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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

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DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 744

( ७१६ ) बघेलवंशवर्णन ।

राना विदित उदयपुर केरे । तिन भाई करि लेहिं निवेरे ॥
सुनत उदयपुर खत लिखवायो । रानाजी लिखि तरत पठायो ॥
ईजानगर भूप जों रहई । सो हमरो भाई सति अहई ॥
सुनि खत बांधवेश महाराजा । कह वकील सों वयन दराजा ॥
दोहा-लै आवहु द्रुत तिलक इत, लै आये ते जाय ॥
टिके रहे बहु मासलों, तिलक न चढ़त जनाय॥ ४३ ॥
रामराजसिंहको तिलक, चढ़नको कहै वकील ॥
भूप कहैं नहिं बनत उन, कहैं ज्योतिषी ढील ॥ ४४ ॥
कतहूँ न तुव संबंध तेहिं, तुव संबंधी माहिं ॥
याते इत सब जन कहैं, व्याह योग उत नाहिं ॥४५ ॥
अति मतिवंत भूप रघुराजू । गुन्यो वृथा सब करत अकाजू ॥
पांचलाख मुद्रा यह देई । तिलक माहिं अति आनंद भेई ॥
उभय लाख द्वारे महँ दे हैं । उभय लाख संग सुता पैठे हैं ॥
हय गय भूषण वसन अमोला । और उपरते देइ अतोला ॥
दोषहु यामें कछु न जनाई । रानाको प्रसिद्धहै भाई ॥
यह करि ठीक मनहिं मतिवाना । कलकत्ता जब कियो पयाना ॥
तहँ किय लाट अग्रेते ठीको । रामराजसिंह परिणय नीको ॥
दाइज लेन रही जो चाहा । ताहूको करि दियो निवाहा ॥
दोहा-रीवामें द्रुत आय प्रभु, कह पितृव्य सुत पाहिं ॥
साहेब ढिग सिद्धांत भो, तिहरो व्याह तहाँहिं ॥४६॥
कहत रहे जे होवे नाहीं । तेउ चुपभये न कछु बतराहीं ॥
नृपं वकील ते कहि घर शाहू । पांच लाख धरवाय उछाहू ॥
रामराजसिंहको लै संगे । साजि बरात चल्यों सडमंगे ॥
काशीको जब गये निराई । डेरा दिय सो लै अगुवाई ॥
तहँईसो पुनि तिलक चढ़ायो । हय गय भूषण वसन मँगायो ॥
मुद्रा सहस पचास मँगाई । गजपति सिंह दियो सुख छाई ॥