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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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बघेलवंशवर्णन । ( ६७७ )
दोहा-सुनत वयन विरसिंह नृप, बोलि ज्योतिखिन काह ॥
सुदिन शोधि गुरु साधु द्विज, आगे करि सउछाह ५५
चल्यो निसान बजायकरि, जायदुर्ग भरि चाय ॥
द्वारपालको देतभो, बहु इनाम बोलवाय ॥ ५६ ॥
पूजा करि सब सुरनकी, अति आदर युत भूप ॥
विप्रन साधुनको कियो, निवता महाअनूप ॥ ५७ ॥
बाजन बाने विविध प्रकारा । तोपैं छूटतभईं अपारा ॥
सुदिन शोधिसिंहासन पाहीं । विरसिंह भूप बैठ सुखमाहीं ॥
ज़मीदार भूमियन बोलाई । बिदा कियो दै तिन्हें बिदाई ॥
रैयत साहु महाजन जेते । आयभेंट दिय नति करि तेते ॥
शिरोपांउदै तिन सब काहीं । खातिर करि किय विदा तहाँहीं ॥
राज्य करत 'बहु वर्ष बिताये । वीरभानु सुतयुत अति चाये ॥
नृप विरसिंहदेव यक वासर । कीन्ह्यो मन विचार यह सुखकर ॥
सुतहिं समर्पि राज्य यह सिगरी । भजन करौं चलि नहिं अब विगरी ॥
दोहा-बोलि साधु गुरुके सपदि, सुदिन शोधि नरराय ॥
वीरभानुकौं शुभ दिवस, दिय गद्दी बैठाय ॥ ५८ ॥
आप भजन करिवे कें हेतू । मणिवै रानी-सहित संचेतू ॥
विरसिंहदेव प्रागमें आई । वास कियों तिरवेणि नहाई ॥
दिनमति ब्राह्मण साधुन काहीं । भोजन करवावै सुखमाहीं ॥
आनंद मग्न रहै वसुयामा । सुमिरण करत जानकी रामा ॥
बीरभानु बांधवगढ़में इत । पैठि राज्य आसन मन प्रमुदित ॥
राज्य कियो बहु दिवस समाजा । तासु सुवन तुमराज विराजा ॥
करहु निशंक राज्य सब काला । यह सुनि राजाराम निहाला ॥
बहु विधि स्तुति करिकै मेरी । मोसों विनती करी बहुतेरी ॥
दोहा-कह कबीर साहेब गुरू, तुम हमरें कुलकेर ॥
शिष्य कीजिये मोंहि प्रभु, अब न कीजिये देर ॥ ५९ ॥

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