कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ६९७ )
दोहा-कछु दिनमें आवत भयो, जयपुरको नरनाह ॥
शाहन करन पनाहभे, भूपति जेहिं कुलमाह ॥ ५८ ॥
भगिनि उभय रह जानकी, कृष्ण कुवँरि जिन नाम ॥
व्याहि विदा कीन्ह्यो तिन्हैं, दै बहु धन अभिराम ॥५९॥
पुनि बीते कछु काल श्री, विश्वनाथ नरपाल ॥
है वश काल निवास किय, पास अवधपति लाल ॥६०॥
श्रीरघुराज तनय तेहि केरो । हरिइच्छा गुणि बिन अवसेरो ॥
मानि राज्य सब यदुपति केरी । कामदार सों कह्यो निवेरी ॥
राजाराम राज्यके एकू । तिनकी कृपा न भय मोहिं नेकू ॥
स्वामि धर्मरत जन हितकारी । करिहैं कबहुँ न काम बिगारी ॥
सुदिन अबै न राज अभिषेकु । कह्यो ज्योतिषी सहित विवेकू ॥
ताते मो मन भावत येहू । करो यज्ञ संमत करिदेहू ॥
सुनि दिवान कह बहुत सराही । प्रभु भल कह्यो ऐसहीं चाही ॥
तब रघुराज परम सुख पाई । आशु बनारस मनुज पठाई ।
दोहा--विप्र वेद वित छिम्र बहु, रीवां नगर बोलाय ॥
सुदिन शोधाय सचाय गो, लछिमनबाग सिधाय ६१॥
तहँ किय कठिन कायको नेमा । पगो परम यदुपति पद प्रेमा ॥
मज्जन करि गायत्री जापा । प्रथम करै नितहरै जो पापा ॥
पुनि षोडश प्रकार भरि चायन । पूजन करै रमा नारायन ॥
पुनि नारायण अष्टाक्षर मनु । बीसहज़ार जपैं निश्चल मनु ॥
यही भांति विप्रनहुँ जपावै । रहै यकांत अनत नहिं जावै ॥
पुरश्चरण सौ दिन करि यहि विधि । कृष्ण कृपा पात्रता लही सिधि ॥
कह्यो स्वप्नमें आय मुरारी । राज्य करै है मम अधिकारी ॥
लहत मनहिं मन परमहुलासा । कोहुसों कबहुँ न कियो प्रकाशा ॥
दोहा--जप अष्टाक्षर मंत्रको, बीस हजाराहिं केर ॥
जौलौं रहै शरीर जग, किय संकल्प करेर ॥ ६२ ॥