकाहीं ॥
मेकल गिरिते कढ़ि तहँ प्रगटी । शिव प्रिय रेवा सरि अघ निघटी ॥
तहँ मज्जन करि दै बहु दाना । रेवा अष्टक रच्यो सुजाना ॥
शिवअष्टक पुनि रच्यो तहांहीं । सिंहवलोकन छंदहिं माहीं ॥
रहें जे संत विप्र तहँ वासी । तिनको देत भयो धन राशी ॥
बघेलवंशावर्णन । ( ६९९ )
दोहा-सहित सैन्य चतुरंगिणी, तहँते करि सु पयान ॥
सेवरी नारायण निकट, जातभयो मतिमान ॥ ६८ ॥
सेवरीनारायण करि दर्शन । किय सहस्र मुद्रा कहँ अर्पन ॥
तहँते प्रभु पयान करि आसू । पहुँच्यो साक्षिगोपालहि पासू ॥
मुद्रा सहस गयंद सुहायो । दर्शन लैकै तिन्हें चढ़ायो ॥
दै सबको तिमि द्रव्य महाना । सादर चढ़वायो भगवाना ॥
पंडा गाड़िन लादि प्रसादा । लाय दिये लै युत अहलादा ॥
महाराज सबको विरताई । खायो स्वाद अपूर्व सुनाई ॥
श्रीरघुराज परमसुख भीनो । तहँते पुनि पयान द्रुत कीनो ॥
जगन्नाथ मंदिरके ऊपर । नीलचक्रपरश्यो जब अघहर ॥
सोरठा-करि दंडवत प्रमाण, कीन्ह्यो पुरी प्रवेश प्रभु ॥
डेरा किय गुरुधाम, रानिन सहित हुलास भरि ॥
दोहा-तहँते गमनतभो तुरत, दर्शन हित जगदीश ॥
अरुण खम्भ ढिग द्वारमें, जात भयो अवनीश ॥ ६९ ॥
रकबा चार्यो दिशि बन्यो,मंदिर मध्य उतंग ॥
लसत दुर्ग सो उदधि तट, तकत करत अघ भंग ॥ १७० ॥
प्रथम अकेले आपहीं, युत भाइन सरदार ॥
सादर भीतर द्वारके, जाय नरेश उदार ॥ ७१ ॥
घनाक्षरी ।
जगपति मंदिरके चारों ओर देवनके मंदिर सुखद तिन दरशकै सुखकारि ॥
सहित समाज प्रदक्षिणकै चारि फेरि मंदिर सिधारि शिरनाय खम्भ पन्नगारि॥
जाय कछु निकट सुभद्रा बलभद्र युत सछवि मुरारि वार वार नैन सों निहारि॥
वारि मन प्रथम सँभारि तनु सुंधि फेरि पलक नेवारि हेरि रहे धन वारि वारि ॥
स० आजुभयो सफलो मम जन्म गुन्यो यह जन्ममें पुण्य बढ़ायों
जानि लियो कियो पूरव जन्महुँ पुण्य महान विशोषि सुहायो ॥
( ७०० ) बघेलवंशवर्णन ।
सत्य कहैं रघुराज हौं आज अनेकन जन्मके पाप नशायो ॥
जो बलभद्र सुभद्रा सुदर्शन औ जगनाथको दर्शन पायो ॥
लोचन सामुहे होत जबै तब देखनकी नहिं चाह सिराती ॥
आनँद बाढ़ै जितो उरमें मिति तासु न मोसों कछू कहि जाती ॥
को रघुराज बखानि सकै जगदीशकी शोभा त्रिलोक विजाती॥
ज्यों ज्यों समीप ह्वै हेरै त्यों त्यों क्षणहीं क्षणमें सरसै दरशाती ३
घनाक्षरी ।
कञ्चनको छत्र उभय चौर विजनादिनोल भूषण वसन त्यौ अमोल मोतिमालको॥
मोहर अमित मुद्रा दै गयन्द त्यों तुरङ्ग प्रभुहिं समर्पि पायो परम निहालको ॥
भप रघुराज त्योंहि दै कै सबहीको वसु नजर देवायो तहां देवकीको लालको ॥
पंडा आ पुरीके भये परमसुखारी पाय पाय धन भारी गाये सुयश विशालको ॥
सोरठा-कहत मनहिं मन नाथ, सो मैं करौं प्रकाश अब ॥
को समान जगनाथ, है कृपालु यहि जगतमें ॥ १ ॥
विविर जाय सुख पाय, पायो महाप्रसादपुनि ॥
तहँके तीर्थ निकाय, जाय जाय सादर कियो ॥ २ ॥
रानिहु सब सुखपाय, त्योंहीं नजर निकाइकै ॥
जगपति दरश सोहाय, करि मान्यो सफलै जनम॥३॥
दोहा-बेखटका अटका अमित, चटकै दियो चढ़ाय ॥
मटका मटका लै गये, कोऊ सटका खाय ॥ ७२ ॥
महाराज रघुराज उदारा । अरुणखम्भ ढिग पुनि पगु धारा ॥
देश देशके जन बहु आई । जुरे पुरीके जन समुदाई ॥
पेखि अनूप भूपकी शोभा । सबहीको बरबस मन लोभा ॥
तहँ नृप नायक परम सुजाना । हेम तुला चढ़ि वेद विधाना ॥
सुवरण वृष्टि करी मन भाई । मानौ मघा मेघ झरिलाई ॥
रह्यो न पुरी कोउ द्विज बाकी । जो न सुवर्ण लहै सुख छाकी ॥
रानिहुँ त्यों सिगरी तहँ आई । रजत तुला चढ़ि चढ़ि सुख छाई ॥
बघेलवंशवर्णन । (७०१)
*दोहा--भये अयाचक पुरी के, रहे जे याचक वृंद ॥
पाय पाय सुवरण रजत, गाय सुयश मुदकंद ॥ ७३ ॥
घनाक्षरी ।
शतक बनायो जाय आपहि सुनायो सुनि जगदीश बलहु सुभद्रा मोद भीने हैं ॥
शिरते सुमनमाल तुरत खसाय रीझि अभिराम सादर इनाम करिदीन्हें हैं ॥
कहै युगलेश वेश दौरि बांधवेश तब सम्भृत कलेशहारी धन्य मानि लीन्हें हैं ॥
महाराज रघुराज भक्तिको प्रभावपुरी प्रगट देखानो जानो भक्तराज बीन्हें हैं ॥
दोहा-लखि प्रभाव तेहि ठाँव यह, कहैं लोग भरिचाय ॥
भक्ति भाव रघुरावसति, कस न द्रवैं यदुराय ॥७४॥
श्रीरघुराज मोद भो जेतो । यक मुख सों कहिसकत न तेतो ॥
माने सब जन अरु सरदारा । पूर्व पुण्य कछु कियो अपारा ॥
जाते वश अस नृप ढिग माहीं । हरि प्रभाव निरखे चख माहीं ॥
परदेशी अरु पुरी निवासी । अरु जे रहे भूप सँग वासी ॥
चढ्यो रोज नृप अटकाजोई । ताते सबको भोजन होई ॥
एक गाँव जगदीश चढ़ायो । पन्डा पाय परमसुख पायो ॥
पुरी सवाउ मास किय वासा । सबकों सब विधि देत हुलासा ॥
युत समाज हरिमन्दिर जाई । लिय त्रिकाल दर्शन नृपराई ॥
दोहा-अर्द्धरात्रि नित जाय नृप, त्योंहीं दर्शन लेय ॥
पाय सुमहाप्रसादको, सबको सादर देय ॥ ७५ ॥
फागुनकी पूर्णिमाको, फूलडोल गोपाल ॥
झूलत निरखि निहाल ह्वै, को न तज्यो जगजाल॥७६॥
छंद-शुभदिवस तहँते गौन करिकै गया तीरथको गयो॥
करि श्राद्ध वेद विधान सो बहु दान विप्रनको दयो ॥
द्विज पाय धन समुदाय वांछित करत भये बखानहैं ॥
जस गया कीन्ह्यो बांधवेश न नरेश कीन्ह्यो आनहैं ॥
तहँ सुन्यो नौकरहूंनके गे बिगरि कारन पायके ॥
(७०२) बघेलवंशवर्णन ।
अगरेजकें सब देश लूटे हनेगो रण धायकै ॥
ढिग वेगि बहु वागीन काहँ नरेश आशु मँगायकै ॥
यकमें चढ़ायो द्वारकेसहि वंश प्रीति बढ़ायकै ॥
पुनि नाथ सहित समाज है असवार बहुबागीनमें ॥
चलिदियो परम निशंक परम प्रवीन परम प्रवीनमें ॥
मिरजापुरै ढिग भूप आयो आय बागी वै तबै ॥
बहु विनय कीनी आप करहिं सहाय तौ सुधरै सबै ॥
तब नाथ ऐसो कह्यो तिनसों हाथ यह यदुनाथहै ॥
सब भांति मोहिं भरोस जाको जो अनाथन नाथहै ॥
सुनि गये ते सब महाराजहुँ आय रींवापुर बसे ॥
यक रच्यो नगर गोविंदगढ़ तहँ जायकै कबहूं लसे ॥
अँगरेजके बागी तिलंगा बागी सिगरे देशको ॥
वश कियो कोहु नरेश को रहे डरत कोहुँ नरेशको ॥
मैहर विजय राघवहुके गे विगरि तिनके दावते ॥
मग रोंकि गोरनको हने बहु जोर जुलुम जमावते ॥
तब आय बहु अँगरेज रींवा नगर कियो निवासहै ॥
महाराज श्रीरघुराज तिनको कियो परम सुपासहै ॥
डर मानि रींवा नगर को नहिं आय बागी कोउ सके॥
मतिवंत अति श्रीवंत गुणि सब संत नृपको सुखछके
अंगरेज लखि वर तेज भाष्यो वांधवेश नरेशसों ॥
लै खर्च हमसों राखि लीजै और सैना वेशसों ॥
मैहर विजय राघवहुके बागी उपद्रव करत हैं ॥
चलि मारि तिन्हैं निकारि दीजै दुरग लीजै हम कहैं ॥
सुनि भूप तैसहि कियो सैनप दीनबंधु दिवानकै ॥
लिय घेरि मैहर प्रथम तोपलगाय आशु पयानकै ॥
भगि गये तहँके यूह योगी वेगि करि तहँ थानहैं ॥
पुनि विजयराघव घेरि लीन्हो संग सैन्य महानहैं ॥
तेउ भये बांवां करत भै करी थान तहँऊ करि लियो ॥
महराज श्रीरघुराज सुख भरि सौंपि अंगरेजहि दियो ॥
यह कृपा गुणि यदुराज की रघुराज परम उदारहै ॥
निज राजधानी आय कछु दिन बस्यो सुखित अपारहै ॥
दोहा-रींवा ते जे कढ़ि गये, बहु सरदार सुखारि ॥
वागी भेरन रारि कर, तिन मिसि नृपहुँ विचारि ॥७७॥
कोपित है जरनैल बहु, लै सँग सैन्य अपार ॥
चढ़ि आयो रींवानगर, गोरा कइक हज़ार ॥७८॥
हुकुम दियो महराजको, करि दुष्टता विचार ॥
देखन हेतु कवायदै, आवै आजु हमार ॥७९॥
सुनत कह्यो रघुराज उदारा । देखन चलिहैं कछु न खँभारा ॥
हमरे सति सहाय यदुराई । का करिहैं अरि सैन्य महाई ॥
तब रीवांके लोग सुजाना । रह्यो जो और देवान पुराना ॥
वर्ज्यो विनती करि बहु भांती । उचित न जाब प्रबल आराती ॥
तँहँ यक दीनबंधु जेहिं नामा । रह्यो दिवान वीर मतिधामा ॥
कहत भयो सो प्रण करि भारी । चलिये आप न कछू विचारी ॥
क्षंत्री ह्वै जो समर सकाने । कुलकलंक तेहिं पांवर जानों ॥
यह रिपु करिहै कहा हमारे । करिहै रोष जायगो मारे ॥
दोहा-दीनबंधु दीवानके, वचन सुनत नरनाथ ॥
जात भयो रणसाज सजि, लिये सैन्य बहु साथ॥८०॥
भूप संग बहु सैन्य करेरी । सो जरनैल नयन निज हेरी ॥
भय अति मानि देखाय कवायत । गमन्यो हारि मानिकै निजचित ॥
महाराज रघुराज सचैनै । कृपा कृष्ण गुणि आयो ऐनै ॥
सुधि करि दीनबंधुकी वानी । है प्रसन्न बहु विधि सनमानी ॥
दीन्ह्यो गाँव अनेक इनामा । गुणि मतिवान दिवान ललामा ॥
( ७०४ ) बघेलवंशवर्णन ।
सुखयुत बीतिगये कछु काला । लाट हूनपति जौन विशाला ॥
लै बहु सैन्य कानपुर आयो । सब राजनकों खत लिखवायो ॥
आवहिं इतै भेटके हेतू । सुनि सुनि सब नृप गये सचेतू ॥
दोहा-महाराज रघुराजको, लिखत भयो खत सोइ ॥
मुलाकात मम करनको, आवै इत मुद मोइ ॥ ८१ ।
तहाँ चलन नृप कियो तयारी । बरजे तबहुँ इतै नर नारी ॥
दीनबंधु तबहूं मतिवाना । कह्यो पैज करि वचन प्रमाना ॥
चलिये भूप संदेह न कीजै । बिना चलेहीं भय गुणि लीजै ॥
सत्य विचारि बचन तिनकेरे । काहूके दिशि तनक न हेरे ॥
लै कछु सैन्य चैन भरि भूरी । चल्यो कानपुर यद्यपि दूरी ॥
मगमें बहु जन किये निवारण । लाटबोलाये है कछु कारण ॥
गुणि हरि उर भरोस नृप भारी । काहू ओर न नेकु निहारी ॥
दीनबंधुके मग ज्वर भयऊ । सो न मानि कछु नृप सँग गयऊ ॥
दोहा-जाय सैन्य युत कानपुर, डेरा सुरसरि तीर ॥
करत भयो सुनि हूनपति, भयो मुदित मतिधीर ॥८२।
दगी मुकामी फेरि सलामी । बँधी पंचदश जौन मुदामी ॥
पैदर अरु असवारन काहीं । दिय नृप अरुण पोशाक तहांहीं ॥
फूलसिंरी अरुणै गज भासी । सूही साज वाजिगण गासी ॥
सरिस वसंत सैन्य सुठि सोही । लखि लखि भूपहु गे मन मोही ॥
लाट लखनऊ ह्वै जब आयो । मुलाकात हित नृपहि बोलायो ॥
मुख्य अमात्य जौन अभिरामा । दीनबंधु है जाको नामा ॥
श्रीरघुराज ताहि लै संगै । गये सैन्य युत भेट उमंगै ॥
यक साहेब लैके अगवाई । साहर भूपहि गयो लेवाई ॥
दोहा--शिविर हूनपतिके निकट, पहुँचे जब रघुराज ॥
पाय लाट साहेब खबरि, आगू लै महाराज ॥ ८३ ॥
करि सलाम दोउ परस्पर, पूँछतभे कुशलात ॥
कहे कुशल सब भांति दोउ, बार बार हरषात ॥८४॥
वाम हाथ गहि दहिने हाथै । गयो लेवाय लाट सुख साथै ॥
तख्त़ ऊपर दै कंचन कुरसी । धरवायो जु हूँनपति हुलसी ॥
तामें अपने दहिने ओरै । नृप बैठाय बैठ सुख बोरै ॥
नीचे तख्त़ सैकरन कुरसी । धरवावतभो साहेब विलसीं ॥
तिनमें काशी चरकहरीके । रहे जे और भूप अवनीके ॥
औरहु ज़मींदार सरदारन । बोलि पठायो आये तेहिं छन ॥
तिनको तुरत तहां बोलवाई । दै ताजीम सबै सुखदाई ॥
क्रम क्रमते दीन्ह्यो बैठाई । बैठे ते सब शीश नवाई ॥
दोहा--मंत्री मुख सरदार जेहिं, दियो अजंट लिखाय ॥
नृपं सँग चलि तेहिं क्रमहिते, कुरसी बैठे जाय॥८५॥
निकट हूँनपतिके जबै, भई सभा यहि भांति ॥
अति प्रसन्न रघुराज पै, भयो ला
( ७०६ ) बघेलवंशवर्णन ।
पुनि रघुराज भूप मतिवाना । मुदित लाटसों वचन बखाना ॥
हम अस जहँ तहँ सुन्यो हवाला । लेन हेतु सबको करवाला ॥
आवत लाटसो हम पहिलेहीं । सौंहीं देहिं आप लैलेहीं ॥
सुनि सौंहीं लै लाट उवाही । देखि भली विधि कह्यो सराही ॥
यह सौंहीं केहिं देशहि केरी । कह नृप अहै फिरंग केरी ॥
सुनत हूँनपति मन मुसक्याई । सौंहीं दै वाणी यह गाई ॥
तुव हथियारहि केवळ तेरे । सदा रहें हम बिन अवसेरे ॥
पुनि भूपति रघुराज उदारा । करि सलाम डेरै पगु धारा ॥
दोहा-सब भूपहुं पुनि नाय शिर, गमने शिबिर मझार ॥
इतै हूँनपति सैन्य युत, है करि सपदि तयार ॥ ८९ ॥
महाराज रघुराजके, आये शिबिर सिधारि ॥
होत भयो जेहिं विधि सदा, तेहिते अधिक विचारि ॥९०
करत भये सत्कार नृप, भो खुशलाट अपार ॥
वरण्यो इत संक्षेपते, भीति ग्रंथ विस्तार ॥९१॥
महाराज रघुराज पुनि, कूच तहाँ ते कीन ॥
सैन्य सहित रीवां नगर, आय सबै सुख दीन ॥ ९२ ॥
बाढ़ अठारहको दियो, लाट विशेष निदेश ॥
दगै सलामि हमेशा सो, आवत जात नरेश ॥ ९३ ॥
कछु दिनमें अरजंट पुनि, चलि सोहागपुर काहिं ॥
भू हि अमल कराय दिय, सुयश छाय जगमाहिं ॥ ९४ ॥
सवैया-एक समय पगमें व्रणभो न अधीर भयो भई पीर महाई॥
जाप करें मनु बीस हजार करैं तिमि राजको काज सदाई ॥
हांरि गये सब देश विदेशके वैद्य हकीम मिटी न मिटाई ॥
दूरि व्यथा भै जबै रघुराज दियो शतकै रचि शम्भु सुनाई ॥
दोहा-औषध किय प्रह्लाद द्विज, तासु अयोध्या सून ॥
पायो मुद्रा शतसहस, गाँव उभय नहिं ऊन ॥९५॥
[Header] बघेलवंशवर्णन । ( ७०७ )
ज्वर विकारते यक समय, नृप किय विपुल उपास ॥
तज्यो न तबहूँ जप करब, पूजन रमानिवास॥९६॥
बालहिते कविता मन लायो । चित्रकूट अष्टकहि बनायो ॥
ग्रंथ रच्यो रघुनंद बिलासा । हनुमत शतक कियो बहुलासा ॥
लीन्ह्यो मंत्र केर उपदेशू । तब जे ग्रंथ रच्यौहै वेशू ॥
तिनको अब मैं देत सुनाई । विनयमाल दिय प्रथम बनाई ॥
रुक्मिणि परि पय विरच्यो ग्रंथा । जामें विदित काव्यकी पंथा ॥
व्यासदेव जो रच्यो पुराना । श्रीभागवत प्रसिद्ध जहाना ॥
भाषा विरच्यो भूप उदारा । अहै बयालिस जौन हज़ारा ॥
पुनि जगदीश शतक किय भाषा । जामें कवित बिचित्र सुराषा ॥
दोहा-रच्यो संस्कृत ग्रंथ विय, एक शतक जगदीश ॥
कियो सुधर्म विलास यक, श्रीरघुराज महीश ॥९७॥
तिलक बनायो तासु बुध, रंगाचारी वेश ॥
भजन कवित औरहु अमित, सादर रच्यो नरेश ९८॥
सोरठा-कानन जात शिकार, खेलत मारत शेरको ॥
और जे जीव अपार, तिनाहिं बचावत करि दया॥१॥
कवित्तधनाक्षरी ।
फेरत न आनन जौं ऐसे उच्च वारनपै ह्वैकारि सवार जाय नेर बेर बेरहै ॥
ढेर सरदार पै न सकत उठायकोऊ ऐसो लै रफल्ल घालि करै बाघ जेरहै ॥
कहें युगलेश गेर गेर कहूँ टेर टेर हांईं ठहराय जहां हाँकत करेरहै ॥
हेर हेर मारै लगे देर नहीं दौरिमेर भूप रघुराजसिंह शेरन पै शेरहै ॥ १ ॥
सोरठा-चलि पहाड़ महराज,बाग़ि बाग़ि जेहिं बारिमें ॥
हने जिते मृगराज, ते गोकुल बुध पहँ लिखे ॥ १ ॥
दोहा-महाराज रघुराजको, औरहु चारु चरित्र ॥
युगलदास वर्णन करत, जेहि यश छयो विचित्र ॥९९॥
शाह विलायतको दियो, सुक्का यक पठवाय ॥
लाट वजीर हमारसो, तकमा देहै आय ॥२००॥
( ७०८ ) बघेलवंशवर्णन ।
माधौगढ़गे यक समय, तहँते आगू लाय ॥
सुनि हवाल भे अति खुशी, सभा मध्य बँचवाय ॥ १ ॥
खत लिखि पठयो लाट पुनि, जहां आप मन होय ॥
चलि लीजै तकमा तहां, बड़ी बड़ाई जोय ॥ २ ॥
नृप लिखि पठयो काशिको, सोउ लिख्यो है वेश ॥
बांधवेश वर सैन्य युत, गो महेशपुर देश ॥ ३ ॥
मुलाकात दरबार जन, भयो कानपुर माहिं ॥
तस भो काशी लाट दिय, कहौं सो तकमा काहिं ॥ ४ ॥
छंद-भूषण सितारैहिंदको दीन्ह्यो किताबी एकहैं ॥
सुबहादुरी भूषण दियो यक जटित रतन अनेकहैं ॥
अति ह्वै प्रसन्न सुशाहजादी दियो रतनहारहैं ॥
सो दियो नृप रघुराजको वर हूंनपति करि प्यारहैं ॥ ५ ॥
किय कूच फेरि परेटते रघुराज भूप उदारहैं ॥
जन यूह भये प्रसन्न अति लखि सैन्य तासु अपारहैं ॥
चलि असी सुरसरि संगमें तट वास करि सुखछायकैं ॥
मणिकर्णिका अरु गंगमें सउमंग जाय नहायकैं ॥ २ ॥
यक गाउँ औ गो सहस भूषण वसन मोल अमोलहैं ॥
उपरोहितै दिय दान करि सन्मान प्रीति अतोलहैं ॥
पुनि दरश किय विश्वेशको दिय गाउँएक चढ़ाइहैं ॥
अरु सहस मुद्रा वसन भूषण अर्पणै किय चाइहैं ॥ ३ ॥
अन्नपूरणा अरु बिंदुमाधव जाय निकट गोपालहैं ॥
पद पंचशत शत अर्पि मुद्रा लियो दरश विशालहैं ॥
पुनि कालभैरव ढुंढिपाणिहि और सिगरे देवको ॥
शत शत सु मुद्रा अर्पिकै दर्शन लियो करि सेवको ॥
पुनि पंचगंगा आदि जेते घाट रहे महानहैं ॥
करिमज्जनै तिनमें कियो जो दान करो बखानहैं ॥
गज तुरंग गोशत वसन भूषण अन्नकी बहु राशिहैं ॥
लहि विप्र काशि निवासि सब दिय आशिषेसहुलासिहैं ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ७०९ )
दाहा-महाराज रघुराज पुनि, दारु तुला मँगवाय ॥
यक पलरामें देतभे, सुवरण मनन धराय ॥ ५ ॥
ढाल कृपाण पाणि निज लैके । निज भूषण वसनहुँ ढिग धैकै ॥
यक पलरामें सहित उछाहा । बैठ्यो बांधवेश नरनाहा ॥
सुवरण पलरा नीच लख्यो जब । दिय नरेश सुनि देश आशु तब ॥
अपनो गरु रफल्ल मँगाई । निज समीपही लियो धराई ॥
तबहुँ सो पलरा नीच लखाना । तबहुँ नृपति अस वचन वखाना ॥
द्वै थैली ये मोहरन केरी । उलदि देहु न करहु अब देरी ॥
कामदार ते सुनि सहुलासा । उलदि दियो मोहर अनयासा ॥
सुवरण पलरा महि लगि गयऊ । पलरा ऊँच भूपको भयऊ ॥
तुला चढ़े अस लखि नृपकाहीं । किये प्रशंसा लोग तहांहीं ॥
उतरि तुलाते नृप हरषाई । दशहजार मुद्रा मँगवाई ॥
दीनबन्धु दीवानहु भपा । यक पलरा बैठाय अनूपा ॥
यक पलराते रुपयन रूरे । दियो धराय मोद सों पूरे ॥
दोहा-भयो न ऐसो नृपति कोउ, कामदारको जोइ ॥
तुला चढ़ावै रजतमैं, चढ़े हेममें सोइ ॥ ६ ॥
बढ़्यो शोर सुनि जननको, तहाँ भूप शिरमोर ॥
कह्यो करै नहिं शोर कोउ, कहो वचन यह मोर ॥७॥
पाँडे नंदकिशोर कह, सो सुनि भरि मुद थोक ॥
बंद न हल्ला होत यह, छयो तीनिहूँलोक ॥ ८ ॥
राज राज पुनि श्रीरघुराजा । मानि मोद उरमाहिं दराजा ॥
निज नामाहिं सुश्लोक बनाई । सो द्वै सहस आशु छपवाई ॥
प्रथम पंडितनको बिरताई । भोर कमक्षा सपदि सिधाई ॥
काशिराजको तहां मकाना । अति आयत रह विदित जहाना ॥
तहँ मज्जन करि पूजन नीके । बोलि सहस द्वै विप्रन जीके ॥
द्वै द्वै मोहर दिय सबकाहीं । विविध भांति सन्मानि तहांहीं ॥
( ७१० ) बघेलवंशवर्णन ।
ते सब सुयश भूपको गावत । निज निज गृह गवने सुख छावत ॥
फेरि आपने शिबिर सिधारी । महाराज रघुराज सुखारी ॥
रहे जे बाकी औरहु पंडित । सकल शास्त्रमें अतिही मंडित ॥
सादर तिनको निकट बोलाई । करि सन्मान सभा बैठाई ॥
दुइ दुइ मोहर और दुशाले । देतभयो युत प्रीति विशाले ॥
त्यउ सब गावत सुयश भुआला । दै अशीश गृह गये उताला ॥
दोहा-कहत परस्पर बात यह, जात पंथ हरषात ॥
सभान किय अवदात असि, कोउ नृप व्रात विख्यात॥९॥
रहे घाटिया विप्रजे, काशी कइक हजार ॥
सुवरण तनु तिनके किये, सुवरण वितरि अपार॥१०॥
हाट हाट हाटक विपुल, भयो बनारस सस्त ॥
रस्तन रस्तन बागते, पंडित मोहर मस्त ॥ ११ ॥
रहे जे संत महंत तहँ, संन्यासी विख्यात ॥
सादर तिनको दरश लिय, दे धन बहु सहुलास ॥१२॥
देहरी बीस हजारहैं, काशी विप्रन केरि ॥
नृप तिनके सत्कार हित, नीके मनहिं निबेरि ॥१३॥
पांडे नंदकिशोर सिंह, ईश्वरजीत बघेल ॥
तिमि शाहिजादहुँ सिंहसों, कह्यो धर्मको वेल ॥१४॥
हम अब रीवहिं जातहैं, रुपया बीसहजार ॥
लै देहरी सब द्विजन दै, अइयो निजहिं अगार ॥१५॥
अस कहि भूपति भोरही, तहँते तुरत पधारि ॥
निज पुरको आवतभयो, करि दरकूँच सुखारि ॥ १६ ॥
उत तीनों जन काशि वसि, विप्रन सहित विवेक ॥
दीन्ह्यो गनि देहरीनको, फरक पर्यो नहिं नेक ॥ १७ ॥
कवित्त ।
राना राठिउरहाडा बडे कछवाह राजा आय आय कीन्ही सभा दैकै धन राशी है।
दक्षिणके सूबा जे करोरिनके राज्यवारे आय तेउ सभाकै सुकीरति प्रकाशी है ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ७११ )
सुवरण वृष्टि पै न कीनी कोऊ आजु तक जैसे करे वारि वृष्टि भादौं मेघ खासी है॥
भूप विश्वनाथको अनूप तनय रघुराज जैसी जातरूप वृष्टि कीनी पुरी काशी है १
घर घर वाट वाट गंगाजूके घाट घाट हाट हाट भाटहीं सों भाषैं जन राशी है॥
पंडित अखंडित की कीनीसभा मंडित ना ऐसी कोऊ भूपति उदंडित विकाशी है॥
कहैं युगलेश रहि गयो ना कलेशलेश याचक अशेषको विदेश देश वासी है ॥
हम तुला भासी महाराज रघुराज यशी खासी कीर्ति अतुला प्रकाशी पुरी काशी है२
भूपर घनेरे एक एकते बडेरे भूप भये हैं अनूप पै न ऐसी कोऊ कीनी है ॥
जैसी करी महाराज विश्वनाथ तनय यह महाराज रघुराज मोद उर भीनी है ॥
काशीपुरी असी गंग संगम निकट तट चढ़िकै हिरण्य तुला पुण्यकै अक्षीनी है॥
कहे युगलेश देश देशके नरेशनकी जाईवो महेशपुरी राह रोकि दीनीहै ॥ ३ ॥
केते भूमिपाल भये भारी राज्यवारे भूमि केतको दिवान बड़े दानी सत्यसिन्धुहैं ॥
आय आय काशीपुरी लाय लाय द्रव्य भूरी दै कै विप्र वृन्दनको पोष्यो पंगु अंधुहै॥
पैन ऐसो भयो जोन हेम रौप्य तुला चढ़ि दान अतुलाकै छावै सुयश सुगन्धुहै ॥
राजा रघुराज राजै की तो या जमाने मध्य की देवान ताको श्रीदिवान दीनबंधुहै४॥
कुंडलिया-सुवरण वृष्टि करी उतै, काशी नृप रघुराज ॥
तेहि प्रभाव तिहिं देशघन बरसे वारिदराज ॥
बरसे वारिदराज सकलमें भयो सुभिक्षै ॥
रह्यो न लेश कलेशवेश मिटिगो दुर्भिक्ष ॥
भिक्षै माँगत रहे रंक जे घर घर कुवरन ॥
तेऊ पाय अनाज भूरि द्वैगे तनु सुवरन ॥ १ ॥
दोहा-महाराज रघुराजको, दृढ़ विश्वास य :
तेहि प्रभाव सुखसाज सज,सुकर दराजहु काज ॥१८४॥
कवित्त ।
जोधपुर महाराज राज्यहै दराज जाहि राज काज ऐशही में बीत दिनरैन है ॥
साहिबी सुरेशसी धनेश ऐसी मौज समै तेजमें दिनेश वेश विलसति शैनहै॥
मैनकीसी मूरति मनोहर तखतसिंह बखत बुलन्द निरखत करै चनहै ॥
जाके उर ऐने युगलेशकहूं लेस भैन देखे बनै नैन वैन कहत बनैनहै ॥ १ ॥
( ७१२ ) बघेलवंशवर्णन ।
दोहा-राना नृप कछवाह अरु, हाडा भूप विहाय ॥
जेती लसत पछाहमें, भूपन की ममुदाय ॥ १९ ॥
तिनके भेजि कटारजो, करत आपनो व्याह ॥
ऐसो प्रथित पछाहँमें, जोधपुरी नरनाह ॥ २२० ॥
पुरुषनते संबंध गुणि, तख्तसिंह नरनाह ॥
रींवा करन विवाह को, कीन्ह्यो परम उछाह ॥ २२१ ॥
रानिन सुतन समेत भुवाला । निजपुरते किय गमन उताळा ॥
जेठो कुँवँर तासु रह जोई । चतुरङ्गिणी फौजले सोई ॥
आवत भयो आगरे जबहीं । मिल्यो नृपति जयपुरको तबहीं ॥
ताकी तासु मित्रता भारी । तासों ऐसी गिरा उच्चारी ॥
जेहिं कन्याको तिलक चढ़ौ तुव । सो ह्वैगई कालके वश ध्रुव ॥
जो रघुराजसुता अब अहई । सो तुव भयऊ नृप घर रहई ॥
तासों तुव नहिं उचित विवाहा । रीवां जान न करहु उछाह ॥
हमरे सँग जयपुर पगु धारो । सुनि सो कह यह भलो उचारो ॥
दोहा-ह्वै सवार बग्धी तुरत, जयपुरको नरनाह ॥
ताको संग चढ़ाय कै, लैगो जयपुरकाह ॥ २२ ॥
महाराज रघुराजकी, जेठि सुता वश काल ॥
होत भई तबइतहिते, सुमति दिवान उताल ॥ २३ ॥
लिख्यो जोधपुरकों यह पाती । जहाँ अजवेशर है विख्याती ॥
जासु तिलक जेठेको चढ़ेऊ । सो नृपकी दुहिता जिय कढ़ेऊ ॥
ताते यह नृपसुता जो अहई । तासु व्याह जेठेको चहई ॥
तामें पक्काइत कारिलीन्यो । तब तुम इतै पयानहिं कीन्ह्यो ॥
यह पाती कहि कवि अजवेशा । सों पक्काइन करि लियेवेशा ॥
नृप दिवान कहँ पत्र पठायो । हम यह पक्काइत कारि भायो ॥
सों आगरे सुरति विसरायो । जेठ कुँवरको नहिं लै आयो ॥
तख्तसिंह नृप रेल चढ़ाई । सबको तीरथपति नहवाई ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ७१३ )
दोहा-सबको करिदीन्ह्यो बिदा, ते ह्वै रेल सवार ॥
रानी सुत सब सैन्यगे, निजपुरको बिनवार ॥ २४ ॥
छरे संग सरदारलै, युग रानी सुत दोय ॥
तखतसिंह आवतभये, रींवाको मुदमोय ॥ २४ ॥
नृप रघुराज मोद उर छाई । शिविर करायो ले अगुवाई ॥
सुदिवसमें त्रय भयो विवाहा । छायो घर घर परमउछाहा ॥
जो पितृव्यकी सुता सयानी । तख्तसिंह व्याह्यो सुखमानी ॥
तख्तसिंह ल्याय सुत दोई । तिनमें जेठ कुँवर रह जोई ॥
ताको सुता अपनी व्याही । महाराज रघुराज उछाहि ॥
तेहिते लहरे कुँवरहिं काही । सुता विमातृ भगिनि कहँ व्याही ॥
दायज देन जु रह्यो करारा । पंचलक्ष दिय द्रव्य उदारा ॥
हय गज भूषण वसन अमोले । दियो तिन्हें रघुराज अतोले ॥
दोहा-मेवा सकल मँगायकै, अरु मिठाइ बहु भांति ॥
कैयो दिन सादर दियो, ऊंच नीच सब जाति ॥ २६ ॥
चारि रोज़को नेम जग, रखि मास लों बरात ॥
पूरी साज सबै जनन, पूरी सुख सरसात ॥ २७ ॥
रत्न जटिल सुवरण कटक, अरु बहु मोती माल ॥
निज सरदारनको दियो, छायो सुयश विशाल ॥ २८ ॥
कवित्त ।
एक समै बांधवेश महाराज रघुराज छरे सरदारन औ संगलै देवानहै ॥
रेलमें सवार कलकत्ताको पयान कीनो हरिहर क्षेत्र आदि तीरथ महान है ॥
परेमग तहाँकै नहान दै द्विजान दान तीजे रोज जब कलकत्ता नगीचान है ॥
हूनपति आज्ञा पाय हून मुख्य आगू आय लै गयो लेवाय डेरा देतभो मकान है॥ १॥
दोहा-डेरा आयो लाट पुनि, देखि भूपको रूप ॥
रूप न अस कोहु भूपको, भूपर गन्यो अनूप ॥ २९ ॥
मुद्रा सहस रसोई काहीँ । शिविर जाय पठयो सुखमाहीं ॥
दूजे दिन पुनि नृपति उदारा । सादर लाट शिविर पगुधारा ॥
( ७१४ ) बघेलवंशवर्णन ।
सो आगुलै उच्च जो कुरसी । बैठायो तामें अति हुलसी ॥
विविधभांति कीन्ह्यो सत्कारा । सो कहँलों कवि करै उचारा ॥
बड़कीमतिकी उभय दुनाली । देत भयो शत्रुनको शाली ॥
फेरिलाट असि गिरा उचारी । ईजा लही आप मग भारी ॥
यहि पुर होत कलैते कामा । याते कलकत्तहि नामा ॥
द्वै चारिक चलि ठौर विशेषी । लेहिं आपहू आंखिन देखी ॥
दोहा-पांचलाख मुद्रा नितहिं, बनत कलैते ख्यात ॥
तूल सूत बिनिबो वसन, होत कलैते व्रात ॥ २३० ॥
शहर फनूस बरै बुतै, निशि कलते यक साथ॥
इत्यादिक बहु औरऊ, निरखि नंद विश्वनाथ ॥ ३१ ॥
कह्यो लाट साहेब सों जाई । यहि पुर कला अपूर्व लखाई ॥
तकन तोपखानै पुंनि भूपा । गये लखे युग तोप अनूपा ॥
रहैं अठारै पंनी केरी । तिनहि सराहतभो नृप ढेरी ॥
सो यक मनुज लाटसों कहेऊ । लाट खुशी ह्वै हुकुमहि दयऊ ॥
महाराज ऐसी युगतोपा । तुम्हहिं देतहैं हम भरि चोपा ॥
अहँ माग सो लेव मँगाई । दिये देत हम अहँ रजाई ॥
द्वैशत फेरि तिलंगन काहीँ । पथरकला दीन्ह्यो सुखमाहीँ ॥
पुनि कह तुव दिवान सरदारा । वीर बड़े अरु सुघर अपारा ॥
दोहा-बहुत रोज आये भये, अहै रुजी यह देश ॥
याते अब निज पुरीको, कीजै गमन नरेश ॥ ३२ ॥
लाट वचन तब भूप सुनि, ह्वै द्रुत रेल सवार ॥
मग नृप बहु सन्मान लहि, आयो पुरी मँझार ॥ ३३ ॥
दंडहु भरको हुकुम नहिं, तहँ असि लै सब ठाम ॥
इनके जन बागैं वचैं, और कसूरी नाम ॥ ३४ ॥
अरज कियो जो लाट सों, सो सब पूरण कीन ॥
कह्यो आपना राज्यमें, करो जो चहो प्रवीन ॥ ३५॥
चारि अश्व बघ्घीनिमें, चढ़त लाट नहिं कोय ॥
चढ़ै जो कोऊ धोखेहूं, देइ दंड ध्रुव सोइ ॥ ३६ ॥
सो पठयो महराज पै, गुणि सो निजहिं समान ॥
चढ़ि भूपति रघुराज तब, गुन्यो कृपा भगवान ॥ ३७ ॥
मान्यो यह रघुराज नृप, सब यदुराज प्रभाव ॥
और येक आगे चरित, वरणों भरि चित चाव ॥ ३८ ॥
विजयनगर है नामजेहिं, ईजानगर विख्यात ॥
तहँको गजपतिसिंहहै, भूपति मति अवदात ॥ ३९ ॥
सादर सहित कुटुंब सो, बस्यो बनारस आय ॥
ताके भै यक कन्यका, रति सम सुंदर काय ॥ २४० ॥
तेहि व्याहन हित सो उत्साहन । भेज्यो जन पछाह नरनाहन ॥
ते सब दूरिदेश बहु मानी । अपनो जाब अगम मन जानी ॥
ताते ते न कबूलहि कीने । मुद्रा लाखनहूंके दीने ॥
तब सो ईजानगर भुवाला । मनमें कीन्ह्यो शोच विशाला ॥
पुनिकीन्ह्यो अस मनहिं विचारा । रीवां को है बड़ो भुवाला ॥
तेहिते जो ममसुता विवाहू । होय तो होवै महाउछाहू ॥
एक समय रघुराज उदारा । भेंट करन जयपुरहिं भुवारा ॥
मिरजापुरको कियो पयाना । तहँ नृप ईजानगर सजाना ॥
दोहा-मुलाकात करि नजरदै, बहु विधि कीन्ह्यो सेव ॥
पुनि जब तकमा लेनको, गयो काशि नरदेव ॥ ४१ ॥
तबहूं बहुविधि सेव करि, सुता व्याहकें हेत ॥
विनयकियो बहुभाँति सों, सो नृप बड़ो सचेत॥ ४२॥
नाथ कह्यो वकील करिद़ीजै । ज्वाब स्वाल तेहि मुख नृप कीजै ॥
सुनि प्रसन्न गजपति नृप भयऊ । सादरनिजवकील करि दयऊ ॥
भयो जवाब स्वाल युगवरषा । पैंरिनयको टीको कछुनरषा ॥
पूँछयो प्रभु तेहि नृपकी आदी । भाषतभे वकील अहलादी ॥
( ७१६ ) बघेलवंशवर्णन ।
राना विदित उदयपुर केरे । तिन भाई करि लेहिं निवेरे ॥
सुनत उदयपुर खत लिखवायो । रानाजी लिखि तरत पठायो ॥
ईजानगर भूप जों रहई । सो हमरो भाई सति अहई ॥
सुनि खत बांधवेश महाराजा । कह वकील सों वयन दराजा ॥
दोहा-लै आवहु द्रुत तिलक इत, लै आये ते जाय ॥
टिके रहे बहु मासलों, तिलक न चढ़त जनाय॥ ४३ ॥
रामराजसिंहको तिलक, चढ़नको कहै वकील ॥
भूप कहैं नहिं बनत उन, कहैं ज्योतिषी ढील ॥ ४४ ॥
कतहूँ न तुव संबंध तेहिं, तुव संबंधी माहिं ॥
याते इत सब जन कहैं, व्याह योग उत नाहिं ॥४५ ॥
अति मतिवंत भूप रघुराजू । गुन्यो वृथा सब करत अकाजू ॥
पांचलाख मुद्रा यह देई । तिलक माहिं अति आनंद भेई ॥
उभय लाख द्वारे महँ दे हैं । उभय लाख संग सुता पैठे हैं ॥
हय गय भूषण वसन अमोला । और उपरते देइ अतोला ॥
दोषहु यामें कछु न जनाई । रानाको प्रसिद्धहै भाई ॥
यह करि ठीक मनहिं मतिवाना । कलकत्ता जब कियो पयाना ॥
तहँ किय लाट अग्रेते ठीको । रामराजसिंह परिणय नीको ॥
दाइज लेन रही जो चाहा । ताहूको करि दियो निवाहा ॥
दोहा-रीवामें द्रुत आय प्रभु, कह पितृव्य सुत पाहिं ॥
साहेब ढिग सिद्धांत भो, तिहरो व्याह तहाँहिं ॥४६॥
कहत रहे जे होवे नाहीं । तेउ चुपभये न कछु बतराहीं ॥
नृपं वकील ते कहि घर शाहू । पांच लाख धरवाय उछाहू ॥
रामराजसिंहको लै संगे । साजि बरात चल्यों सडमंगे ॥
काशीको जब गये निराई । डेरा दिय सो लै अगुवाई ॥
तहँईसो पुनि तिलक चढ़ायो । हय गय भूषण वसन मँगायो ॥
मुद्रा सहस पचास मँगाई । गजपति सिंह दियो सुख छाई ॥