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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 737

बघेलवंशवर्णन । ( ७०९ )
दाहा-महाराज रघुराज पुनि, दारु तुला मँगवाय ॥
यक पलरामें देतभे, सुवरण मनन धराय ॥ ५ ॥
ढाल कृपाण पाणि निज लैके । निज भूषण वसनहुँ ढिग धैकै ॥
यक पलरामें सहित उछाहा । बैठ्यो बांधवेश नरनाहा ॥
सुवरण पलरा नीच लख्यो जब । दिय नरेश सुनि देश आशु तब ॥
अपनो गरु रफल्ल मँगाई । निज समीपही लियो धराई ॥
तबहुँ सो पलरा नीच लखाना । तबहुँ नृपति अस वचन वखाना ॥
द्वै थैली ये मोहरन केरी । उलदि देहु न करहु अब देरी ॥
कामदार ते सुनि सहुलासा । उलदि दियो मोहर अनयासा ॥
सुवरण पलरा महि लगि गयऊ । पलरा ऊँच भूपको भयऊ ॥
तुला चढ़े अस लखि नृपकाहीं । किये प्रशंसा लोग तहांहीं ॥
उतरि तुलाते नृप हरषाई । दशहजार मुद्रा मँगवाई ॥
दीनबन्धु दीवानहु भपा । यक पलरा बैठाय अनूपा ॥
यक पलराते रुपयन रूरे । दियो धराय मोद सों पूरे ॥
दोहा-भयो न ऐसो नृपति कोउ, कामदारको जोइ ॥
तुला चढ़ावै रजतमैं, चढ़े हेममें सोइ ॥ ६ ॥
बढ़्यो शोर सुनि जननको, तहाँ भूप शिरमोर ॥
कह्यो करै नहिं शोर कोउ, कहो वचन यह मोर ॥७॥
पाँडे नंदकिशोर कह, सो सुनि भरि मुद थोक ॥
बंद न हल्ला होत यह, छयो तीनिहूँलोक ॥ ८ ॥
राज राज पुनि श्रीरघुराजा । मानि मोद उरमाहिं दराजा ॥
निज नामाहिं सुश्लोक बनाई । सो द्वै सहस आशु छपवाई ॥
प्रथम पंडितनको बिरताई । भोर कमक्षा सपदि सिधाई ॥
काशिराजको तहां मकाना । अति आयत रह विदित जहाना ॥
तहँ मज्जन करि पूजन नीके । बोलि सहस द्वै विप्रन जीके ॥
द्वै द्वै मोहर दिय सबकाहीं । विविध भांति सन्मानि तहांहीं ॥