कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । (७०१)
*दोहा--भये अयाचक पुरी के, रहे जे याचक वृंद ॥
पाय पाय सुवरण रजत, गाय सुयश मुदकंद ॥ ७३ ॥
घनाक्षरी ।
शतक बनायो जाय आपहि सुनायो सुनि जगदीश बलहु सुभद्रा मोद भीने हैं ॥
शिरते सुमनमाल तुरत खसाय रीझि अभिराम सादर इनाम करिदीन्हें हैं ॥
कहै युगलेश वेश दौरि बांधवेश तब सम्भृत कलेशहारी धन्य मानि लीन्हें हैं ॥
महाराज रघुराज भक्तिको प्रभावपुरी प्रगट देखानो जानो भक्तराज बीन्हें हैं ॥
दोहा-लखि प्रभाव तेहि ठाँव यह, कहैं लोग भरिचाय ॥
भक्ति भाव रघुरावसति, कस न द्रवैं यदुराय ॥७४॥
श्रीरघुराज मोद भो जेतो । यक मुख सों कहिसकत न तेतो ॥
माने सब जन अरु सरदारा । पूर्व पुण्य कछु कियो अपारा ॥
जाते वश अस नृप ढिग माहीं । हरि प्रभाव निरखे चख माहीं ॥
परदेशी अरु पुरी निवासी । अरु जे रहे भूप सँग वासी ॥
चढ्यो रोज नृप अटकाजोई । ताते सबको भोजन होई ॥
एक गाँव जगदीश चढ़ायो । पन्डा पाय परमसुख पायो ॥
पुरी सवाउ मास किय वासा । सबकों सब विधि देत हुलासा ॥
युत समाज हरिमन्दिर जाई । लिय त्रिकाल दर्शन नृपराई ॥
दोहा-अर्द्धरात्रि नित जाय नृप, त्योंहीं दर्शन लेय ॥
पाय सुमहाप्रसादको, सबको सादर देय ॥ ७५ ॥
फागुनकी पूर्णिमाको, फूलडोल गोपाल ॥
झूलत निरखि निहाल ह्वै, को न तज्यो जगजाल॥७६॥
छंद-शुभदिवस तहँते गौन करिकै गया तीरथको गयो॥
करि श्राद्ध वेद विधान सो बहु दान विप्रनको दयो ॥
द्विज पाय धन समुदाय वांछित करत भये बखानहैं ॥
जस गया कीन्ह्यो बांधवेश न नरेश कीन्ह्यो आनहैं ॥
तहँ सुन्यो नौकरहूंनके गे बिगरि कारन पायके ॥