कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६७८ ) बघेलवंशवर्णन ।
यह सुनि तब मैं अति हर्षाई । राजारामहिं कह्यो बुझाई ॥
द्वै है तुम्हरे दशयें वंसा । परमप्रकाशमान यक हंसा ॥
कथिहै सो मुख अनुभव वानी । मोर शब्द गहि है मुखमानी ॥
सोई तुव कुलको अवतंशा । बिजक ग्रंथको करी प्रशंसा ॥
ताको अर्थ अनूपम करि है । मम आश्रमहिं आय सुख भरि है ॥
यह सुनि रामभूप शिरनाई । करि प्रशंसा जनन सुनाई ॥
नंदपुराणिक तहँ सुख भीनी । करी दंडवत वंदना कीनी ॥
राजाराम महलमें जाई । रानीसों सब गयो जनाई ॥
दोहा-रानी सुवचन कुवँरिसों, किय यह विनय ललाम ॥
श्रीगुरुको लै आइये, महाराज निज धाम ॥ ६० ॥
श्रीकबीर गुरुको मुदित, सादर रामभुवाल ॥
लैआये निज भवनमें, करि बहु विनय रसाल ६१॥
कवित्त ।
रहे जहाँ आसन तहाँई श्रीकबीरजीको गुफा बनवायो प्रीतियुत राजारामहै ।
साज मँगवाय सब चौका कै कबीर शिष्य राजा अरु रानिहूंके कीन्ह्यो तेहिं ठामहै ।
औरो सब भूपके समीपी भये शिष्य सुखी पूजा जौन चढ़यों तहां अगणित दामहै ।
दियो भंडारा श्रीकबीर बोलि साधुनको जय जयरह्यो पूरि बांधवगढ़ धामहै ॥१॥
दोहा-युगल गाँउ अरुगाँउ प्रति, रुपयाएक चढ़ाइ ॥
दिय कागज लिखवायकै, रामभूप हर्षाय ॥ ६२ ॥
होय जो हमरे वंशमें, भूपति कोउ उदार ॥
लेय न कबहूं शपथ तेहि, अर्पन कियो हमार ॥ ६३ ॥
श्रीकबीरजी द्वै प्रसन्न अति । त्रिकालज्ञ पुनि कह्यो महामति ॥
औरहु कछु भविष्य मैं भाखों । सो तुम सति निज मन गुणिराखो ॥
दशयें वंश हंसको रूपा । तुम्हहीं प्रगट होहुगे भूपा ॥
सुवचन कुवँरि रानि तुव जोई । सो परिहार भूप घरहोई ॥
तोसों तासु होयगो व्याहा । हरि पद रति अति करी उछाहा ॥
ताके वीरभद्र सुत तेरो । जन्मिदेयगो मोद घनेरो ॥