कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 708, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६८० ) बघेलवंशवर्णन ।
छेंके रह्यो वर्ष सो बारा । खायो बोयो आम अपारा ॥
दुर्ग अटूट मानि सो हारा । लै सब सैना सपदि सिधारा ॥
वीरभानु वरवीर नरेशा । छीनिलियो दल लै निज देशा ॥
लै विलायती दल निज संगा । चलो हुमायूं सहित उमंगा ॥
इत अकबर यक दिवश उचारा । सुनिये बांधवनाह उदारा ॥
भई रामसिंह सँग माहीं । बैठतहौ नित भोजन काहीं ॥
हमको क्यों बैठावत नाहीं । नृप कहै आप खामिदै आहीं ॥
पूँछिलेहु मातासों जाई । पूंछयो सो सब दियो बताई ॥
दोहा-खङ्गचर्म लै हाथमें, सुनि अकबर सो हाल ॥
चल्यो कियो तिन संगमें, वीरभानु निज बाल६८॥
अकबरसों तहँ राम कह, कोस कोस करि वास ॥
चलिये दिल्लीनगरको, जुरै फौज अनयास ॥ ६९ ॥
जुरी चमू चतुरंग संग, अमित तुरंग मतंग ॥
रँगो रामसिंह जंगके, रंग अभंग उमंग ॥ ७० ॥
नातनको लिखवायो पानी । चारों नृप आये मुदमानी ॥
तिन सँग रामसिंह यशवाला । जातभयो भो जंग विशाला ॥
हन्योशेरको तहाँ हुमाऊ । दिल्ली तख्त बैठ युत चाऊ ॥
ईतै सुलेमैं राम सँहारी । दिल्लीको द्रुत गयो सिधारी ॥
ताकन तनय हेतु सुखधारी । चढ्यो हुमायूं ऊंची अटारी ॥
मोद मगनसों गिरिगो नीचै । होत भयो तुरंत वश मीचै ॥
तनय हुमायूं अकबर काहीं । बैठायो तब तख्तहिं माहीं ॥
वीरभानु जब तज्यो शरीरा । रामसिंह नृप भो मतिधीरा ॥
दोहा-दिल्लीको पुनि राम नृप, गये अकब्बर शाह ॥
कीन्ह्यो अति सन्मानसो, अकस मानि नरनाह॥७१॥
औचक मारनको गये, ते नृप रामहिं काहँ ॥
फिरे मानि विस्मय सबै, निरखि चारु चौबाहँ॥७२॥