कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ६८९ )
जो कोउ वांचत पत्रिका, देखि पिठौता तासु ॥
वांचिआशु सबसों कहत, सुनि सब लहत हुलासु १२०
लिखन शक्ति लखिनाथकी, विदित लिखारी जोउ ॥
दीखन नृप अस चखन कहि, सिखन चहतहै सोउ २१॥
कहूं चढ़ैती तुरंगकी, दरशावत सबकाहिं ॥
कहूं मतंग सवारहै, सुरपति सरिस सोहाहिं ॥ २२ ॥
कहूं दुनाली धनुष लै, गोली तीर चलाय ॥
हनै निसाना रोपिकै, तुरतहि देहिं गिराय ॥ २३ ॥
कहूं तेगको घालिकै, करहिं टूक चौरंग ॥
सुनि लखि पितु विशुनाथ नृप, होत मनहिं मन दंग २४॥
कहुँ वन जाय अहेरको, मारिशेर वनजीव ॥
देखरावाहिं निज तातको, होहिं ते खुशी अतीव ॥२५॥
बहु वनराजनको हन्यो, वनहिं सिंह रघुराज ॥
ते दराज विस्तर भयहि, वर्ण्यो नहीं समाज ॥२६॥
कवित्त ।
एक समय राना श्रीजमानसिंह हिंद भान गया करिवेको कीन्ह्यो देश या पयानहै ॥
जाय विश्वनाथ चित्रकूट मुलाकात करि रींवहि लेवायलाये करि सन्मानहै ॥
भाई लछिमनसिंह कन्या तिन्हें व्याहि दीन्ह्यो चीन्ह्यो विश्वनाथै भलोभक्तभगवानहै
तासु सुत रघुराज तिलक चढ़ायआसु जातभे हुलास भरि उदैपुर थानहै ॥ १ ॥
दोहा-कछु दिन माहि जमानसिंह, गे वैकुंठ सिधारि ॥
रानाभो सरदारसिंह, तैउगे स्वर्ग पधारि ॥२७॥
भूपति भयो स्वरूपसिंह, तेग त्याग समरथ्य ॥
राज काजमें निपुण अति, चल्यो सुनीति सुपथ्य ॥२८॥
निज भगिनिनिके व्याह हित, करि संदेह मनमाह ॥
श्रीरघुराज सलाह करि, चलि ढिग पितु नरनाह ॥२९॥
महापात्र अजवेशको, खतलिखाय यहि भांति ॥
पठयो वेगि उदयपुरै, नृप सुत अति मुदमाति १३०॥
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