कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७०८ ) बघेलवंशवर्णन ।
माधौगढ़गे यक समय, तहँते आगू लाय ॥
सुनि हवाल भे अति खुशी, सभा मध्य बँचवाय ॥ १ ॥
खत लिखि पठयो लाट पुनि, जहां आप मन होय ॥
चलि लीजै तकमा तहां, बड़ी बड़ाई जोय ॥ २ ॥
नृप लिखि पठयो काशिको, सोउ लिख्यो है वेश ॥
बांधवेश वर सैन्य युत, गो महेशपुर देश ॥ ३ ॥
मुलाकात दरबार जन, भयो कानपुर माहिं ॥
तस भो काशी लाट दिय, कहौं सो तकमा काहिं ॥ ४ ॥
छंद-भूषण सितारैहिंदको दीन्ह्यो किताबी एकहैं ॥
सुबहादुरी भूषण दियो यक जटित रतन अनेकहैं ॥
अति ह्वै प्रसन्न सुशाहजादी दियो रतनहारहैं ॥
सो दियो नृप रघुराजको वर हूंनपति करि प्यारहैं ॥ ५ ॥
किय कूच फेरि परेटते रघुराज भूप उदारहैं ॥
जन यूह भये प्रसन्न अति लखि सैन्य तासु अपारहैं ॥
चलि असी सुरसरि संगमें तट वास करि सुखछायकैं ॥
मणिकर्णिका अरु गंगमें सउमंग जाय नहायकैं ॥ २ ॥
यक गाउँ औ गो सहस भूषण वसन मोल अमोलहैं ॥
उपरोहितै दिय दान करि सन्मान प्रीति अतोलहैं ॥
पुनि दरश किय विश्वेशको दिय गाउँएक चढ़ाइहैं ॥
अरु सहस मुद्रा वसन भूषण अर्पणै किय चाइहैं ॥ ३ ॥
अन्नपूरणा अरु बिंदुमाधव जाय निकट गोपालहैं ॥
पद पंचशत शत अर्पि मुद्रा लियो दरश विशालहैं ॥
पुनि कालभैरव ढुंढिपाणिहि और सिगरे देवको ॥
शत शत सु मुद्रा अर्पिकै दर्शन लियो करि सेवको ॥
पुनि पंचगंगा आदि जेते घाट रहे महानहैं ॥
करिमज्जनै तिनमें कियो जो दान करो बखानहैं ॥
गज तुरंग गोशत वसन भूषण अन्नकी बहु राशिहैं ॥
लहि विप्र काशि निवासि सब दिय आशिषेसहुलासिहैं ॥