कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछंद्-कह्यो कबीर भविष्य राम नृप सुनि सुखराशी ॥
हंसिनि सुवचन कुँवरि रानि तू हंस प्रकाशी ॥
वीरभद्र तुव सुतहु हंस: नित हरि ढिग वासी ॥
गुणगंभीर अति वीर धीर यश सुयश विलासी ॥
जब दशै वंश अवतंस नृप, प्रगट होयहै तू अवशि ॥
तब सति परिहरि नरेशकुल, जनमीयह तुबतियहुलसि १
दोहा-तासों तेरो होयगो, सुखप्रद प्रथम विवाह ॥
वीरभद्र यह तेहि उदर, वंश इग्यरहे माह ॥९७॥
जनमि देयगो तुमहि अति, परमप्रमोद विख्यात ॥
तेजवंत क्षिति छाय है यश अनंत अवदात ॥९८॥
समय विजय करसिंहतो, भो जयसिंह भुआल ॥
गंग लियो अगवान जेहि, तनु त्यागनके काल ॥९९॥
प्रगट भयो ताके तनय, हंस जो कह्यो कबीर ॥
विश्वनाथ तेहि नामभो, परमयशी रणधीर ॥१००॥
रघुपति भक्त अनन्य अति, अरु ब्रह्मण्य शरण्य ॥
अग्रगण्य क्षिति नृपनमें, तेग त्याग जेहिं धन्य ॥ १ ॥
तेहि आदिक गुण तेज यश, औरहु अमित चरित्र ॥
मैं विचित्र वर्णन कियो, ग्रंथ सोपरमपवित्र ॥ २ ॥
देखहिं श्रद्धावान जे, होवैं मनुज सुजान ॥
औरहु करहुँ बखान कछु, निजमतिके अनुमान ॥ ३ ॥
रानी सुवचन कुँवरिभै, पुरी उचहरा माहिं ॥
सुता भई शिवराज नृप, व्याहिगई तेहि काहिं ॥ ४ ॥
पठ्यो भागवत ताहिमें, दृढ़भो तेहिं विश्वास ॥
गुण यश अनुपम तासुभे, किय जो कबीर प्रकाश ॥ ५ ॥
विश्वनाथ नरनाथकी, तिय सों अति अभिराम ॥
कुँवरि सुभद्रा नाम जेहिं, सरिस सुभद्रा आम ॥ ६ ॥