कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७०० ) बघेलवंशवर्णन ।
सत्य कहैं रघुराज हौं आज अनेकन जन्मके पाप नशायो ॥
जो बलभद्र सुभद्रा सुदर्शन औ जगनाथको दर्शन पायो ॥
लोचन सामुहे होत जबै तब देखनकी नहिं चाह सिराती ॥
आनँद बाढ़ै जितो उरमें मिति तासु न मोसों कछू कहि जाती ॥
को रघुराज बखानि सकै जगदीशकी शोभा त्रिलोक विजाती॥
ज्यों ज्यों समीप ह्वै हेरै त्यों त्यों क्षणहीं क्षणमें सरसै दरशाती ३
घनाक्षरी ।
कञ्चनको छत्र उभय चौर विजनादिनोल भूषण वसन त्यौ अमोल मोतिमालको॥
मोहर अमित मुद्रा दै गयन्द त्यों तुरङ्ग प्रभुहिं समर्पि पायो परम निहालको ॥
भप रघुराज त्योंहि दै कै सबहीको वसु नजर देवायो तहां देवकीको लालको ॥
पंडा आ पुरीके भये परमसुखारी पाय पाय धन भारी गाये सुयश विशालको ॥
सोरठा-कहत मनहिं मन नाथ, सो मैं करौं प्रकाश अब ॥
को समान जगनाथ, है कृपालु यहि जगतमें ॥ १ ॥
विविर जाय सुख पाय, पायो महाप्रसादपुनि ॥
तहँके तीर्थ निकाय, जाय जाय सादर कियो ॥ २ ॥
रानिहु सब सुखपाय, त्योंहीं नजर निकाइकै ॥
जगपति दरश सोहाय, करि मान्यो सफलै जनम॥३॥
दोहा-बेखटका अटका अमित, चटकै दियो चढ़ाय ॥
मटका मटका लै गये, कोऊ सटका खाय ॥ ७२ ॥
महाराज रघुराज उदारा । अरुणखम्भ ढिग पुनि पगु धारा ॥
देश देशके जन बहु आई । जुरे पुरीके जन समुदाई ॥
पेखि अनूप भूपकी शोभा । सबहीको बरबस मन लोभा ॥
तहँ नृप नायक परम सुजाना । हेम तुला चढ़ि वेद विधाना ॥
सुवरण वृष्टि करी मन भाई । मानौ मघा मेघ झरिलाई ॥
रह्यो न पुरी कोउ द्विज बाकी । जो न सुवर्ण लहै सुख छाकी ॥
रानिहुँ त्यों सिगरी तहँ आई । रजत तुला चढ़ि चढ़ि सुख छाई ॥