कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६८६ ) बघेलवंशवर्णन ।
ऐसे शिष्य आप जिनकेहैं तेतो संत विशेशू ॥
जौलौं स्वामिहिं इतै न लावो तालौं मम सुतकाहीं।
भक्तिभेद तुम्हहीं दरशावो करी सुकृपा डरमाहीं ॥४॥
पुनि सुत श्रीरघुराज नामको एक बाग लगवायेो ॥
लक्ष्मण बाग सुनाम तासुको युत अनुराग धरायो ॥
अति उतंग आयत विचित्र हरि मंदिर यक अभिरामा॥
निरखत प्रद मुद दाम जननको बनवायेो तेहिं ठामा५॥
श्रीरघुराज सुदिवस माँहँ पुनि उर उछाह अति धारी॥
थापित किय सिय राम लषणकी मूरति तहँ मनहारी॥
औरहु अमित देवको प्रमुदित सादर तहँ बैठायो ॥
दान महान द्विजन दै संतन करि सत्कार सोहायो ६॥
विश्वनाथ पितु पद शिरधरि पुनि विनयकियोकर जोरी
पूरणभो प्रसाद यह तिहरे अब यह इच्छा मोरी ॥
पठइय प्रभु लक्ष्मी प्रपन्नको ब्रह्मशिलामें जाई ॥ ७ ॥
बोलिलै आवैं सपदि स्वामिको लेहुं मंत्र हरषाई ॥
बैन सुनत सुतकेँ सचैन है विश्वनाथ नरनाथा ॥
कह लक्ष्मी प्रपन्नसों, सादर जोरे दोऊ हाथा ॥
ब्रह्मशिला सुरसरि समीप जहँ स्वामि मुकुंदाचारी ॥
वास करत तुम जाय आशु तहँ लावहु तिन्हें सुखारी ८॥
दोहा-महाराज विश्वनाथके, सुनत वचन सुख पाय ॥
द्रुत लक्ष्मीपरपन्न तब, ब्रह्मशिलागो धाय ॥ १२ ॥
प्रभु ढिग चलि करि दंड प्रणामा । कुशल पूँछि पायो सुखधामा ॥
विनय कियो पुनि दोउ कर जोरी । पुरवहु नाथ कामना मोरी ॥
बांधवेश विश्वनाथ नरेशा । रीवाँ रजधानी जेहिं वेशा ॥
राम अनन्य भक्त जगबीनो । राम परत्व ग्रंथ बहु कीनों ॥
मियादास भे संत महाना । तासु शिष्य सो विदित जहाना ॥