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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 731

पुनि विजयराघव घेरि लीन्हो संग सैन्य महानहैं ॥
तेउ भये बांवां करत भै करी थान तहँऊ करि लियो ॥
महराज श्रीरघुराज सुख भरि सौंपि अंगरेजहि दियो ॥
यह कृपा गुणि यदुराज की रघुराज परम उदारहै ॥
निज राजधानी आय कछु दिन बस्यो सुखित अपारहै ॥
दोहा-रींवा ते जे कढ़ि गये, बहु सरदार सुखारि ॥
वागी भेरन रारि कर, तिन मिसि नृपहुँ विचारि ॥७७॥
कोपित है जरनैल बहु, लै सँग सैन्य अपार ॥
चढ़ि आयो रींवानगर, गोरा कइक हज़ार ॥७८॥
हुकुम दियो महराजको, करि दुष्टता विचार ॥
देखन हेतु कवायदै, आवै आजु हमार ॥७९॥
सुनत कह्यो रघुराज उदारा । देखन चलिहैं कछु न खँभारा ॥
हमरे सति सहाय यदुराई । का करिहैं अरि सैन्य महाई ॥
तब रीवांके लोग सुजाना । रह्यो जो और देवान पुराना ॥
वर्ज्यो विनती करि बहु भांती । उचित न जाब प्रबल आराती ॥
तँहँ यक दीनबंधु जेहिं नामा । रह्यो दिवान वीर मतिधामा ॥
कहत भयो सो प्रण करि भारी । चलिये आप न कछू विचारी ॥
क्षंत्री ह्वै जो समर सकाने । कुलकलंक तेहिं पांवर जानों ॥
यह रिपु करिहै कहा हमारे । करिहै रोष जायगो मारे ॥
दोहा-दीनबंधु दीवानके, वचन सुनत नरनाथ ॥
जात भयो रणसाज सजि, लिये सैन्य बहु साथ॥८०॥
भूप संग बहु सैन्य करेरी । सो जरनैल नयन निज हेरी ॥
भय अति मानि देखाय कवायत । गमन्यो हारि मानिकै निजचित ॥
महाराज रघुराज सचैनै । कृपा कृष्ण गुणि आयो ऐनै ॥
सुधि करि दीनबंधुकी वानी । है प्रसन्न बहु विधि सनमानी ॥
दीन्ह्यो गाँव अनेक इनामा । गुणि मतिवान दिवान ललामा ॥