कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७१४ ) बघेलवंशवर्णन ।
सो आगुलै उच्च जो कुरसी । बैठायो तामें अति हुलसी ॥
विविधभांति कीन्ह्यो सत्कारा । सो कहँलों कवि करै उचारा ॥
बड़कीमतिकी उभय दुनाली । देत भयो शत्रुनको शाली ॥
फेरिलाट असि गिरा उचारी । ईजा लही आप मग भारी ॥
यहि पुर होत कलैते कामा । याते कलकत्तहि नामा ॥
द्वै चारिक चलि ठौर विशेषी । लेहिं आपहू आंखिन देखी ॥
दोहा-पांचलाख मुद्रा नितहिं, बनत कलैते ख्यात ॥
तूल सूत बिनिबो वसन, होत कलैते व्रात ॥ २३० ॥
शहर फनूस बरै बुतै, निशि कलते यक साथ॥
इत्यादिक बहु औरऊ, निरखि नंद विश्वनाथ ॥ ३१ ॥
कह्यो लाट साहेब सों जाई । यहि पुर कला अपूर्व लखाई ॥
तकन तोपखानै पुंनि भूपा । गये लखे युग तोप अनूपा ॥
रहैं अठारै पंनी केरी । तिनहि सराहतभो नृप ढेरी ॥
सो यक मनुज लाटसों कहेऊ । लाट खुशी ह्वै हुकुमहि दयऊ ॥
महाराज ऐसी युगतोपा । तुम्हहिं देतहैं हम भरि चोपा ॥
अहँ माग सो लेव मँगाई । दिये देत हम अहँ रजाई ॥
द्वैशत फेरि तिलंगन काहीँ । पथरकला दीन्ह्यो सुखमाहीँ ॥
पुनि कह तुव दिवान सरदारा । वीर बड़े अरु सुघर अपारा ॥
दोहा-बहुत रोज आये भये, अहै रुजी यह देश ॥
याते अब निज पुरीको, कीजै गमन नरेश ॥ ३२ ॥
लाट वचन तब भूप सुनि, ह्वै द्रुत रेल सवार ॥
मग नृप बहु सन्मान लहि, आयो पुरी मँझार ॥ ३३ ॥
दंडहु भरको हुकुम नहिं, तहँ असि लै सब ठाम ॥
इनके जन बागैं वचैं, और कसूरी नाम ॥ ३४ ॥
अरज कियो जो लाट सों, सो सब पूरण कीन ॥
कह्यो आपना राज्यमें, करो जो चहो प्रवीन ॥ ३५॥