सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 734

( ७०६ ) बघेलवंशवर्णन ।
पुनि रघुराज भूप मतिवाना । मुदित लाटसों वचन बखाना ॥
हम अस जहँ तहँ सुन्यो हवाला । लेन हेतु सबको करवाला ॥
आवत लाटसो हम पहिलेहीं । सौंहीं देहिं आप लैलेहीं ॥
सुनि सौंहीं लै लाट उवाही । देखि भली विधि कह्यो सराही ॥
यह सौंहीं केहिं देशहि केरी । कह नृप अहै फिरंग केरी ॥
सुनत हूँनपति मन मुसक्याई । सौंहीं दै वाणी यह गाई ॥
तुव हथियारहि केवळ तेरे । सदा रहें हम बिन अवसेरे ॥
पुनि भूपति रघुराज उदारा । करि सलाम डेरै पगु धारा ॥
दोहा-सब भूपहुं पुनि नाय शिर, गमने शिबिर मझार ॥
इतै हूँनपति सैन्य युत, है करि सपदि तयार ॥ ८९ ॥
महाराज रघुराजके, आये शिबिर सिधारि ॥
होत भयो जेहिं विधि सदा, तेहिते अधिक विचारि ॥९०
करत भये सत्कार नृप, भो खुशलाट अपार ॥
वरण्यो इत संक्षेपते, भीति ग्रंथ विस्तार ॥९१॥
महाराज रघुराज पुनि, कूच तहाँ ते कीन ॥
सैन्य सहित रीवां नगर, आय सबै सुख दीन ॥ ९२ ॥
बाढ़ अठारहको दियो, लाट विशेष निदेश ॥
दगै सलामि हमेशा सो, आवत जात नरेश ॥ ९३ ॥
कछु दिनमें अरजंट पुनि, चलि सोहागपुर काहिं ॥
भू हि अमल कराय दिय, सुयश छाय जगमाहिं ॥ ९४ ॥
सवैया-एक समय पगमें व्रणभो न अधीर भयो भई पीर महाई॥
जाप करें मनु बीस हजार करैं तिमि राजको काज सदाई ॥
हांरि गये सब देश विदेशके वैद्य हकीम मिटी न मिटाई ॥
दूरि व्यथा भै जबै रघुराज दियो शतकै रचि शम्भु सुनाई ॥
दोहा-औषध किय प्रह्लाद द्विज, तासु अयोध्या सून ॥
पायो मुद्रा शतसहस, गाँव उभय नहिं ऊन ॥९५॥