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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 709

नापितसेन स्वरूप धरि, हरि जिनके तनु माहिं ॥
तेल लगायो राम सो, कहियेकेहिं नृप काहिं ॥७३॥
वीरभद्र तेहि सुत भयो, वीरभद्र कर संत ॥
आगे वर्णौं औरहू, भये जे नृप मतिमंत ॥ ७४ ॥
वीरभद्र सुतविक्रमा-दित्य भयो अबदात ॥
नामहिंके अनुगुण भयो, जेहिं गुण जग विख्यात ॥७५॥
लीन्ह्यो जायरिझाय जो, निज करतूतिहि माहिं ॥
ब्रह्मके मारे मरिलह्यो, सोन देव पुर काहिं ॥ ७६ ॥
अमरसिंह ताको सुवन, सरिस अमरपति भोज ॥
रीवां रजधानी करी, सींवा यश अरु वोज ॥ ७७ ॥
दिल्लीको गमनत भयो, चुक्यौ खर्च मग माहिं ॥
लूटि दौलताबादको, गयो शाह ढिग पाहिं ॥ ७८ ॥
उमरावन चुगुली करी, शाह निकट द्रुत जाय ॥
बादशाह मान्यो नहीं, नृप पै खुशी बनाय ॥ ७९ ॥
अमरसिंह भूपालके, भो अनूपसिंह भूप ॥
भूपर जासु प्रताप यश, छायो परमअनूप ॥ ८० ॥
भावसिंह ताको तनय, भयो भानु सम भास ॥
दाता ज्ञाता वीरवर, ज्ञाता बुद्धि विलास ॥ ८१ ॥
जगन्नाथजी जायकै, मूर्त्ति लाय जगनाथ ॥
थापिव्यासके ग्रंथको, संच्यो भरि सुख गाथ ॥८२॥
राना घरमें व्याहभो, तहँते मूरति दोय ॥
लाये सरस्वति गरुड़की, थापित किय मुदमोय ॥८३॥
विप्रन दान महानदै, कीन्हे बहु सन्मान ॥
तिनके भे अनिरुद्ध सिंह, भूपति परम सुजान ॥ ८४ ॥
ताके भो अवधूतसिंह, जाहिर दान जहान ॥
ताके सुवन अजीतसिंह, दुवन अजीत महान ॥ ८५॥