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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 716

( ६८८ ) बघेलवंशवर्णन ।
तीरथ चित्रकूट जे नाना । तहां पठै करि द्रव्य महाना ॥
सविधि कियो साधुन सत्कारा । ते सब जय जय किये अपारा ॥
लियो मन्त्र जबते युत प्रीती । तबते चलन लग्यो यह रीती ॥
दोहा-पाठ गजेंद्रहि मोक्ष अरु, मूल रमायण ख्यात ॥
करि नारायण कवचको, पाठ उठैं परभात ॥ १६ ॥
पण्डित जे नव कृष्ण निबेरे । बसनहार कलकत्ता केरे ॥
तिनहिं लाटसों कहि बोलवायो । विश्वनाथ नरनाथ सोहायो ॥
सौंपिदियो निज सुत रघुराजै । विद्या सुखद पढ़ावन काजै ॥
तिनसों श्रीरघुराज सुजाना । अङ्गरेजी पढ़ि बहु सुख माना ॥
मुग्धबोध व्याकरण विशाला । पुनि पढ़ि लियो थोरही काला ॥
फेरि अयोध्यावासि महन्ता । जग जाहिर रामानुज सन्ता ॥
सौंप्यो तिन्हें पढ़ावन हेतू । नृप विश्वनाथ धर्मको सेतू ॥
तिनसों वाल्मीकि रामायन । श्रीरघुराज पढ़यो अति चायन ॥
दोहा-सवालाख श्लोक जेहिं, महाभारत विख्यात ॥
विन श्रम ताको पढ़िलियो, कहि सबसों हरषात ॥१७॥
करि मज्जन विधियुत श्रीकन्ता । पूजन ठानि रोज सुखवन्ता ॥
वाल्मीकि रामायण सादर । श्रीभागवत सुनावत सुखकर ॥
वाल्मीकि भागवत विशोका । प्रति अध्याय जिते श्लोका ॥
जेहिं आगे श्लोक जो होई । पूंछे बुधहि बतावत सोई ॥
महाभारतमें जे इतिहासा । ते पुस्तक बिन करत प्रकासा ॥
अस सब भांति अलौकिक करणी । श्रीरघुराज केरि कवि वरणी ॥
गति जो कविता रचन नवीनी । बालहिंते विरंचि तेहिं दीनी ॥
संस्कृत और भाषहू केरी । कविता बहु विधि रची घनेरी ॥
दोहा-विनयमालको प्रथम रचि, रुक्मिणि परिणय फेरि ॥
पितुहिं सुनायो ते भये, अति प्रसन्न मुख टेरि ॥ १८ ॥
चित्रकूट गमनत भये, एक समय रघुराज ॥
रच्यो तहां सुंदर शतक, हनुमतचरित दराज ॥ १९ ॥