कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ६७० ) बघेलवंशवर्णन ।
तुमहीं राजा अहौ हमोरें । निशि दिन सेवन करब तिहारे ॥
भये खुशी केहरीसिंह सुनि । करि नवाबको अति खातिर पुनि ॥
भवन जानकी दई बिदाई । गयो सो बार बार शिरनाई ॥
नृप केहरीसिंह सहुलासा । कछु वासर तहँ कियो निवासा ॥
सरदारनको करि सन्माना । सब चकरनको सहित विधाना ॥
दिय चिट्ठा चाकरी चुकाई । वसे सबै सेवा मनलाई ॥
दोहा--तहँ केहरी सिंहके, माल केसरी पूत ॥
होत भयो जाके वदन, वसी सरस्वता पूत ॥३७॥
उभय मल्लको जोर तनु, सुंदर तेज विधान ॥
कछु दिनमें तेहि व्याहकरि दीन्ह्यो दान महान ३८॥
फेरि व्यतीत भये कछुकाला । तनु तजि करि केहरी भुवाला ॥
वास कियो वासवपुर मांही । मालकेसरी सपदि तहांही ॥
विधि युत मृतकक्रिया पितुकेरो । करि दीन्ह्यो तहँ दान घनेरो ॥
मालकेसरी कछु दिन माहीं । उपजायो सुंदर सुत काहीं ॥
सारंग देव नाम तेहि भयऊ । सुयश प्रताप नाम तेहि ठयउ ॥
भीमलदेव भयो सुत तासू । फैलि रह्यो जगमें यश जासू ॥
हरिगुरुको भो भक्त महाना । पाल्यो परजन प्राण समाना ॥
ब्रह्मदेव ताके सुत जायो । सो निज पितुसों वचन सुनायो ॥
दोहा--आप कीजिये भजन हरि, सुचित भौन करि वास ॥
मोहिं दीजिये फौज सब, करि उर कृपा प्रकाश ॥३९॥
कछु दिन सैर करौं महि माहीं । प्रकटहुँ नाम रावरे काहीं ॥
सुनि नृप भीमलदेव उदारा । ब्रह्मसूनु सों वचन उचारा ॥
मनमें यह विचार किय नीको । करै सुपूती सोइ सुत ठीको ॥
जगमें नहिं कपूत कहवायो । अस करतूति करन मन लायों ॥
ब्रह्मदेव सुनि ये पितु वैना । करी तयारी भरि अतिचैना ॥
चतुरंगिनी चमू सँग लैके । कियो पयान वीररस ह्वैकै ॥
राज्य गहरवारनके आये । कछु वासर तहँ वसि सुख छाये ॥
पुनि सिधाय शिरनेतन देशू । तहँ विवाह किय ब्रह्म नरेशू ॥
बघेलावंशवर्णन । ( ६७१ )
दोहा-कछुक दिवस शिरनेतनृप, सेवा करि युत प्रीति ॥
ब्रह्मदेव सों समय गुणि, कह्यो विनयकी रीति ॥ ४० ॥
यक मम भाई देश हमारे । गनत न हमहिं भये बलवारे ॥
तिनको दंड दीजिये नाथा । तौ हम बसैं राज्य सुख साथा ॥
ब्रह्मदेव यह सुनि तेहिं वानी । कह नर पठैलेहिं हम जानी ॥
पुनि नृप ब्रह्मदेव रिस छायो । पाती यक ऐसी लिखवायो ॥
ग्यारहसै नेजा सँग लीन्हे । आवत तुब दरशन मन दीन्हे ॥
हैं बघेल हम विदित जहाना । तुम शिरनेत अनुज बलवाना ॥
यह हवाल लिखि पत्री काहीं । दै पठयो यक मनुज तहाँहीं ॥
सो पाती दियँ तिन कर जाई । बांचत गयो कोपमें छाई ॥
दोहा-तुरत जवाब लिखायकै, दीन्ह्यो तेहिं कर धारि ॥
आप दरश पावैं जो हम, धनि धनि भाग्य हमारि ॥ ४१ ॥
सुन्यों न हम बघेलको नामा । निरखि होहिं अब पूरण कामा ॥
पाती असि लिखाय शिरनेता । बांध्यो युद्ध करनको नेता ॥
फौज जोरि आगे कछु जाई । ठाढ़े भये रोष अति छाई ॥
इततें ब्रह्मदेवकी सैना । काल समान गई कछु मैना ॥
भगी फौज शिरनेतन केरी । नृप शिरनेत बन्धु तहँ घेरी ॥
पकरि भूप शिरनेतहिं काहीं । सौंप्यो सो अतिहीं सुख माहीं ॥
ब्रह्मदेवको निज सब देशू । सौंपिदियो शिरनेत नरेशू ॥
तहँ नृप ब्रह्मदेव सहुलासा । करत भये कछु वासर वासा ॥
दोहा-ब्रह्मदेवके होतभयो, तनय सिंह जेहिं नाम
सिंहदेवके पुनि भये, वेणीसिंह ललाम ॥ ४२ ॥
भूपति वेणीसिंहके, नरहरिसिंह सुजान ॥
नरहरि हरिके होतभे, भैददेव मतिवान ॥ ४३ ॥
शिरनेतनके सहित उछाहा । भैददेवको कियो विवाहा ॥
भैददेवकों परम प्रतापा । बाढ़्यो रिपुन देत अति तापा ॥
भैददेव पुनि पितु ढिग जाई । सादर विनती कियो सुहाई ॥
( ६१४ ) बघेलवंशवर्णन ।
सँग चलीसैन्य विशाल, सेनप लसे सम काल ॥
सुत सहित सैन समेत, विरसिंह नृप सुख सेत ॥ ९ ॥
नियरान चित्रहिकूट, तब सुन्यो शाह अटूट ॥
निज फौज दियो निदेश, तहँ भै तयारी बेस ॥१०॥
पयस्वनी सरिके पार, विरसिंह भूप उदार ॥
जब गयो हलकारान, किय विनय जोरे पान ॥११॥
सुनु खोंदावंद हवाल, बड़ी सैन्य आवति हाल ॥
सुनि बादशाह उमाह, भरिबैठ तखतहिं माह ॥१२॥
विरसिंहदेव भुवाल, गजते उतरि तेहिं काल ॥
ढिग शाह चलि अभिराम, बहुभांति कियो सलाम १३
समभानु पुनि विरभान, हयको उघाटि महान ॥
गजमस्त कै परजाय, बैठत भयो सुख छाय ॥ १४ ॥
लिखि साह तब हरषाय, तेहि तुरत निकट बोलाय ॥
लिय तखत में बैठाय, बहु विधि सराहि सुभाय॥१५॥
पुनि कह्यो बाँकेवीर, तुम सम न निडर सुधीर ॥
तुम कहँके अहौ नरेश, काहे चल्यो परदेश ॥ १६ ॥
सोरठा-केहि कारण मम देश, लूट्यो सो नहिं नीक किय॥
शाह वचन सुनि बेस, वीरभानु बोलत भयो॥४९॥
हम क्षत्री बघेल हैं रुरे । वासी थल गुजरातहि केरे ॥
आप हमारे हैं सति स्वामी । हम चाकर राउर अनुगामी ॥
निज करतब देखायबे काहीं । आये हम यहि देशहिं माहीं ॥
जो रिपुता करि हमको मारचो । ताको हमहूं सपदि सँहारचो ॥
तुव देशहिको द्रव्य न खायो । निज कोषहिको वित्त उठायो ॥
जो नृप हमको तेज देखायो । ताहि दंडदै फेरि बसायो ॥
सो आपहिकी बदिकारि दीन्ह्यो । वृथाकोप हमपर प्रभु कीन्ह्यो ॥
यह सुनि बादशाह कह वानी । यहि बालक की बुद्धि महानी ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६७६ )
दोहा-पुनि कह विरसिंह देवसों, तुव सुत बड़ो निशंक ॥
रणरिपुगण जीतन प्रबल,बीर धीर अतिबंक ॥५०॥
छंदहरिगीतिका-तुव पूत बड़ो सुपूत हैहै वंशतिहरे माहिं ॥
नृप द्वादशौको भूप होई अचल भूमिसदाहिं ॥
यह आशि शाह उछाह भरि वारहौँनृपकी राजि ॥
दियबख्शिशादर नानकाराहि कह्यो भाई भ्राजि ॥
गिरि विंध्य बाँधव दुर्गके तुम ईश होहु प्रसिद्ध ॥
नृप सकल महिके करहिं सेवा होयसिद्धि समृद्ध ॥
लिखिदियो विरसिंहदेवको पुनि भूप शाहसमेत ॥
चलि प्राग करि स्नान दिय बहुदान द्विजनसचेत ॥
तहँ भूप बहु सन्मानकरि कीन्ह्योनिमंत्रण शाह ॥
पुनि शाह दिल्लीको गयो प्रागहिं बस्यो नरनाह ॥
विरसिंहदेव विवाह किय सुत वीर भ्रातृहिंकेर ॥
सब जमींदारनको निमंत्रण दियो आये ढेर ॥ ३ ॥
दिय दान द्विजन महानयुत सन्मान मोद अमान ॥
सरसान सकल जहान बिच किय गायकन बहुगान॥
गज बाजि धन मणिमाल बसन विशाल दै सब काह॥
करि मान किय सबकी विदा विरसिंह सहित उछाह॥
दोहा-जमींदार निज निज सदन, जातभये हर्षाय ॥
त्योंहीं याचक गुणीजन,गये अमित धन पाय ॥५१॥
करिकै सविधि क्रिया पितु केरी । विरसिंहदेव द्विजन बहु हेरी ॥
विविध विधान दान बहु दीन्ह्यो । युत सन्मान विदा बहु कीन्ह्यो ॥
कछु वासर करि वास प्रयागा । विरसिंहदेव भूप बड़ भागा ॥
बोलि ज्योतिषिन सुदिन शोधाई । चकरनको चाकरी देवाई ॥
करि खातिरी कह्यो तिनपाहीं । काल्हि सुदिन हमरो सुख माहीं ॥
चलो सबै बांधव गढ़ देखी । सुनत बीर है सयुग विशेखी ॥
( ६७६ ) बघेलवंशवर्णन ।
कहें नाथ भल कीन सलाहा । हमरें उर महान उत्साहा ॥
पुनि विरसिंहदेव मुद भरिकै । वीरभानु युत मज्जन करिकै ॥
दोहा-वेणीमें बहु दान दै, युत सन्मान द्विजान ॥
लै सँग सैन्य पयान किय,विपुल बजाय निसान ५२॥
कवित्त ।
सोहत सवाव लाख संगमें सवार लोने युग लाख पैदरहु गौने जासु साथमें ॥
बेशुमारगज त्योंहीं सुतर अपार राजे योंहीं कूँच करि भरे आनँदके गाथमें ॥
बिच बिच पंथ वास करि बांधवदुर्ग,पास आय नीचे डेरा कियो धारे अस्त्रहाथमें।
विरसिंहदेव जाय लषणकी पूजा तहां करि सविधान धार्यो पद जल माथमें ॥१॥
स०-सादर साधुन विप्रनको नृप छिप्र भली विधि बोलि जेवायो
फेरि सबै ज़मींदारन औ भुमियानको आपने पास बोलायो ॥
ते सब आय सलाम किये दिये भेट कह्यो नृप वैन सोहायो ॥
डेरा करो सब जाय सुखी दियो दण्ड तेहीं जो बोलाये न आयो
दोहा-सांझ समय दरबारको, सादर सबहिं बोलाय ॥
कह रै यत तुम शाहकै, सुनहु सबै चित लाय ॥५३॥
कवित्त ।
शाह यह राज्य हमें दियो है उछाह भरि प्रथम सम्प्रीति वैन सबसों बखानै हैं॥
रीति या बघेलवंशकी है क्रोध ठानै नाहिं येतेहुँ पै कोई जो न हुकुमको मानै हैं ॥
युद्ध करिवेको जो तयार होत ताको हम बाघही है क्रुद्ध ह्वैकै आसनको ठानै हैं ॥
ऐसे अवनीशवैन सुनि सुनि शीशनाय कहे हम रावरेके रैयत प्रमानै हैं ॥ १ ॥
सोरठा-ईश्वर आप हमार, हम सेवक हैं रावरे ॥
सुनि गढ़भूप उदार,आयो विरसिंहदेव ढिग॥५४॥
कवित्त ।
तेग धरि आगे विनय कियों अहैं बाल हम आपहूँ हमारे पिता पालैं प्रीति ठानिकै॥
सुनि विरसिंहदेव बाहँ गहि पुत्र कहि लीन्ह्यो बैठाय उर महामोद मानिकै ॥
कह्यो पुनि तूतो वीरभानुके समान मेरे कह्यो पुनि सोऊ पाणि जोरि सुख सानिकै॥
महाराज किला चलि बैठैं राज्य आसनमें करों सोई दीजिये निदेश दास जानिकै १
बघेलवंशवर्णन । ( ६७७ )
दोहा-सुनत वयन विरसिंह नृप, बोलि ज्योतिखिन काह ॥
सुदिन शोधि गुरु साधु द्विज, आगे करि सउछाह ५५
चल्यो निसान बजायकरि, जायदुर्ग भरि चाय ॥
द्वारपालको देतभो, बहु इनाम बोलवाय ॥ ५६ ॥
पूजा करि सब सुरनकी, अति आदर युत भूप ॥
विप्रन साधुनको कियो, निवता महाअनूप ॥ ५७ ॥
बाजन बाने विविध प्रकारा । तोपैं छूटतभईं अपारा ॥
सुदिन शोधिसिंहासन पाहीं । विरसिंह भूप बैठ सुखमाहीं ॥
ज़मीदार भूमियन बोलाई । बिदा कियो दै तिन्हें बिदाई ॥
रैयत साहु महाजन जेते । आयभेंट दिय नति करि तेते ॥
शिरोपांउदै तिन सब काहीं । खातिर करि किय विदा तहाँहीं ॥
राज्य करत 'बहु वर्ष बिताये । वीरभानु सुतयुत अति चाये ॥
नृप विरसिंहदेव यक वासर । कीन्ह्यो मन विचार यह सुखकर ॥
सुतहिं समर्पि राज्य यह सिगरी । भजन करौं चलि नहिं अब विगरी ॥
दोहा-बोलि साधु गुरुके सपदि, सुदिन शोधि नरराय ॥
वीरभानुकौं शुभ दिवस, दिय गद्दी बैठाय ॥ ५८ ॥
आप भजन करिवे कें हेतू । मणिवै रानी-सहित संचेतू ॥
विरसिंहदेव प्रागमें आई । वास कियों तिरवेणि नहाई ॥
दिनमति ब्राह्मण साधुन काहीं । भोजन करवावै सुखमाहीं ॥
आनंद मग्न रहै वसुयामा । सुमिरण करत जानकी रामा ॥
बीरभानु बांधवगढ़में इत । पैठि राज्य आसन मन प्रमुदित ॥
राज्य कियो बहु दिवस समाजा । तासु सुवन तुमराज विराजा ॥
करहु निशंक राज्य सब काला । यह सुनि राजाराम निहाला ॥
बहु विधि स्तुति करिकै मेरी । मोसों विनती करी बहुतेरी ॥
दोहा-कह कबीर साहेब गुरू, तुम हमरें कुलकेर ॥
शिष्य कीजिये मोंहि प्रभु, अब न कीजिये देर ॥ ५९ ॥
( ६७८ ) बघेलवंशवर्णन ।
यह सुनि तब मैं अति हर्षाई । राजारामहिं कह्यो बुझाई ॥
द्वै है तुम्हरे दशयें वंसा । परमप्रकाशमान यक हंसा ॥
कथिहै सो मुख अनुभव वानी । मोर शब्द गहि है मुखमानी ॥
सोई तुव कुलको अवतंशा । बिजक ग्रंथको करी प्रशंसा ॥
ताको अर्थ अनूपम करि है । मम आश्रमहिं आय सुख भरि है ॥
यह सुनि रामभूप शिरनाई । करि प्रशंसा जनन सुनाई ॥
नंदपुराणिक तहँ सुख भीनी । करी दंडवत वंदना कीनी ॥
राजाराम महलमें जाई । रानीसों सब गयो जनाई ॥
दोहा-रानी सुवचन कुवँरिसों, किय यह विनय ललाम ॥
श्रीगुरुको लै आइये, महाराज निज धाम ॥ ६० ॥
श्रीकबीर गुरुको मुदित, सादर रामभुवाल ॥
लैआये निज भवनमें, करि बहु विनय रसाल ६१॥
कवित्त ।
रहे जहाँ आसन तहाँई श्रीकबीरजीको गुफा बनवायो प्रीतियुत राजारामहै ।
साज मँगवाय सब चौका कै कबीर शिष्य राजा अरु रानिहूंके कीन्ह्यो तेहिं ठामहै ।
औरो सब भूपके समीपी भये शिष्य सुखी पूजा जौन चढ़यों तहां अगणित दामहै ।
दियो भंडारा श्रीकबीर बोलि साधुनको जय जयरह्यो पूरि बांधवगढ़ धामहै ॥१॥
दोहा-युगल गाँउ अरुगाँउ प्रति, रुपयाएक चढ़ाइ ॥
दिय कागज लिखवायकै, रामभूप हर्षाय ॥ ६२ ॥
होय जो हमरे वंशमें, भूपति कोउ उदार ॥
लेय न कबहूं शपथ तेहि, अर्पन कियो हमार ॥ ६३ ॥
श्रीकबीरजी द्वै प्रसन्न अति । त्रिकालज्ञ पुनि कह्यो महामति ॥
औरहु कछु भविष्य मैं भाखों । सो तुम सति निज मन गुणिराखो ॥
दशयें वंश हंसको रूपा । तुम्हहीं प्रगट होहुगे भूपा ॥
सुवचन कुवँरि रानि तुव जोई । सो परिहार भूप घरहोई ॥
तोसों तासु होयगो व्याहा । हरि पद रति अति करी उछाहा ॥
ताके वीरभद्र सुत तेरो । जन्मिदेयगो मोद घनेरो ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६७९ )
सो तेहितें इंग्यरहै वंशा। होइहै नृपनमाहँ अवतंशा॥
बिच बिच और भूप जे है हैं। ते हरिभक्ति हीन है जै हैं॥
दोहा-ब्रह्मतेजते तपित अति, हैहै कोउ नरेश ॥
तजि यह बांधव दुर्ग को, वसिहै औरे देश ॥ ६४॥
ते सब भूपन को जस नामा। शिष्य मोर लिखिहैं अभिरामा॥
दशै वंश तुव अंतहिकाला। संत वेषदै दरश विशाला॥
तोको रामधाम लैजैहैं। आवागमन रहित करिदैहैं॥
अस कहि श्रीकबीर भगवाना। परमधामको कियोः पयाना॥
श्रीकबीरके शिष्य सुजाना। धर्मदास भे विदित जहाना॥
तिनके शिष्य प्रशिष्य घनेरे। लिखे जे औरहुँ भूप बड़ेरे॥
तिनको नाम सुयश परतापा। कहिहौं मैं सुखमानि अमापा॥
कह्यो पूर्व जो संत कबीरा। वीरभानु नृप भो मतिधीरा॥
दोहा-राम भूप सुत तासु भो, इन दूनौं करतूति ॥
प्रथम कछुक वर्णन करौं, जग प्रसिद्धमजबूति ॥ ६५ ॥
दिल्ली रह्यो हुमायूं शाहा। मान्यो हुकुम सकल नरनाहा॥
शेरशाह दिल्लीमें आई। दियो हुमायूं शाह भगाई॥
दिल्लीमें करि अमल सुहायो। सदल आपनो अदल चलायो॥
शाह हुमायूं बेगमकाहीं। गर्भवती सुनिकै श्रुतिमाहीं॥
नरहरि महापात्र लिय मांगी। सब भूपन ढिगगे सुख पागी॥
राख्यो नहिं कोउ भूपति ताहीं। आयो वीरभानु ढिग माहीं॥
वीरभानु तेहिं भगिनी भाखी। पाटन शरह देतभयो राखी॥
बेगम सो दिल्लीपति जायो। अकबर शाह नामसो पायो॥
दोहा-आई बाधा नगरमें, शेरशाह की सैन ॥
वीरभानु नृपसों कहे, लखि आये जे नैन ॥ ६६ ॥
तहँते नृपति पयान करि, बांधवगढ़गो धाय ॥
शेरशाह लिय छेंकि तेहिं, अमित सैन्य लै आय॥६७॥
( ६८० ) बघेलवंशवर्णन ।
छेंके रह्यो वर्ष सो बारा । खायो बोयो आम अपारा ॥
दुर्ग अटूट मानि सो हारा । लै सब सैना सपदि सिधारा ॥
वीरभानु वरवीर नरेशा । छीनिलियो दल लै निज देशा ॥
लै विलायती दल निज संगा । चलो हुमायूं सहित उमंगा ॥
इत अकबर यक दिवश उचारा । सुनिये बांधवनाह उदारा ॥
भई रामसिंह सँग माहीं । बैठतहौ नित भोजन काहीं ॥
हमको क्यों बैठावत नाहीं । नृप कहै आप खामिदै आहीं ॥
पूँछिलेहु मातासों जाई । पूंछयो सो सब दियो बताई ॥
दोहा-खङ्गचर्म लै हाथमें, सुनि अकबर सो हाल ॥
चल्यो कियो तिन संगमें, वीरभानु निज बाल६८॥
अकबरसों तहँ राम कह, कोस कोस करि वास ॥
चलिये दिल्लीनगरको, जुरै फौज अनयास ॥ ६९ ॥
जुरी चमू चतुरंग संग, अमित तुरंग मतंग ॥
रँगो रामसिंह जंगके, रंग अभंग उमंग ॥ ७० ॥
नातनको लिखवायो पानी । चारों नृप आये मुदमानी ॥
तिन सँग रामसिंह यशवाला । जातभयो भो जंग विशाला ॥
हन्योशेरको तहाँ हुमाऊ । दिल्ली तख्त बैठ युत चाऊ ॥
ईतै सुलेमैं राम सँहारी । दिल्लीको द्रुत गयो सिधारी ॥
ताकन तनय हेतु सुखधारी । चढ्यो हुमायूं ऊंची अटारी ॥
मोद मगनसों गिरिगो नीचै । होत भयो तुरंत वश मीचै ॥
तनय हुमायूं अकबर काहीं । बैठायो तब तख्तहिं माहीं ॥
वीरभानु जब तज्यो शरीरा । रामसिंह नृप भो मतिधीरा ॥
दोहा-दिल्लीको पुनि राम नृप, गये अकब्बर शाह ॥
कीन्ह्यो अति सन्मानसो, अकस मानि नरनाह॥७१॥
औचक मारनको गये, ते नृप रामहिं काहँ ॥
फिरे मानि विस्मय सबै, निरखि चारु चौबाहँ॥७२॥
नापितसेन स्वरूप धरि, हरि जिनके तनु माहिं ॥
तेल लगायो राम सो, कहियेकेहिं नृप काहिं ॥७३॥
वीरभद्र तेहि सुत भयो, वीरभद्र कर संत ॥
आगे वर्णौं औरहू, भये जे नृप मतिमंत ॥ ७४ ॥
वीरभद्र सुतविक्रमा-दित्य भयो अबदात ॥
नामहिंके अनुगुण भयो, जेहिं गुण जग विख्यात ॥७५॥
लीन्ह्यो जायरिझाय जो, निज करतूतिहि माहिं ॥
ब्रह्मके मारे मरिलह्यो, सोन देव पुर काहिं ॥ ७६ ॥
अमरसिंह ताको सुवन, सरिस अमरपति भोज ॥
रीवां रजधानी करी, सींवा यश अरु वोज ॥ ७७ ॥
दिल्लीको गमनत भयो, चुक्यौ खर्च मग माहिं ॥
लूटि दौलताबादको, गयो शाह ढिग पाहिं ॥ ७८ ॥
उमरावन चुगुली करी, शाह निकट द्रुत जाय ॥
बादशाह मान्यो नहीं, नृप पै खुशी बनाय ॥ ७९ ॥
अमरसिंह भूपालके, भो अनूपसिंह भूप ॥
भूपर जासु प्रताप यश, छायो परमअनूप ॥ ८० ॥
भावसिंह ताको तनय, भयो भानु सम भास ॥
दाता ज्ञाता वीरवर, ज्ञाता बुद्धि विलास ॥ ८१ ॥
जगन्नाथजी जायकै, मूर्त्ति लाय जगनाथ ॥
थापिव्यासके ग्रंथको, संच्यो भरि सुख गाथ ॥८२॥
राना घरमें व्याहभो, तहँते मूरति दोय ॥
लाये सरस्वति गरुड़की, थापित किय मुदमोय ॥८३॥
विप्रन दान महानदै, कीन्हे बहु सन्मान ॥
तिनके भे अनिरुद्ध सिंह, भूपति परम सुजान ॥ ८४ ॥
ताके भो अवधूतसिंह, जाहिर दान जहान ॥
ताके सुवन अजीतसिंह, दुवन अजीत महान ॥ ८५॥
( ६८२ ) बघेलवंशवर्णन ।
जाके गौहरशाह बसि, जायो अकबर शाह ॥
सैन्य साजि जेहिं तखतमें,बैठावत नरनाह ॥८६॥
जाजमऊलों जायकै, दिल्ली दियो पठाय ॥
अँगरेजहुँ अठवर्नको, दीन्ह्यो जंगभगाय ॥८७॥
तासु तनय जयसिंहभो, जयमें सिंह समान ॥
जाहिर दान कृपानमें, भक्तिवान भगवान ॥८८॥
दशहजार असवार लै, पूनाको हारोल ॥
आवतभो यशवंत तेहिं, हत्यो प्रताप अतोल ॥८९॥
गहरवार करि गर्व बहु, लीन्हे देश दबाय ॥
तिनको मारि भगाय दिय, बचे ते गिरिन लुकाय९०
देश आपने अमल करि, दै विप्रन बहु दान ॥
अंत समय तनु प्राग तजि,हरिपुर कियो पयान॥९१॥
विश्वनाथ नरनाथभो, तासु तनय यशगाथ ॥
रति अनन्य सियनाथपै, भई जासु महिमाथ ॥९२॥
सरि सर घर घर पुर पथन, छयो राम गुणगाथ ॥
कितो परीक्षित कै कियो, कलि कृतयुग विश्वनाथ९३
तासुतनय रघुराज भो, महाराज शिरताज ॥
राजत राज समाजमधि,जाको सुयश दराज ॥९४॥
श्रीकबीरजी कथित यह, है विचित्र नृप वंश ॥
नहिं असत्य मानै कोऊ, जानि संत अवतंश ॥९५॥
सतयुगमें सत नाम रह, अरु मुनींद्र त्रेताहिं ॥
करुणामय द्वापर रह्यो, अब कबीर कलि माहिं ॥९६॥
कबित्त ।
नृपति उदार केते भये अनुसार मति तिनके अपार गुण यश कियो गानहै ॥
जनम करम भूप रघुराजको अनूप धरमको जूप दिव्य जाहिर जहानहै ॥
देख्यो निज नैन ताते भरो अति चैन उर करतहौं निज वैन सबिधि बखानहै ॥
कहै युगलेश अहै झूठको नलेश कहूं मानि है विशेष सांच सोई बड़ो जान है ॥१॥
छंद्-कह्यो कबीर भविष्य राम नृप सुनि सुखराशी ॥
हंसिनि सुवचन कुँवरि रानि तू हंस प्रकाशी ॥
वीरभद्र तुव सुतहु हंस: नित हरि ढिग वासी ॥
गुणगंभीर अति वीर धीर यश सुयश विलासी ॥
जब दशै वंश अवतंस नृप, प्रगट होयहै तू अवशि ॥
तब सति परिहरि नरेशकुल, जनमीयह तुबतियहुलसि १
दोहा-तासों तेरो होयगो, सुखप्रद प्रथम विवाह ॥
वीरभद्र यह तेहि उदर, वंश इग्यरहे माह ॥९७॥
जनमि देयगो तुमहि अति, परमप्रमोद विख्यात ॥
तेजवंत क्षिति छाय है यश अनंत अवदात ॥९८॥
समय विजय करसिंहतो, भो जयसिंह भुआल ॥
गंग लियो अगवान जेहि, तनु त्यागनके काल ॥९९॥
प्रगट भयो ताके तनय, हंस जो कह्यो कबीर ॥
विश्वनाथ तेहि नामभो, परमयशी रणधीर ॥१००॥
रघुपति भक्त अनन्य अति, अरु ब्रह्मण्य शरण्य ॥
अग्रगण्य क्षिति नृपनमें, तेग त्याग जेहिं धन्य ॥ १ ॥
तेहि आदिक गुण तेज यश, औरहु अमित चरित्र ॥
मैं विचित्र वर्णन कियो, ग्रंथ सोपरमपवित्र ॥ २ ॥
देखहिं श्रद्धावान जे, होवैं मनुज सुजान ॥
औरहु करहुँ बखान कछु, निजमतिके अनुमान ॥ ३ ॥
रानी सुवचन कुँवरिभै, पुरी उचहरा माहिं ॥
सुता भई शिवराज नृप, व्याहिगई तेहि काहिं ॥ ४ ॥
पठ्यो भागवत ताहिमें, दृढ़भो तेहिं विश्वास ॥
गुण यश अनुपम तासुभे, किय जो कबीर प्रकाश ॥ ५ ॥
विश्वनाथ नरनाथकी, तिय सों अति अभिराम ॥
कुँवरि सुभद्रा नाम जेहिं, सरिस सुभद्रा आम ॥ ६ ॥
( ६८४ ) बघेलवंशवर्णन ।
छप्पय-वीरभद्र सुत रामभूपको हंस सुहायो ॥
श्रीकबीर आगम निदेश निजग्रन्थहिं गायो ॥
विश्वनाथ तेहिं तीय गर्भ जबते सो आयो ॥
तबते बाँधवदेश धर्म परमानँद छायो ॥
कहुँ रह्यो न अधरम लेश क्षिति बिन कलेश पुर जन भयों
कलि वेश छयो कृतयुतधरम सतयुगलेशसो कहि दयों १
दोहा-रींवा घर घर सब प्रजा, सुखभरि करत उच्चार ॥
विश्वनाथके होय सुत, तौ धनि जन्म हमार ॥ ७ ॥
परमहंस जो ऋषभदेवसम । चतुरदास जेहि नाम शमन भ्रम ॥
फिरतरहे रींवापुरमाहीं । रामभजनमें मग्न सदाहीं ॥
डोलत मग औरही मुखबोलैं । निज हियकोअंतर नहिंखोलैं ॥
वर्षाऋतु धारैं शिरवर्षा । जाड़े जलमें बसैं सहर्षा ॥
ग्रीषम तपत उपलमें सोवैं । प्रेमेते हँसैं कहूं क्षण रोवैं ॥
नृप रघुराज सुतासु चरित्रा । भक्तमालमें रच्यो पवित्रा ॥
परमहंस सो सहज सुभाये । सुविश्वनाथ जन्मदिन आये ॥
लगे बजावन मुदित नगारा । कहि मुख हंस लेतु अवतारां ॥
दोहा-यह हवाल जयासह नृप,मनि सुनि त्यों पितु मात ॥
क्षण क्षण अति हरषातभे, हियमें सो न समात ॥८॥
अष्टादशसै असीको, साल सुकातिक मास ॥
कृष्णपक्ष तिथि चौथ शुभ,वासरदानि हुलास॥ ९ ॥
वीरभद्र नृप हंसस्वरूपा । भयो भूप रघुराज अनूपा ॥
कृष्णचंद्रको प्रिय अधिकारी । शर्मद धरा धर्म धुरधारी ॥
नाम भागवतदास दुलारा । करहिं मातु पितु सदा उचारा ॥
बालहिते भो ज्ञाननिधाना । भक्तिवानं पूजक भगवाना ॥
कछुदिनमें जननी मतिवारी । तनु तजि पुरवैकुंठ सिधारी ॥
पिता पितामह निकट सकारे । लैनित जाहिं खेलावन वारे ॥
तिनसों कहि कहि सुंदर वानी । कथै ज्ञान मानहु बड़ ज्ञानी ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६८५ )
जगत शरीर अनित्यहि जानो । मरत सो जीव नित्य ध्रुव मानो ॥
अजर अमर तेहि गावत वेदा । वृथा करत तेहि हित नरखेदा ॥
दोहा-सुनि सुनि कहे प्रसन्न मन, ते अति हिय हर्षात ॥
हैं ये पुरुष पुरानकोउ, पाल रूप दर्शात ॥ ११० ॥
कछु दिनमें पुनि जाय प्रयागा । नृप जयसिंह तुरत तनु त्यागा ॥
श्रीविश्वनाथ राज पद पायो । रघुराजहु युवराज कहायो ॥
रहे उर्मिलादास सुसंता । भक्त अनन्द उर्मिलाकंता ॥
चलि चलि तिनके आश्रम माहीं । दर्शन तिनको करै सदाहीं ॥
मंत्र लेनको बड़े उमाहा । विनय कियो तिनसों सउछाहा ॥
प्रभु मोहिं मंत्र कृपाकरिं दीजै । मेरो जन्म सफल जगकीजै ॥
नाथ कह्यो तबअति हर्षाई । मेरे रूप संत यक आई ॥
देहैं तोहिं मंत्र सहुलासा । ह्वैहै सिगरे जगत् प्रकासा ॥
दोहा-तोहिं देनको मंत्र मोहिं, है नहिं लखन नियोग ॥
मेटिहैं तुव भव सोग सोई, ध्रुवलखिहैं सब लोग १॥
छंद-स्वामि मुकुंदाचार्य्य शिष्य यक संत रह्यो अभिरामा॥
नाम जासु लक्ष्मी प्रपन्न ढिग विश्वनाथ निष्कामा ॥
मंत्र लेनकी इच्छा गुणि मन श्रीरघुराजहि केरो ॥
भाषि गयो भूपतिसों निज गुरु भक्ति प्रभाव घनेरो १॥
आश्रम परम मनोहर तिनको ब्रह्मशिला तट गंगा ॥
प्रियादास जे गुरू आपके तिनको रह सतसंगा ॥
भक्ति ग्रंथ पठे तिनके बहु वाल्मीकि रामायन ॥
श्रीभागवत भागवत पूरे पढ़त निरंतर चायन ॥ २ ॥
लायक गुरू विशेष होनेते नरनायक सुत केरे ॥
आयसु होय बोलिलै आऊं ऐहैं विनती मेरे ॥
विश्वनाथ कह आप सरिस शिष जिनके जगत सोहाहीं
जो कहिसकै महामहिमा तिन कौंहै अस महि माहीं॥
श्रीराना जवानसिंह जासों लियो मंत्र उपदेशू ॥
( ६८६ ) बघेलवंशवर्णन ।
ऐसे शिष्य आप जिनकेहैं तेतो संत विशेशू ॥
जौलौं स्वामिहिं इतै न लावो तालौं मम सुतकाहीं।
भक्तिभेद तुम्हहीं दरशावो करी सुकृपा डरमाहीं ॥४॥
पुनि सुत श्रीरघुराज नामको एक बाग लगवायेो ॥
लक्ष्मण बाग सुनाम तासुको युत अनुराग धरायो ॥
अति उतंग आयत विचित्र हरि मंदिर यक अभिरामा॥
निरखत प्रद मुद दाम जननको बनवायेो तेहिं ठामा५॥
श्रीरघुराज सुदिवस माँहँ पुनि उर उछाह अति धारी॥
थापित किय सिय राम लषणकी मूरति तहँ मनहारी॥
औरहु अमित देवको प्रमुदित सादर तहँ बैठायो ॥
दान महान द्विजन दै संतन करि सत्कार सोहायो ६॥
विश्वनाथ पितु पद शिरधरि पुनि विनयकियोकर जोरी
पूरणभो प्रसाद यह तिहरे अब यह इच्छा मोरी ॥
पठइय प्रभु लक्ष्मी प्रपन्नको ब्रह्मशिलामें जाई ॥ ७ ॥
बोलिलै आवैं सपदि स्वामिको लेहुं मंत्र हरषाई ॥
बैन सुनत सुतकेँ सचैन है विश्वनाथ नरनाथा ॥
कह लक्ष्मी प्रपन्नसों, सादर जोरे दोऊ हाथा ॥
ब्रह्मशिला सुरसरि समीप जहँ स्वामि मुकुंदाचारी ॥
वास करत तुम जाय आशु तहँ लावहु तिन्हें सुखारी ८॥
दोहा-महाराज विश्वनाथके, सुनत वचन सुख पाय ॥
द्रुत लक्ष्मीपरपन्न तब, ब्रह्मशिलागो धाय ॥ १२ ॥
प्रभु ढिग चलि करि दंड प्रणामा । कुशल पूँछि पायो सुखधामा ॥
विनय कियो पुनि दोउ कर जोरी । पुरवहु नाथ कामना मोरी ॥
बांधवेश विश्वनाथ नरेशा । रीवाँ रजधानी जेहिं वेशा ॥
राम अनन्य भक्त जगबीनो । राम परत्व ग्रंथ बहु कीनों ॥
मियादास भे संत महाना । तासु शिष्य सो विदित जहाना ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६८७ )
भांक ग्रंथ ते बहुत बनाये । ते सब आप वदन निज गाये ॥
सो विशुनाथ तनय मतिवाना । है रघुराजसिंह जग जाना ॥
आप सों मंत्र लेनके हेतू । कीन्हे प्रण मन कृपानिकेतू ॥
दोहा-ताहि समाश्रय कीजिये, चलि रीवामें नाथ ॥
प्रभु कह मैं नहिं जाहुँ कहुँ, तजि तट सुरसरि पाथ॥१३॥
यह थलु जो विहाय उत जैहौं । तौ अब परममोद नहिं पैहौं ॥
किय पुनि विनय सेव बहु ठानी । नाथ कह्यो पुनि सोई वानी ॥
सुनि लक्ष्मीप्रसन्न पुनि बोल्यो । निज अंतरको अंतर खोल्यो ॥
जो प्रभु रींवानगर न जै हैं। तौ सति मोहिं जिवत नहिं पै हैं ॥
सुनिहँसिकै कह दीनदयाला । जो अस तेरो अहै हवाला ॥
तौ अब आसु सुदिवंस विचारी । तहां जानकी करैं तयारी ॥
सुनि लक्ष्मी प्रपन्न हरषाई । गणक बोलि द्रुत सुदिन शोधाई ॥
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( ६८८ ) बघेलवंशवर्णन ।
तीरथ चित्रकूट जे नाना । तहां पठै करि द्रव्य महाना ॥
सविधि कियो साधुन सत्कारा । ते सब जय जय किये अपारा ॥
लियो मन्त्र जबते युत प्रीती । तबते चलन लग्यो यह रीती ॥
दोहा-पाठ गजेंद्रहि मोक्ष अरु, मूल रमायण ख्यात ॥
करि नारायण कवचको, पाठ उठैं परभात ॥ १६ ॥
पण्डित जे नव कृष्ण निबेरे । बसनहार कलकत्ता केरे ॥
तिनहिं लाटसों कहि बोलवायो । विश्वनाथ नरनाथ सोहायो ॥
सौंपिदियो निज सुत रघुराजै । विद्या सुखद पढ़ावन काजै ॥
तिनसों श्रीरघुराज सुजाना । अङ्गरेजी पढ़ि बहु सुख माना ॥
मुग्धबोध व्याकरण विशाला । पुनि पढ़ि लियो थोरही काला ॥
फेरि अयोध्यावासि महन्ता । जग जाहिर रामानुज सन्ता ॥
सौंप्यो तिन्हें पढ़ावन हेतू । नृप विश्वनाथ धर्मको सेतू ॥
तिनसों वाल्मीकि रामायन । श्रीरघुराज पढ़यो अति चायन ॥
दोहा-सवालाख श्लोक जेहिं, महाभारत विख्यात ॥
विन श्रम ताको पढ़िलियो, कहि सबसों हरषात ॥१७॥
करि मज्जन विधियुत श्रीकन्ता । पूजन ठानि रोज सुखवन्ता ॥
वाल्मीकि रामायण सादर । श्रीभागवत सुनावत सुखकर ॥
वाल्मीकि भागवत विशोका । प्रति अध्याय जिते श्लोका ॥
जेहिं आगे श्लोक जो होई । पूंछे बुधहि बतावत सोई ॥
महाभारतमें जे इतिहासा । ते पुस्तक बिन करत प्रकासा ॥
अस सब भांति अलौकिक करणी । श्रीरघुराज केरि कवि वरणी ॥
गति जो कविता रचन नवीनी । बालहिंते विरंचि तेहिं दीनी ॥
संस्कृत और भाषहू केरी । कविता बहु विधि रची घनेरी ॥
दोहा-विनयमालको प्रथम रचि, रुक्मिणि परिणय फेरि ॥
पितुहिं सुनायो ते भये, अति प्रसन्न मुख टेरि ॥ १८ ॥
चित्रकूट गमनत भये, एक समय रघुराज ॥
रच्यो तहां सुंदर शतक, हनुमतचरित दराज ॥ १९ ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६८९ )
जो कोउ वांचत पत्रिका, देखि पिठौता तासु ॥
वांचिआशु सबसों कहत, सुनि सब लहत हुलासु १२०
लिखन शक्ति लखिनाथकी, विदित लिखारी जोउ ॥
दीखन नृप अस चखन कहि, सिखन चहतहै सोउ २१॥
कहूं चढ़ैती तुरंगकी, दरशावत सबकाहिं ॥
कहूं मतंग सवारहै, सुरपति सरिस सोहाहिं ॥ २२ ॥
कहूं दुनाली धनुष लै, गोली तीर चलाय ॥
हनै निसाना रोपिकै, तुरतहि देहिं गिराय ॥ २३ ॥
कहूं तेगको घालिकै, करहिं टूक चौरंग ॥
सुनि लखि पितु विशुनाथ नृप, होत मनहिं मन दंग २४॥
कहुँ वन जाय अहेरको, मारिशेर वनजीव ॥
देखरावाहिं निज तातको, होहिं ते खुशी अतीव ॥२५॥
बहु वनराजनको हन्यो, वनहिं सिंह रघुराज ॥
ते दराज विस्तर भयहि, वर्ण्यो नहीं समाज ॥२६॥
कवित्त ।
एक समय राना श्रीजमानसिंह हिंद भान गया करिवेको कीन्ह्यो देश या पयानहै ॥
जाय विश्वनाथ चित्रकूट मुलाकात करि रींवहि लेवायलाये करि सन्मानहै ॥
भाई लछिमनसिंह कन्या तिन्हें व्याहि दीन्ह्यो चीन्ह्यो विश्वनाथै भलोभक्तभगवानहै
तासु सुत रघुराज तिलक चढ़ायआसु जातभे हुलास भरि उदैपुर थानहै ॥ १ ॥
दोहा-कछु दिन माहि जमानसिंह, गे वैकुंठ सिधारि ॥
रानाभो सरदारसिंह, तैउगे स्वर्ग पधारि ॥२७॥
भूपति भयो स्वरूपसिंह, तेग त्याग समरथ्य ॥
राज काजमें निपुण अति, चल्यो सुनीति सुपथ्य ॥२८॥
निज भगिनिनिके व्याह हित, करि संदेह मनमाह ॥
श्रीरघुराज सलाह करि, चलि ढिग पितु नरनाह ॥२९॥
महापात्र अजवेशको, खतलिखाय यहि भांति ॥
पठयो वेगि उदयपुरै, नृप सुत अति मुदमाति १३०॥
४४
(६९०) बघेलवंशवर्णन ।
आपसयान सुजान सुठि, को करिसकै बखान ॥
जहँकीजै अनुमान तहँ, हमहिं प्रमाण न आन ॥३१॥
विश्वनाथ नरनाथ अरु, युवराजहु रघुराज ॥
बरनिदेशअजबेश लहि, सुकविनको शिरताज ॥३२॥
स०-चैन भरो चल्यो ऐनते बेगि गयो अजबेश उदैपुरमाहीं॥
राना स्वरूप अनूप जो भूप सुन्यो श्रुति आयो इते तेहिं काहीं॥
सादर बोलि सुप्रेमते क्षेमको पूँछि कह्यो ढिग बैठो इहांहीं ॥
बैठि स्वनाथको पत्रसो हाथ दियो लिय माथते धारि तहांहीं
दोहा-श्रीस्वरूप राना सुघर, सुनि हवाल खत केर ॥
कह्यो सुकवि अजबेश सों, लहि प्रमोद उर ढेर ॥३३॥
लिख्यो जो सुता व्याहके हेतू । सो हम अवशि बांधि हैं नेतू ॥
पै राना जवानसिंह रूरे । गया करनगे जब सुख पूरे ॥
तब रींवा गवने सउछाहा । तिनको तहां होत भो व्याहा ॥
राजकुवँर रघुराज सुहायो । ताको तहँ ते तिलक चढ़ायो ॥
बीतिगये बहु दिवस सुजाना । इतको ते नहिं कियो पयाना ॥
सो अब ऐसी करहु उपाई । जाते इहौ वहौ सधिजाई ॥
महापात्र आपहु लिखि पाती । पठवहु द्रुत आवहिं जेहिं भाती ॥
हमहु लिखावतहैं खत आसू । आवहिं राजकुँवर सहलासू ॥
दोहा-काज होय रघुराज इत, हमरहु कारज होय ॥
जहँ को संमत देहिंगे, तहँको करबै सोय ॥३४॥
महापात्र सुनि भल कहि दीन्ह्यो । नाथ विचार भलो यह कीन्ह्यों ॥
अस कहि बेगि सुकवि अजवेशा । पत्र लिखतभो इतको वेशा ॥
रानहु इतको खत लिखवायो । बोलि पठायो सो इत आयो ॥
खत सुनि विश्वनाथ नरनाथा । सुतसों कह्यो मानि सुख गाथा ॥
रानाको यह खत सुनिलेहू । लियो सो करहु बेगि युत नेहू ॥
तब रघुराजहु खत सुनि सोई । कहत भयो पितुसों मुद मोई ॥
यह हवाल मैं सब सुनि लीन्ह्यो । मोहिं बोलावनको लिखि दीन्ह्योः ॥
सो जस प्रभु मोहिं देहिं रजाई । सोइ करों सोइ नीक जनाई ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६९१ )
दोहा-विश्वनाथ नरनाथ तब, कह्यो भरे उत्साह ॥
जाहु उदयपुर ब्याह हित, मेरो इहै सलाह ॥ ३५ ॥
बोलि ज्योतिषिन तुरत पुनि, गमनन सुदिन बनाय ॥
कह्यो सुवनसों यह भली, साइत दियो बताय ॥ ३६ ॥
सुनि रघुराज कह्यो हर्षाई । दीजै सब तदबीर कराई ॥
कौन देवान जान सँग योगू । ताकहँ दीजै नाथ नियोगू ॥
कौन कौन सरदार सुजाना । मेरे सँगमें करहिं पयाना ॥
नाथ कृपा करि सादर सोई । देहिंबताय सिद्धि सब होई ॥
भाष्यो महाराज सुख पाई । सभा सदनको सपदि सुनाई ॥
बीर धीर अरु होय उदारा । राज काजमें चतुर अपारा ॥
धर्मवान पूजक भगवाना । द्विज साधुनमें प्रीति महाना ॥
स्वामिहि मानै प्राण समाना । ये लक्षणहैं विदित देवाना ॥
दोहा-ते लक्षणयुत सांच अब, दीनबंधु तुव पास ॥
लेहुसाथ तिनको अवशि, तिनते सकल सुपास ॥ ३७ ॥
हैं सरदार सुजान सब, सावधान तुव सेव ॥
तिनको सबको लेहु सँग, जे जानत रणभेव ॥ ३८ ॥
सुनि रघुराज जनकके बैना । दीनबंधु कहँ बोलि सचैना ॥
पुनि सरदारन निकट बोलाई । चतुरंगिणी चमू सजवाई ॥
सैनप दीनबंधुको करिकै । व्याह पोशाक किये सुखभारिकै ॥
बाजिरहे चहुँ ओर नगारा । बंदीजन वर विरद उचारा ॥
लहि रघुराज प्रमोद अपारा । भयो उतंग मतंग सवारा ॥
औरहु सखा वृद्ध सरदारा । चढ़ि चढ़ि हय गय रथनमँझारा ॥
हरि गुरु गणपति हनुमतकाहीं । सुमिरि सुमिरि सब निज मनमाहीं ॥
गहि गहि अस्त्र शस्त्र निजहाथा । गमनत भये सबै यक साथा ॥
दोहा-जे मगमें भूपति परे, तिनसों लहि सत्कार ॥
निकट उदयपुर जब गये, राना सुन्यो उदार ॥ ३९ ॥