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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 718

(६९०) बघेलवंशवर्णन ।
आपसयान सुजान सुठि, को करिसकै बखान ॥
जहँकीजै अनुमान तहँ, हमहिं प्रमाण न आन ॥३१॥
विश्वनाथ नरनाथ अरु, युवराजहु रघुराज ॥
बरनिदेशअजबेश लहि, सुकविनको शिरताज ॥३२॥
स०-चैन भरो चल्यो ऐनते बेगि गयो अजबेश उदैपुरमाहीं॥
राना स्वरूप अनूप जो भूप सुन्यो श्रुति आयो इते तेहिं काहीं॥
सादर बोलि सुप्रेमते क्षेमको पूँछि कह्यो ढिग बैठो इहांहीं ॥
बैठि स्वनाथको पत्रसो हाथ दियो लिय माथते धारि तहांहीं
दोहा-श्रीस्वरूप राना सुघर, सुनि हवाल खत केर ॥
कह्यो सुकवि अजबेश सों, लहि प्रमोद उर ढेर ॥३३॥
लिख्यो जो सुता व्याहके हेतू । सो हम अवशि बांधि हैं नेतू ॥
पै राना जवानसिंह रूरे । गया करनगे जब सुख पूरे ॥
तब रींवा गवने सउछाहा । तिनको तहां होत भो व्याहा ॥
राजकुवँर रघुराज सुहायो । ताको तहँ ते तिलक चढ़ायो ॥
बीतिगये बहु दिवस सुजाना । इतको ते नहिं कियो पयाना ॥
सो अब ऐसी करहु उपाई । जाते इहौ वहौ सधिजाई ॥
महापात्र आपहु लिखि पाती । पठवहु द्रुत आवहिं जेहिं भाती ॥
हमहु लिखावतहैं खत आसू । आवहिं राजकुँवर सहलासू ॥
दोहा-काज होय रघुराज इत, हमरहु कारज होय ॥
जहँ को संमत देहिंगे, तहँको करबै सोय ॥३४॥
महापात्र सुनि भल कहि दीन्ह्यो । नाथ विचार भलो यह कीन्ह्यों ॥
अस कहि बेगि सुकवि अजवेशा । पत्र लिखतभो इतको वेशा ॥
रानहु इतको खत लिखवायो । बोलि पठायो सो इत आयो ॥
खत सुनि विश्वनाथ नरनाथा । सुतसों कह्यो मानि सुख गाथा ॥
रानाको यह खत सुनिलेहू । लियो सो करहु बेगि युत नेहू ॥
तब रघुराजहु खत सुनि सोई । कहत भयो पितुसों मुद मोई ॥
यह हवाल मैं सब सुनि लीन्ह्यो । मोहिं बोलावनको लिखि दीन्ह्योः ॥
सो जस प्रभु मोहिं देहिं रजाई । सोइ करों सोइ नीक जनाई ॥