कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ६८५ )
जगत शरीर अनित्यहि जानो । मरत सो जीव नित्य ध्रुव मानो ॥
अजर अमर तेहि गावत वेदा । वृथा करत तेहि हित नरखेदा ॥
दोहा-सुनि सुनि कहे प्रसन्न मन, ते अति हिय हर्षात ॥
हैं ये पुरुष पुरानकोउ, पाल रूप दर्शात ॥ ११० ॥
कछु दिनमें पुनि जाय प्रयागा । नृप जयसिंह तुरत तनु त्यागा ॥
श्रीविश्वनाथ राज पद पायो । रघुराजहु युवराज कहायो ॥
रहे उर्मिलादास सुसंता । भक्त अनन्द उर्मिलाकंता ॥
चलि चलि तिनके आश्रम माहीं । दर्शन तिनको करै सदाहीं ॥
मंत्र लेनको बड़े उमाहा । विनय कियो तिनसों सउछाहा ॥
प्रभु मोहिं मंत्र कृपाकरिं दीजै । मेरो जन्म सफल जगकीजै ॥
नाथ कह्यो तबअति हर्षाई । मेरे रूप संत यक आई ॥
देहैं तोहिं मंत्र सहुलासा । ह्वैहै सिगरे जगत् प्रकासा ॥
दोहा-तोहिं देनको मंत्र मोहिं, है नहिं लखन नियोग ॥
मेटिहैं तुव भव सोग सोई, ध्रुवलखिहैं सब लोग १॥
छंद-स्वामि मुकुंदाचार्य्य शिष्य यक संत रह्यो अभिरामा॥
नाम जासु लक्ष्मी प्रपन्न ढिग विश्वनाथ निष्कामा ॥
मंत्र लेनकी इच्छा गुणि मन श्रीरघुराजहि केरो ॥
भाषि गयो भूपतिसों निज गुरु भक्ति प्रभाव घनेरो १॥
आश्रम परम मनोहर तिनको ब्रह्मशिला तट गंगा ॥
प्रियादास जे गुरू आपके तिनको रह सतसंगा ॥
भक्ति ग्रंथ पठे तिनके बहु वाल्मीकि रामायन ॥
श्रीभागवत भागवत पूरे पढ़त निरंतर चायन ॥ २ ॥
लायक गुरू विशेष होनेते नरनायक सुत केरे ॥
आयसु होय बोलिलै आऊं ऐहैं विनती मेरे ॥
विश्वनाथ कह आप सरिस शिष जिनके जगत सोहाहीं
जो कहिसकै महामहिमा तिन कौंहै अस महि माहीं॥
श्रीराना जवानसिंह जासों लियो मंत्र उपदेशू ॥