कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचारि अश्व बघ्घीनिमें, चढ़त लाट नहिं कोय ॥
चढ़ै जो कोऊ धोखेहूं, देइ दंड ध्रुव सोइ ॥ ३६ ॥
सो पठयो महराज पै, गुणि सो निजहिं समान ॥
चढ़ि भूपति रघुराज तब, गुन्यो कृपा भगवान ॥ ३७ ॥
मान्यो यह रघुराज नृप, सब यदुराज प्रभाव ॥
और येक आगे चरित, वरणों भरि चित चाव ॥ ३८ ॥
विजयनगर है नामजेहिं, ईजानगर विख्यात ॥
तहँको गजपतिसिंहहै, भूपति मति अवदात ॥ ३९ ॥
सादर सहित कुटुंब सो, बस्यो बनारस आय ॥
ताके भै यक कन्यका, रति सम सुंदर काय ॥ २४० ॥
तेहि व्याहन हित सो उत्साहन । भेज्यो जन पछाह नरनाहन ॥
ते सब दूरिदेश बहु मानी । अपनो जाब अगम मन जानी ॥
ताते ते न कबूलहि कीने । मुद्रा लाखनहूंके दीने ॥
तब सो ईजानगर भुवाला । मनमें कीन्ह्यो शोच विशाला ॥
पुनिकीन्ह्यो अस मनहिं विचारा । रीवां को है बड़ो भुवाला ॥
तेहिते जो ममसुता विवाहू । होय तो होवै महाउछाहू ॥
एक समय रघुराज उदारा । भेंट करन जयपुरहिं भुवारा ॥
मिरजापुरको कियो पयाना । तहँ नृप ईजानगर सजाना ॥
दोहा-मुलाकात करि नजरदै, बहु विधि कीन्ह्यो सेव ॥
पुनि जब तकमा लेनको, गयो काशि नरदेव ॥ ४१ ॥
तबहूं बहुविधि सेव करि, सुता व्याहकें हेत ॥
विनयकियो बहुभाँति सों, सो नृप बड़ो सचेत॥ ४२॥
नाथ कह्यो वकील करिद़ीजै । ज्वाब स्वाल तेहि मुख नृप कीजै ॥
सुनि प्रसन्न गजपति नृप भयऊ । सादरनिजवकील करि दयऊ ॥
भयो जवाब स्वाल युगवरषा । पैंरिनयको टीको कछुनरषा ॥
पूँछयो प्रभु तेहि नृपकी आदी । भाषतभे वकील अहलादी ॥