कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६८४ ) बघेलवंशवर्णन ।
छप्पय-वीरभद्र सुत रामभूपको हंस सुहायो ॥
श्रीकबीर आगम निदेश निजग्रन्थहिं गायो ॥
विश्वनाथ तेहिं तीय गर्भ जबते सो आयो ॥
तबते बाँधवदेश धर्म परमानँद छायो ॥
कहुँ रह्यो न अधरम लेश क्षिति बिन कलेश पुर जन भयों
कलि वेश छयो कृतयुतधरम सतयुगलेशसो कहि दयों १
दोहा-रींवा घर घर सब प्रजा, सुखभरि करत उच्चार ॥
विश्वनाथके होय सुत, तौ धनि जन्म हमार ॥ ७ ॥
परमहंस जो ऋषभदेवसम । चतुरदास जेहि नाम शमन भ्रम ॥
फिरतरहे रींवापुरमाहीं । रामभजनमें मग्न सदाहीं ॥
डोलत मग औरही मुखबोलैं । निज हियकोअंतर नहिंखोलैं ॥
वर्षाऋतु धारैं शिरवर्षा । जाड़े जलमें बसैं सहर्षा ॥
ग्रीषम तपत उपलमें सोवैं । प्रेमेते हँसैं कहूं क्षण रोवैं ॥
नृप रघुराज सुतासु चरित्रा । भक्तमालमें रच्यो पवित्रा ॥
परमहंस सो सहज सुभाये । सुविश्वनाथ जन्मदिन आये ॥
लगे बजावन मुदित नगारा । कहि मुख हंस लेतु अवतारां ॥
दोहा-यह हवाल जयासह नृप,मनि सुनि त्यों पितु मात ॥
क्षण क्षण अति हरषातभे, हियमें सो न समात ॥८॥
अष्टादशसै असीको, साल सुकातिक मास ॥
कृष्णपक्ष तिथि चौथ शुभ,वासरदानि हुलास॥ ९ ॥
वीरभद्र नृप हंसस्वरूपा । भयो भूप रघुराज अनूपा ॥
कृष्णचंद्रको प्रिय अधिकारी । शर्मद धरा धर्म धुरधारी ॥
नाम भागवतदास दुलारा । करहिं मातु पितु सदा उचारा ॥
बालहिते भो ज्ञाननिधाना । भक्तिवानं पूजक भगवाना ॥
कछुदिनमें जननी मतिवारी । तनु तजि पुरवैकुंठ सिधारी ॥
पिता पितामह निकट सकारे । लैनित जाहिं खेलावन वारे ॥
तिनसों कहि कहि सुंदर वानी । कथै ज्ञान मानहु बड़ ज्ञानी ॥