कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७१२ ) बघेलवंशवर्णन ।
दोहा-राना नृप कछवाह अरु, हाडा भूप विहाय ॥
जेती लसत पछाहमें, भूपन की ममुदाय ॥ १९ ॥
तिनके भेजि कटारजो, करत आपनो व्याह ॥
ऐसो प्रथित पछाहँमें, जोधपुरी नरनाह ॥ २२० ॥
पुरुषनते संबंध गुणि, तख्तसिंह नरनाह ॥
रींवा करन विवाह को, कीन्ह्यो परम उछाह ॥ २२१ ॥
रानिन सुतन समेत भुवाला । निजपुरते किय गमन उताळा ॥
जेठो कुँवँर तासु रह जोई । चतुरङ्गिणी फौजले सोई ॥
आवत भयो आगरे जबहीं । मिल्यो नृपति जयपुरको तबहीं ॥
ताकी तासु मित्रता भारी । तासों ऐसी गिरा उच्चारी ॥
जेहिं कन्याको तिलक चढ़ौ तुव । सो ह्वैगई कालके वश ध्रुव ॥
जो रघुराजसुता अब अहई । सो तुव भयऊ नृप घर रहई ॥
तासों तुव नहिं उचित विवाहा । रीवां जान न करहु उछाह ॥
हमरे सँग जयपुर पगु धारो । सुनि सो कह यह भलो उचारो ॥
दोहा-ह्वै सवार बग्धी तुरत, जयपुरको नरनाह ॥
ताको संग चढ़ाय कै, लैगो जयपुरकाह ॥ २२ ॥
महाराज रघुराजकी, जेठि सुता वश काल ॥
होत भई तबइतहिते, सुमति दिवान उताल ॥ २३ ॥
लिख्यो जोधपुरकों यह पाती । जहाँ अजवेशर है विख्याती ॥
जासु तिलक जेठेको चढ़ेऊ । सो नृपकी दुहिता जिय कढ़ेऊ ॥
ताते यह नृपसुता जो अहई । तासु व्याह जेठेको चहई ॥
तामें पक्काइत कारिलीन्यो । तब तुम इतै पयानहिं कीन्ह्यो ॥
यह पाती कहि कवि अजवेशा । सों पक्काइन करि लियेवेशा ॥
नृप दिवान कहँ पत्र पठायो । हम यह पक्काइत कारि भायो ॥
सों आगरे सुरति विसरायो । जेठ कुँवरको नहिं लै आयो ॥
तख्तसिंह नृप रेल चढ़ाई । सबको तीरथपति नहवाई ॥