कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 719, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ६९१ )
दोहा-विश्वनाथ नरनाथ तब, कह्यो भरे उत्साह ॥
जाहु उदयपुर ब्याह हित, मेरो इहै सलाह ॥ ३५ ॥
बोलि ज्योतिषिन तुरत पुनि, गमनन सुदिन बनाय ॥
कह्यो सुवनसों यह भली, साइत दियो बताय ॥ ३६ ॥
सुनि रघुराज कह्यो हर्षाई । दीजै सब तदबीर कराई ॥
कौन देवान जान सँग योगू । ताकहँ दीजै नाथ नियोगू ॥
कौन कौन सरदार सुजाना । मेरे सँगमें करहिं पयाना ॥
नाथ कृपा करि सादर सोई । देहिंबताय सिद्धि सब होई ॥
भाष्यो महाराज सुख पाई । सभा सदनको सपदि सुनाई ॥
बीर धीर अरु होय उदारा । राज काजमें चतुर अपारा ॥
धर्मवान पूजक भगवाना । द्विज साधुनमें प्रीति महाना ॥
स्वामिहि मानै प्राण समाना । ये लक्षणहैं विदित देवाना ॥
दोहा-ते लक्षणयुत सांच अब, दीनबंधु तुव पास ॥
लेहुसाथ तिनको अवशि, तिनते सकल सुपास ॥ ३७ ॥
हैं सरदार सुजान सब, सावधान तुव सेव ॥
तिनको सबको लेहु सँग, जे जानत रणभेव ॥ ३८ ॥
सुनि रघुराज जनकके बैना । दीनबंधु कहँ बोलि सचैना ॥
पुनि सरदारन निकट बोलाई । चतुरंगिणी चमू सजवाई ॥
सैनप दीनबंधुको करिकै । व्याह पोशाक किये सुखभारिकै ॥
बाजिरहे चहुँ ओर नगारा । बंदीजन वर विरद उचारा ॥
लहि रघुराज प्रमोद अपारा । भयो उतंग मतंग सवारा ॥
औरहु सखा वृद्ध सरदारा । चढ़ि चढ़ि हय गय रथनमँझारा ॥
हरि गुरु गणपति हनुमतकाहीं । सुमिरि सुमिरि सब निज मनमाहीं ॥
गहि गहि अस्त्र शस्त्र निजहाथा । गमनत भये सबै यक साथा ॥
दोहा-जे मगमें भूपति परे, तिनसों लहि सत्कार ॥
निकट उदयपुर जब गये, राना सुन्यो उदार ॥ ३९ ॥