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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 738

( ७१० ) बघेलवंशवर्णन ।
ते सब सुयश भूपको गावत । निज निज गृह गवने सुख छावत ॥
फेरि आपने शिबिर सिधारी । महाराज रघुराज सुखारी ॥
रहे जे बाकी औरहु पंडित । सकल शास्त्रमें अतिही मंडित ॥
सादर तिनको निकट बोलाई । करि सन्मान सभा बैठाई ॥
दुइ दुइ मोहर और दुशाले । देतभयो युत प्रीति विशाले ॥
त्यउ सब गावत सुयश भुआला । दै अशीश गृह गये उताला ॥
दोहा-कहत परस्पर बात यह, जात पंथ हरषात ॥
सभान किय अवदात असि, कोउ नृप व्रात विख्यात॥९॥
रहे घाटिया विप्रजे, काशी कइक हजार ॥
सुवरण तनु तिनके किये, सुवरण वितरि अपार॥१०॥
हाट हाट हाटक विपुल, भयो बनारस सस्त ॥
रस्तन रस्तन बागते, पंडित मोहर मस्त ॥ ११ ॥
रहे जे संत महंत तहँ, संन्यासी विख्यात ॥
सादर तिनको दरश लिय, दे धन बहु सहुलास ॥१२॥
देहरी बीस हजारहैं, काशी विप्रन केरि ॥
नृप तिनके सत्कार हित, नीके मनहिं निबेरि ॥१३॥
पांडे नंदकिशोर सिंह, ईश्वरजीत बघेल ॥
तिमि शाहिजादहुँ सिंहसों, कह्यो धर्मको वेल ॥१४॥
हम अब रीवहिं जातहैं, रुपया बीसहजार ॥
लै देहरी सब द्विजन दै, अइयो निजहिं अगार ॥१५॥
अस कहि भूपति भोरही, तहँते तुरत पधारि ॥
निज पुरको आवतभयो, करि दरकूँच सुखारि ॥ १६ ॥
उत तीनों जन काशि वसि, विप्रन सहित विवेक ॥
दीन्ह्यो गनि देहरीनको, फरक पर्यो नहिं नेक ॥ १७ ॥
कवित्त ।
राना राठिउरहाडा बडे कछवाह राजा आय आय कीन्ही सभा दैकै धन राशी है।
दक्षिणके सूबा जे करोरिनके राज्यवारे आय तेउ सभाकै सुकीरति प्रकाशी है ॥