कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६९८ ) बघेलवंशवर्णन ।
रमा द्वारकाधीशकी, त्यों बलकी करि सूर्त्ति ॥
हेम रजत रचवायकै, परम मनोहर मूर्ति ॥ ६३ ॥
वेद् विहित करवायकै, आसु प्रतिष्ठा वेश ॥
बांधवेश विश्वनाथ सुत, पूजन करत हमेश ॥ ६४ ॥
करन लगै जप जेहिंसमय,तब भरि मोद अनंत ॥
भजन सुनैं भजनीनसौं, निर्मित निज बहु संत ॥ ६५ ॥
सुदिन राज्य अभिषेक को, आयो जब मुदवान ॥
सब तद्वीर महान भै, वेद् विधान प्रमान ॥ ६६ ॥
श्रीरघुराज जाय मखशाला । वसु मंत्रिनते सहित उताला ॥
रघुपति यदुपति मूरति काहीं । थिति कै हेमसिंहासन माहीं ॥
महाराज अभिषेक कराई । अभिषेकित भो आपु सोहाई ॥
श्रीकृष्णहिके कृपापात्र कर । अधिकारी भो विदित अवनिपर ॥
कर परताप छयो परतापा । सज्जन सुखप्रद सुयश अमापा ॥
पितु सम पालत प्रजन सप्रीती । नीति रीति करि. मेटि अनीती ॥
सुनि सुनि शाहहु जाहि सराह्यो । आय अजंट लाट भल चाह्यो ॥
राज्य करत बीत्यो कछु काला । दर्शन हित जगदीश कृपाला ॥
दोहा-करि लालसा विशाल लै, संग चमू चतुरंग ॥
रानिन युत जगपति पुरी, गमन्यो सहित उमंग ॥ ६७ ॥
बीच बीच वीथिन करि वासा । श्रीरघुराज राज सहुलासा ॥
शतक संस्कृत यक जगदीशा । विरच्यो मैं निज आँखिन दीसा ॥
भाषा शतक कवितमें दूजो । विरचन लग्यो सो उमग पूजो ॥
पर्यो अमर कंटक मग माहीं । गमनत भयो नाथ तहँकाहीं ॥
मेकल गिरिते कढ़ि तहँ प्रगटी । शिव प्रिय रेवा सरि अघ निघटी ॥
तहँ मज्जन करि दै बहु दाना । रेवा अष्टक रच्यो सुजाना ॥
शिवअष्टक पुनि रच्यो तहांहीं । सिंहवलोकन छंदहिं माहीं ॥
रहें जे संत विप्र तहँ वासी । तिनको देत भयो धन राशी ॥